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Samveda/1587

इन्द्रमिद्देवतातय इन्द्रं प्रयत्यध्वरे। इन्द्रसमीके वनिनो हवामह इन्द्रं धनस्य सातये॥१५८७

Veda : Samveda | Mantra No : 1587

In Hindi:

ऋषि : मेध्यातिथिः काण्वः | देवता : इन्द्रः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : मध्यमः

विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में २४९ क्रमाङ्क पर जगदीश्वर और राजा के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ यज्ञ की सफलता के लिए जगदीश्वर का आह्वान है।

पदपाठ : इन्द्रम् । इत् । देवतातये । इन्द्रम् । प्रयति । प्र । यति । अध्वरे । इन्द्रम् । समीके । सम् । ईके । वनिनः । हवामहे । इन्द्रम् । धनस्व । सातये॥

पदार्थ : (इन्द्रम् इत्) जगदीश्वर को ही (देवतातये) यज्ञ के आरम्भ के लिए, (इन्द्रम्) जगदीश्वर को ही (अध्वरे) यज्ञ के (प्रयति) प्रवृत्त होने पर, (इन्द्रम्) जगदीश्वर को ही (समीके) यज्ञ समाप्त होने पर (इन्द्रम्) जगदीश्वर को ही (धनस्य) यज्ञफल की (सातये) प्राप्ति के लिए (वनिनः) भक्ति में तन्मय होकर हम (हवामहे) पुकारते हैं ॥१॥

भावार्थ : अग्निहोत्र से लेकर अश्वमेधपर्यन्त अथवा देवपूजा, सङ्गतिकरण और दानरूप जो भी यज्ञ आयोजित किया जाता है, उसमें सदा परमेश्वर का स्मरण रखने से वह सफल होता है ॥१॥