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Samveda/1618

यच्चिद्धि शश्वता तना देवंदेवं यजामहे। त्वे इद्धूयते हविः॥१६१८

Veda : Samveda | Mantra No : 1618

In Hindi:

ऋषि : शुनः शेप आजीगर्तिः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में परमात्मा को समर्पण किया गया है।

पदपाठ : यत् । चित् । हि । शश्वता । तना । देवनदेवम् । देवम् । देवम् । यजामहे । त्वेइति । इत् । हूयते । हविः॥

पदार्थ : (यत् चित् हि) यद्यपि (शश्वता) प्रचुर (तना) धन से, हम (देवं देवम्) प्रत्येक विद्वान् का (यजामहे) सत्कार करते हैं, तो भी हे अग्ने ! हे जगन्नायक परमात्मन् ! वस्तुतः (हविः) समर्पणीय आत्मा, मन, बुद्धि आदि तथा सब कर्म (त्वे इत्) आपमें ही (हूयते) हमारे द्वारा समर्पित हैं ॥२॥

भावार्थ : यथोचित सत्कार माता, पिता, अतिथि, राजा, आचार्य,उपदेशक, वानप्रस्थी, संन्यासी आदि सभी का करना चाहिए, किन्तु जगत् के उत्पत्तिकर्ता, धारणकर्ता, संहारकर्ता आदि रूप में एक परमेश्वर की ही पूजा करनी योग्य है ॥२॥