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Samveda/1730

वच्यन्ते वां ककुहासो जूर्णायामधि विष्टपि। यद्वा रथो विभिष्पतात् (लि)।। [धा. । उ नास्ति । स्व. ।]॥१७३०

Veda : Samveda | Mantra No : 1730

In Hindi:

ऋषि : प्रस्कण्वः काण्वः | देवता : अश्विनौ | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : आगे मन और आत्मा का महत्त्व कहा गया है।

पदपाठ : वच्यन्ते । वाम् । ककुहासः । जूर्णायाम् । अधि । विष्टपि । यत् । वाम् । रथः । विभिः । पतात्॥

पदार्थ : हे मन और आत्मा रूप अश्वी-युगल ! (वाम्) तुम दोनों के (ककुहासः) महान् स्तोत्र (वच्यन्ते) गान किये जाते हैं, (यत्) क्योंकि (जूर्णायाम्) वृद्ध (विष्टपि अधि) अवस्था में भी (विभिः) इन्द्रिय-रूप अश्वों द्वारा (वाम्) तुम्हारा (रथः) शरीररूप रथ (पतात्) चलता है ॥३॥

भावार्थ : वृद्धावस्था में भी जो शरीर भली-भाँति कार्य करता है, वह सब प्राण-अपान सहित मन और आत्मा का ही प्रताप है ॥३॥