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Samveda/1606

सव्यामनु स्फिग्यं वावसे वृषा न दानो अस्य रोषति। मध्वा सपृक्ताः सारघेण धेनवस्तूयमेहि द्रवा पिब (वी)।। [धा. । उ नास्ति । स्व. ।]॥१६०६

Veda : Samveda | Mantra No : 1606

In Hindi:

ऋषि : देवातिथिः काण्वः | देवता : इन्द्रः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : पञ्चमः

विषय : अगले मन्त्र में परमात्मा के उपासक को कहते हैं।

पदपाठ : सव्याम् । अनु । स्फिग्यम् । वावसे । वृषा । न । दानः । अस्य । रोषति । मध्वा । संपृक्ताः । सम् । पृक्ताः । सारघेण । धेनवः । तूयम् । आ । इहि । द्रव । पिब॥

पदार्थ : हे परमात्मा के उपासक ! (वृषा) बलवान् तू (सव्याम्) बायीं (स्फिग्यम्) टाँग को आगे करके और दाहिनी टाँग को पीछे करके (वावसे) दौड़ लगाने के लिए खड़ा रह, अर्थात् सदा विक्रमशील रह। (अस्य) ऐसे विक्रमशील तेरी(दानः) कोई भी हिंसक (न रोषति) हिंसा नहीं कर सकेगा। हे उपासक ! (सारघेण मध्वा) मधुमक्खियों से प्राप्त मधु से (संपृक्ताः) संयुक्त (धेनवः) गोदुग्ध आदि तैयार हैं। तू (तूयम्) शीघ्र (एहि) आ, (द्रव) क्रियाशील हो, (पिब) पान कर ॥२॥

भावार्थ : जैसे दोड़ की प्रतिस्पर्धा में प्रतिस्पर्धी लोग घुटने पर मुड़ी हुई बायीं टाँग को आगे करके और दाहिनी को पीछे करके आकृति-विशेष में दौड़ने के लिए तैयार खड़े रहते हैं, वैसे ही परमेश्वर का उपासक सदा ही पुरुषार्थ के लिए तैयार रहता है। इसलिए उसके रास्ते में कोई बाधा नहीं डाल सकता, प्रत्युत उसका सभी अभिनन्दन करते हैं ॥२॥