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Samveda/1714

उत्ते शुष्मासो अस्थू रक्षो भिन्दन्तो अद्रिवः। नुदस्व याः परिस्पृधः॥१७१४

Veda : Samveda | Mantra No : 1714

In Hindi:

ऋषि : अवत्सारः काश्यपः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : प्रथम मन्त्र में स्तुतिपूर्वक परमेश्वर से प्रार्थना की गयी है।

पदपाठ : उत् । ते । शुष्मासः । अस्थुः । रक्षः । भिन्दतः । अद्रिवः । अ । द्रिवः । नुदस्व । याः । परिस्पृधः । परि । स्पृधः॥

पदार्थ : हे (अद्रिवः) किसी से विदीर्ण न किये जा सकने योग्य पवमान सोम अर्थात् पवित्रतादायक सद्गुणकर्मप्रेरक जगदीश ! (ते) आपके (शुष्मासः) बल (रक्षः) काम, क्रोध, आदि छहों रिपुओं को और व्याधि, स्त्यान, संशय आदि योग-मार्ग के विघ्नों को (भिन्दन्तः) तोड़ते-फोड़ते हुए (अस्थुः) दृढ़ता से स्थित रहते हैं। (याः परिस्पृधः) जो स्पर्धाशील आन्तरिक वा बाह्य शत्रु-सेनाएँ हैं उन्हें आप (नुदस्व) परे खदेड़ दो ॥१॥

भावार्थ : परमेश्वर की आराधना से मनुष्य सब आन्तरिक और बाह्य शत्रुओं को जीतने के लिए अपार बल, साहस और उद्बोधन प्राप्त करता है ॥१॥