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Samveda/1616

अग्रेगो राजाप्यस्तविष्यते विमानो अह्नां भुवनेष्वर्पितः । हरिर्घृतस्नुः सुदृशीको अर्णवो ज्योतीरथः पवते राय ओक्यः (ले)।।॥१६१६

Veda : Samveda | Mantra No : 1616

In Hindi:

ऋषि : अत्रिर्भौमः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : जगती | स्वर : निषादः

विषय : अगले मन्त्र में जगदीश्वर के गुणों का वर्णन है।

पदपाठ : अग्रेगः । अग्रे । गः । राजा । अप्यः । तविष्यते । विमानः । वि । मानः । अह्नाम् । अ । ह्नाम् । भुवनेषु । अर्पितः । हरिः । घृतस्नुः । घृत । स्नुः । सुदृशीकः । सु । दृशीकः । अर्णवः । ज्योतीरथः । ज्योतिः । रथः । पवते । राये । ओक्य॥

पदार्थ : (अग्रेगः) आगे-आगे चलनेवाला, (राजा) विश्व का राजा, (अप्यः) प्राणों के लिए हितकर, (अह्नां विमानः) दिनों का निर्माण करनेवाला, (भुवनेषु अर्पितः) लोक-लोकान्तरों में व्यापक सोम परमेश्वर (तविष्यते) महिमा-गान द्वारा बढ़ेगा।(घृतस्नुः) वृष्टि-जल को बरसानेवाला, (सुदृशीकः) भली-भाँति दर्शन करने योग्य, (अर्णवः) सद्गुणों का समुद्र, (ज्योतीरथः) सूर्य, चन्द्र, विद्युत् आदि ज्योतिष्मान् पदार्थों को वेग से चलानेवाला, (ओक्यः) गृहरूप देह के लिए हितकर (हरिः) वह हृदयकारी जगदीश्वर (राये) ऐश्वर्य देने के लिए (पवते)प्राप्त होता है ॥३॥

भावार्थ : दिन, रात, पक्ष, मास, ऋतु, दक्षिणायन, उत्तरायण, वर्ष आदि का और सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र आदि का बनानेवाला सबका हितकर्ता परमेश्वर सबके द्वारा वन्दनीय है ॥३॥इस खण्ड में परमात्मा, जीवात्मा, राजा और आचार्य का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥सोलहवें अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥सोलहवाँ अध्याय समाप्त ॥सप्तम प्रपाठक में तृतीय अर्ध समाप्त ॥