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Samveda/1564

विशोविशो वो अतिथिं वाजयन्तः पुरुप्रियम्। अग्निं वो दुर्यं वच स्तुषे शूषस्य मन्मभिः॥१५६४

Veda : Samveda | Mantra No : 1564

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : अनुष्टुम्मुखः प्रगाथः | स्वर : गान्धारः

विषय : प्रथम मन्त्र की व्याख्या पूर्वार्चिक में ८७ क्रमाङ्क पर परमात्मा के विषय में की जा चुकी है। यहाँ यज्ञाग्नि का वर्णन करते हैं।

पदपाठ : विशोविशः । विशः । विशः । वः । अतिथिम् । वाजयन्तः । पुरु । प्रियम् । पुरु । प्रियम् । अग्निम् । वः । दुर्वम् । दुः । वम् । वचः । स्तुषे । शूषस्य । मन्मभिः॥

पदार्थ : हे मित्रो ! (वाजयन्तः) बल, आरोग्य और आध्यात्मिक ऐश्वर्य की कामना करते हुए (वः) तुम (विशः विशः) प्रत्येक मनुष्य के (अतिथिम्) अतिथि के समान सत्कार करने योग्य, (पुरुप्रियम्) बहुत प्यारे, (वः) तुम्हें (दुर्यम्) घर के समान शरण देनेवाले (अग्निम्) यज्ञाग्नि के प्रति (वचः) वचन को प्रेरित करो। मैं भी (शूषस्य) बलवान् ज्ञानी परमेश्वर के रचे हुए (मन्मभिः) वेदमन्त्रों से, यज्ञाग्नि की (स्तुषे) स्तुति करता हूँ ॥१॥

भावार्थ : घर में आये हुए अतिथि के समान यज्ञाग्नि को आहुति देकर सबको सत्कार करना चाहिए ॥१॥