Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1624

पर्षि तोकं तनयं पर्तृभिष्ट्वमदब्धैरप्रयुत्वभिः । अग्ने हेडासि दैव्या युयोधि नोऽदेवानि हरासि च (क)।। [धा. । उ । स्व. ।]॥१६२४

Veda : Samveda | Mantra No : 1624

In Hindi:

ऋषि : शंयुर्बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : पञ्चमः

विषय : अगले मन्त्र में पुनः परमेश्वर और आचार्य को कहते हैं।

पदपाठ : पर्षि । तोकम् । तनयम् । पर्तृभिः । त्वम् । अदव्धैः । अ । दब्धैः । अप्रयुत्वभिः । अ । प्रयुत्वभिः । अग्ने । हेडासि । दैव्या । युयोधि । नः । अदेवानि । अ । देवानि । हरासि । च॥

पदार्थ : हे (अग्ने) परमात्मन् वा आचार्य ! (त्वम्) आप (अदब्धैः) अबाध, (अप्रयुत्वभिः) अलग न होनेवाले (पर्तृभिः) पालन-पूरण के प्रकारों से (तोकं तनयम्) पुत्र-पौत्र की (पर्षि) पालना करो और उन्हें विद्या आदि से भरपूर करो। (नः) हमारे (दैव्या) धार्मिक विद्वानों के प्रति किये जानेवाले(हेडांसि) अनादररूप अपराधों को, (अदेवानि च) और अवाञ्छनीय (ह्वरांसि) कुटिल कर्मों को (युयोधि) हमसे अलग करो ॥२॥

भावार्थ : परमात्मा की प्रेरणा से और गुरुओं की शिक्षा से सब मनुष्यों को दुर्गुण, दुर्व्यसन आदि छोड़ने चाहिएँ और सद्गुणों तथा सत्कर्मों को प्राप्त करना चाहिए ॥२॥