Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1752

आ भात्यग्निरुषसामनीकमुद्विप्राणां देवया वाचो अस्थुः। अर्वाञ्चा नून रथ्येह यातं पीपिवा समश्विना घर्ममच्छ॥१७५२

Veda : Samveda | Mantra No : 1752

In Hindi:

ऋषि : अत्रिर्भौमः | देवता : अश्विनौ | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : प्रथम मन्त्र में प्राणायाम का वर्णन है।

पदपाठ : आ । भाति । अग्निः । उपसाम् । अनीकम् । उत् । विप्राणाम् । वि । प्राणाम् । देवयाः । देव । याः । वाचः । अस्थुः । अर्वाञ्चा । नूनम् । रथ्या । इह । यातम् । पीपिवासम् । अश्विना । घर्मम् । अच्छ॥

पदार्थ : (अग्निः) यज्ञाग्नि (आ भाति) आभासित हो रही है, (उषसाम्) उषाओं की (अनीकम्) किरण-सेना भी (आ भाति) आभासित हो रही है। (विप्राणाम्) मेधावी उपासकों की (देवयाः) परमात्माराधना की इच्छुक (वाचः) वाणियाँ (उद् अस्थुः) उठ रही हैं। हे (रथ्या) शरीर-रथ को चलानेवाले (अश्विना) प्राणापानो ! तुम दोनों (अर्वाञ्चा) हमारे अभिमुख होते हुए (नूनम्) निश्चय ही (इह) यहाँ (पीपिवांसम्) समृद्ध (घर्मम्) प्रातःकालीन ब्रह्मयज्ञ के (अच्छ) प्रति (आ यातम्) आओ ॥१॥

भावार्थ : उषाकाल में स्वच्छ प्राभातिक वायु में ब्रह्मयज्ञ में किया गया प्राणायाम अपूर्व, तेज, जागृति, स्फूर्ति, आरोग्य और बल प्रदान करता है ॥१॥