Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1719

वृत्रखादो वलं रुजः पुरां दर्मो अपामजः। स्थाता रथस्य हर्योरभिस्वर इन्द्रो दृढा चिदारुजः॥१७१९

Veda : Samveda | Mantra No : 1719

In Hindi:

ऋषि : विश्वामित्रो गाथिनः | देवता : इन्द्रः | छन्द : बृहती | स्वर : मध्यमः

विषय : अब जीवात्मा का कर्तव्य बताते हैं।

पदपाठ : वृत्रखादः । वृत्र । खादः । बलरुजः । बलम् । रुजः । पुराम् । दर्मः । अपाम् । अजः । स्थाता । रथस्य । हर्योः । अभिस्वरे । अभि । स्वरे । इन्द्रः । दृढा । चित् । आरुजः । आ । रुजः॥

पदार्थ : (इन्द्रः) मनुष्य का आत्मा (वृत्रखादः) पापों का भक्षक, (वलंरुजः) धर्म पर पर्दा डालनेवाले काम, क्रोध आदि को चकनाचूर करनेवाला, (पुरां दर्मः) शत्रु की नगरियों को विदीर्ण करनेवाला, (अपाम् अजः) कर्मों को गति देनेवाला, (हर्योः) ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय रूप घोड़ों के (रथस्य) शरीररूप रथ का (स्थाता) अधिष्ठाता और (अभिस्वरे) देवासुरसङ्ग्राम में (दृढा चित्) दृढ से दृढ विघ्न आदि को (आ रुजः) चकनाचूर कर देनेवाला होवे ॥२॥

भावार्थ : मनुष्यों को चाहिए कि वे अपने आत्मा की शक्ति को समझ कर, उसका प्रयोग करके, सब बाधाओं का उन्मूलन करके अभ्युदय और निःश्रेयसरूप लक्ष्य को प्राप्त करें ॥२॥