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Samveda/1725

प्रति ष्या सूनरी जनी व्युच्छन्ती परि स्वसुः। दिवो अदर्शि दुहिता॥१७२५

Veda : Samveda | Mantra No : 1725

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : उषाः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : प्रथम मन्त्र में भौतिक उषा के दृष्टान्त से दिव्य उषा का वर्णन किया गया है।

पदपाठ : प्रति । स्या । सूनरी । सु । नरी । जनी । व्युच्छन्ती । वि । उच्छन्ती । परि । स्वसुः । दिवः । अदर्शि । दुहिता॥

पदार्थ : प्रथम—प्राकृतिक उषा के पक्ष में। (सूनरी) उत्तम नेत्री, (जनी) प्रकाश की जननी, (स्वसुः) बहिन रात्रि के (परि) समाप्तिकाल में (व्युच्छन्ती) अँधेरे को हटाती हुई, (दिवः) द्युलोक की (दुहिता) पुत्री (स्या) वह उषा (प्रति अदर्शि) पूर्व दिशा में दिखायी दे रही है ॥द्वितीय—दिव्य उषा के पक्ष में। (सूनरी) योगमार्ग में उत्तम नेतृत्व करनेवाली, (जनी) मोक्ष की जननी, (स्वसुः) संसारमार्ग पर डालनेवाली अविद्या की (परि) समाप्ति पर (व्युच्छन्ती) उदित होती हुई, (दिवः) प्रकाशमय सविकल्पक समाधि की (दुहिता) पुत्री-तुल्य (स्या) वह ऋतम्भरा प्रज्ञा (प्रति अदर्शि) साक्षात् अनुभव में आ रही है ॥१॥यहाँ श्लेष और स्वभावोक्ति अलङ्कार हैं ॥१॥

भावार्थ : १. ऋ० ४।५२।१।२. ऋग्भाष्ये दयानन्दर्षिर्मन्त्रेऽस्मिन्नुषस इव स्त्रिया गुणानाह।

टिप्पणी :आगे फिर उसी विषय को कहा गया है।