Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1740

महे नो अद्य बोधयोषो राये दिवित्मती। यथा चिन्नो अबोधयः सत्यश्रवसि वाय्ये सुजाते अश्वसूनृते॥१७४०

Veda : Samveda | Mantra No : 1740

In Hindi:

ऋषि : सत्यश्रवा आत्रेयः | देवता : उषाः | छन्द : पंक्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ४२१ क्रमाङ्क पर अध्यात्म-प्रभा के विषय में की गयी थी। यहाँ जगन्माता को सम्बोधन है।

पदपाठ : महे । नः । अद्य । अ । द्य । वोधय । उषः । राये । दिवित्मती । यथा । चित् । नः । अवोधयः । सत्यश्रवसि । सत्य । श्रवसि । वाय्ये । सुजाते । सु । जाते । अश्वसूनृते । अश्वसूनृते । सूनृते॥

पदार्थ : हे (सुजाते) सुप्रसिद्ध, (अश्वसूनृते) व्यापक प्रिय सत्य वेदवाणीवाली (उषः) उषा के समान जगानेवाली जगन्माता ! (दिवित्मती) दिव्य प्रकाश से देदीप्यमान तू (नः) हमें (महे राये) महान् अभ्युदय और मोक्ष रूप ऐश्वर्य के लिए (अद्य) आज भी (बोधय) वैसे ही जगा (यथा चित्) जैसे, (सत्यश्रवसि) सच्ची कीर्तिवाले, (वाय्ये) खड्डी में धागों के समान फैलाने योग्य हमारे पूर्व जीवन में (नः) हमें (अबोधयः) जगाती रही है ॥१॥

भावार्थ : जैसे प्राकृतिक उषा सब प्राणियों को और कोई माँ अपनी सन्तानों को जगाती और श्रेष्ठ कर्मों में लगाती हैं, वैसे ही जगदीश्वरी माँ हम अबोधों को जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त अपने कर्तव्य-पालन के लिए दिन-रात जगाती रहे, जिससे हम कीर्ति, अभ्युदय और मोक्ष प्राप्त करें ॥१॥