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Samveda/1722

मन्दन्तु त्वा मघवन्निन्द्रेन्दवो राधोदेयाय सुन्वते। आमुष्या सोममपिबश्चमू सुतं ज्येष्ठं तद्दधिषे सहः (घ)।। [धा. । उ । स्व. ।]॥१७२२

Veda : Samveda | Mantra No : 1722

In Hindi:

ऋषि : देवातिथिः काण्वः | देवता : इन्द्रः | छन्द : प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) | स्वर : पञ्चमः

विषय : अगले मन्त्र में जगदीश्वर को सम्बोधन है।

पदपाठ : मदन्तु । त्वा । मघवन् । इन्द्र । इन्दवः । राधोदेयाय । राधः । देयाय । सुन्वते । आमुष्य । आ । मुष्य । सोमम् । अपिबः । चमूइति । सुतम् । ज्येष्ठम् । तत् । दधिषे । सहः॥

पदार्थ : हे (मघवन्) ऐश्वर्यशाली (इन्द्र) जगत्पति परमेश्वर ! (इन्दवः) भक्तिरस (सुन्वते) भक्त को (राधोदेयाय) ऐश्वर्य प्रदान करने के लिए (त्वा) आपको (मन्दन्तु) प्रसन्न करें। आप (चमू) आत्मा और मनरूप कटोरों में (सुतम्) अभिषुत किये हुए (सोमम्) भक्तिरस को (आमुष्य) उत्सुकता से हर कर (अपिबः) पीते हो, (तत्) उसके बदले में (जयेष्ठम्) अतिशय प्रशस्य और वृद्ध (सहः) बल को (दधिषे) उपासक में रख देते हो ॥२॥

भावार्थ : भक्तिरस से तृप्त परमेश्वर भक्त को पुरुषार्थ और दिव्य शक्ति प्रदान करता है ॥२॥