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Samveda/1705

उप त्वा रण्वसन्दृशं प्रयस्वन्तः सहस्कृत। अग्ने ससृज्महे गिरः॥१७०५

Veda : Samveda | Mantra No : 1705

In Hindi:

ऋषि : भरद्वाजो बार्हस्पत्यः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में अग्नि नाम से परमात्मा को सम्बोधन करते हैं।

पदपाठ : उप । त्वा । रण्वसन्दृशम् । रण्व । सन्दृशम् । प्रयस्वन्तः । सहस्कृत । सहः । कृत । अग्ने । ससृव्महे । गिरः॥

पदार्थ : हे (सहस्कृत) आत्मबल से हृदय में प्रकट किये गये (अग्ने) अग्रनायक जगदीश्वर ! (प्रयस्वन्तः) प्रयत्नवान् हम (रण्वसन्दृशम्) रमणीय दर्शनवाले (त्वा) आपके प्रति (गिरः) स्तुति-वाणियों को (उप ससृज्महे) उच्चारण करते हैं ॥१॥

भावार्थ : परमात्मा की स्तुति के साथ मनुष्यों को प्रयत्न भी करना चाहिए, तभी अभीष्ट कामनाएँ पूर्ण होती हैं ॥१॥