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Samveda/1675

मो षु त्वा वाघतश्च नाउे अस्मन्नि रीरमन्। आरात्ताद्वा सधमादं न आ गहीह वा सन्नुप श्रुधि॥१६७५

Veda : Samveda | Mantra No : 1675

In Hindi:

ऋषि : वसिष्ठो मैत्रावरुणिः | देवता : इन्द्रः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : मध्यमः

विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में २८४ क्रमाङ्क पर परमात्मा और राजा को सम्बोधित की गयी थी। यहाँ मनुष्य अपने मन को सम्बोधन कर रहा है।

पदपाठ : मा । उ । सु । त्वा । वाघतः । च । न । आरे । अस्मन् । नि । रीरमन् । आरात्तात । वा । सधमादम् । सध । मादम् । नः । आ । गहि । इह । वा । सन् । उप । श्रुधी॥

पदार्थ : हे इन्द्र ! हे मेरे मन ! (वाघतः च न) आकर्षक भी पदार्थ (त्वा)तुझे (अस्मत् आरे) हमसे दूर (मा उ सु) न (नि रीरमन्) क्रीडा करायें। (आरात्तात्) सुदूर देश से भी (नः) हमारे (सधमादम्) उपासना-यज्ञ में (आ गहि) आ जा, (इह वा सन्) और यहीं रहता हुआ (उप श्रुधि) हमारे आदेश को सुन ॥१॥

भावार्थ : मनुष्य का मन दूर से दूर दौड़ता रहता है और अनेक संकल्प-विकल्प करता रहता है। उसकी यह चेष्टा परमात्मा के ध्यान में बाधक होती है। अतः साधक दूर गये हुए अपने मन को यहाँ वापस लौटा रहा है ॥१॥