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Samveda/1737

अग्निं तं मन्ये यो वसुरस्तं यं यन्ति धेनवः। अस्तमर्वन्त आशवो स्तं नित्यासो वाजिन इष स्तोतृभ्य आ भर॥१७३७

Veda : Samveda | Mantra No : 1737

In Hindi:

ऋषि : वसुश्रुत आत्रेयः | देवता : अग्निः | छन्द : पंक्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ४२५ क्रमाङ्क पर व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ अग्नि नाम से जगदीश्वर का परिचय प्रस्तुत करते हैं।

पदपाठ : अग्निम् । तम् । मन्ये । यः । वसु । अस्तम् । यम् । यन्ति । धेनवः । अस्तम् । अर्वन्तः । आशवः । अस्तम् । नित्यासः । वाजिनः । इषम् । स्तोतृभ्यः । आ । भर॥

पदार्थ : मैं (अग्निम्) अग्नि नामक जगदीश्वर (तं मन्ये) उसे मानता हूँ,(यः वसुः) जो धर्मात्माओं को निवास देनेवाला है, (अस्तं यम्) शरण-रूप जिसके पास (धेनवः) दुधारू गायें (यन्ति) मातृत्व की प्राप्ति के लिए पहुँचती हैं, (अस्तम्) शरण-रूप जिसके पास (आशवः) शीघ्रगामी (अर्वन्तः) घोड़े (यन्ति) वेग की प्राप्ति के लिए पहुँचते हैं, (अस्तम्) शरण-रूप जिसके पास (नित्यासः) अनादि और अनन्त (वाजिनः) जीवात्मा (यन्ति) बल के लिए पहुँचते हैं। हे अग्ने जगदीश्वर ! आप (स्तोतृभ्यः) स्तोताओं को, आपके गुण-कर्म-स्वभाव का कीर्तन करनेवाले मनुष्यों को (इषम्) अभीष्ट अभ्युदय और निःश्रेयस रूप फल (आ भर) प्रदान करो ॥१॥

भावार्थ : सभी अपनी-अपनी शक्ति को प्राप्त करने के लिए जिसकी शरण में पहुँचते हैं, वह परमेश्वर ही मुख्यतः अग्निशब्दवाच्य है ॥१॥