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Samveda/1652

वि चिद्वृत्रस्य दोधतः शिरो बिभेद वृष्णिना। वज्रेण शतपर्वणा॥१६५२

Veda : Samveda | Mantra No : 1652

In Hindi:

ऋषि : वत्सः काण्वः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में राजा वा सेनापति के दृष्टान्त से परमात्मा के वीर कर्म का वर्णन है।

पदपाठ : वि । चित् । वृत्रस्य । दोधतः । शिरः । विभेद । वृष्णिना । वज्रेण । शतपर्वणा । शत । पर्वणा॥

पदार्थ : जैसे (वृष्णिना) गोली बरसानेवाली बन्दूक से अथवा (शतपर्वणा) सौ कीलोंवाली (वज्रेण) गदा से, इन्द्र अर्थात् शूरवीर राजा वा सेनापति (दोधतः) सज्जनों को कँपानेवाले (वृत्रस्य) दुष्ट शत्रु का(शिरः) सिर (वि बिभेद) तोड़ देता है, वैसे ही (वृष्णिना) सुखवर्षक, (शतपर्वणा) बहुतों का पालन करनेवाले (वज्रेण) दण्डसामर्थ्य से इन्द्र अर्थात् वीर परमेश्वर (दोधतः) कँपानेवाले(वृत्रस्य) पाप के (शिरः) सिर को अर्थात् प्रभाव को (वि बिभेद चित्) नष्ट-भ्रष्ट कर देता है ॥२॥

भावार्थ : परमात्मा की उपासना से सब विघ्न और सब पाप वैसे ही नष्ट हो जाते हैं, जैसे राजा या सेनापति के शस्त्रास्त्रों से सब शत्रु ॥२॥