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Samveda/1694

इन्द्राग्नी अपसस्परि (उप प्र यन्ति धीतयः। ऋतस्य पथ्या अनु)*।।॥१६९४

Veda : Samveda | Mantra No : 1694

In Hindi:

ऋषि : विश्वामित्रः प्रागाथः | देवता : इन्द्राग्नी | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : द्वितीय ऋचा की व्याख्या उत्तरार्चिक में १५७७ क्रमाङ्क पर जीवात्मा और परमात्मा के विषय में की जा चुकी है। यहाँ आत्मा और मन का विषय वर्णित है।

पदपाठ : इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । अपसः । परि । उप । प्र । यन्ति । धीतयः । ऋतस्य । पथ्या । अनु॥

पदार्थ : हे (इन्द्राग्नी) आत्मा और मन ! (धीतयः) ज्ञान (अपसः परि) कर्मों में ही (उप प्रयन्ति) परिसमाप्त हुआ करते हैं। अतः तुम दोनों(ऋतस्य) सत्य कर्म के (पथ्याः) मार्गों का (अनु) अनुसरण करो ॥२॥

भावार्थ : कर्महीन अकेले ज्ञान शोभा नहीं पाते ॥२॥