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Samveda/1746

अबोध्यग्निः समिधा जनानां प्रति धेनुमिवायतीमुषासम्। यह्वा इव प्र वयामुज्जिहानाः प्र भानवः सस्रते नाकमच्छ॥१७४६

Veda : Samveda | Mantra No : 1746

In Hindi:

ऋषि : बुधगविष्टिरावात्रेयौ | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ७३ क्रमाङ्क पर यज्ञ और परमात्मा के विषय में हो चुकी है। यहाँ यज्ञाग्नि के वर्णन द्वारा जीवात्मा-परमात्मा के विषय की सूचना दी गयी है।

पदपाठ : अबोधि । अग्निः । समिधा । सम् । इधा । जनानाम् । प्रति । धेनुम् । इव । आयतीम् । आ । यतीम् । उषासम् । यह्बा । इव । प्र । वयाम् । उज्जिहानाः । उत् । जिहानाः । प्र । भानवः । सस्रते । नाकम् । अच्छ॥

पदार्थ : (धेनुम् इव) दुधारू गाय के समान (आयतीम्) आती हुई (उषासम् प्रति) उषा को लक्ष्य करके (जनानाम्) यजमानों की (समिधा) समिधाओं के होम से (अग्निः) यज्ञाग्नि (अबोधि) प्रबुद्ध हुआ है। (वयाम्) शाखा को (प्र उज्जिहानाः) ऊपर उठाते हुए (यह्वाः इव) बड़े-बड़े वृक्षों के समान (भानवः) अग्नि-ज्वालाएँ (नाकम् अच्छ) सूर्य की ओर (प्र सस्रते) उठ रही हैं ॥१॥यहाँ स्वभावोक्ति और उपमा अलङ्कार हैं ॥१॥

भावार्थ : जैसे उषा के आने पर यज्ञाग्नि सूर्य की ओर उठती है, वैसे ही उपासकों की आत्मा रूप अग्नि परमात्मा की ओर उठती है ॥१॥