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Samveda/1684

एदु मधोर्मदिन्तरसिञ्चाध्वर्यो अन्धसः। एवा हि वीर स्तवते सदावृधः॥१६८४

Veda : Samveda | Mantra No : 1684

In Hindi:

ऋषि : विश्वमना वैयश्वः | देवता : इन्द्रः | छन्द : उष्णिक् | स्वर : ऋषभः

विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ३८५ क्रमाङ्क पर मानव को सम्बोधित की गयी थी। यहाँ परमेश्वर को सम्बोधन करते हैं।

पदपाठ : आ । इत् । उ । मघोः । मदन्तिरम् । सिञ्च । अध्वर्यो । अन्धसः । एव । हि । वीर । स्तवते । सवावृधः । सदा । वृधः॥

पदार्थ : हे (अध्वर्यो) ब्रह्माण्ड-यज्ञ के सञ्चालक इन्द्र परमात्मन् ! आप(मधोः) मधुर (अन्धसः) आनन्द के (मदिन्तरम्) अतिशय तृप्ति देनेवाले रस को (इत्) निश्चय ही (आ सिञ्च उ) उपासक के अन्तरात्मा में सींचो। (एव हि) इसी प्रकार (वीरः) शूरवीर उपासक (सदावृधः) सदा उन्नत होता हुआ (स्तवते) प्रशंसा पाता है ॥१॥

भावार्थ : ब्रह्मानन्द-रस से पूर्णतः तृप्त हुआ उपासक सदा वृद्धि और उन्नति पाता हुआ सबका प्रशंसापात्र होता है ॥१॥