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Samveda/1660

आ त्वा विशन्त्विन्दवः समुद्रमिव सिन्धवः। न त्वामिन्द्राति रिच्यते॥१६६०

Veda : Samveda | Mantra No : 1660

In Hindi:

ऋषि : श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में १९७ क्रमाङ्क पर परमात्मा के विषय में हो चुकी है। यहाँ जीवात्मा का विषय कहते हैं।

पदपाठ : आ । त्वा । विशन्तु । इन्दयः । समुद्रम् । सम् । उद्रम् । इव । सिन्धवः । न । त्वाम् । इन्द्र । अति । रिच्यते॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) जीवात्मन् ! (इन्दवः) आचार्य से प्राप्त ज्ञान-रस और परमात्मा से प्राप्त आनन्द-रस (त्वा) तुझमें (आ विशन्तु) प्रवेश करें, (समुद्रम् इव) समुद्र में जैसे (सिन्धवः) नदियाँ प्रवेश करती हैं। देह में कोई भी मन, प्राण आदि (त्वाम्) तुझ जीवात्मा से (न अतिरिच्यते) महत्ता में अधिक नहीं है ॥१॥यहाँ उपमालङ्कार है ॥१॥

भावार्थ : जीवात्मा शरीर का सम्राट् है। मन, बुद्धि, प्राण, मस्तिष्क,हृदय आदि सब उसी के अनुशासन में है। वह यदि जागरूक है, तो सारे अभ्युदय या निःश्रेयस को वह प्राप्त कर सकता है ॥१॥