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Samveda/1784

ऐभिर्ददे वृष्ण्या पौस्यानि येभिरौक्षद्वृत्रहत्याय वज्री। ये कर्मणः क्रियमाणस्य मह्न ऋते कर्ममुदजायन्त देवाः (घे)।। [धा. । उ । स्व. ।]॥१७८४

Veda : Samveda | Mantra No : 1784

In Hindi:

ऋषि : बृहदुक्थो वामदेव्यः | देवता : इन्द्रः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : आगे फिर उसी विषय का वर्णन है।

पदपाठ : आ । एभिः । ददे । वृष्णयः । पौस्यानि । येभिः । औक्षत् । वृत्रहत्याय । वृत्र । हत्याय । वज्री । य । कर्मणः । क्रियमाणस्य । मह्न । ऋतेकर्मम् । ऋते । कर्मम् । उदजायन्त । उत । अजायन्त । देवाः॥

पदार्थ : (मह्नः कर्मणः) महान् सृष्टयुत्पत्ति आदि कर्म के किये जाते समय (ये देवाः) जो दिव्यगुण, इन्द्र परमेश्वर में (ऋते कर्मम्) बिना प्रयत्न के स्वभावतः (उदजायन्त) प्रकट हुए, (येभिः) जिन दिव्य गुणों से (वज्री) वज्रधारी के समान उस जगदीश्वर ने (वृत्रहत्याय) विघ्नों के विनाशार्थ (औक्षत्) जीवात्मा को सींचा, (एभिः) उन दिव्य गुणों से वह, आज भी (वृष्ण्या) सुखवर्षक (पौंस्यानि) बलयुक्त कर्मों को (आददे) करता है ॥३॥

भावार्थ : परमेश्वर में स्वभावतः सदा रहनेवाले जो गुण हैं, उन्हीं से वह सारे सृष्टि के कार्य को करता है। उन गुणों में से कुछ अंश वह मनुष्यों में भी निहित कर देता है, जिससे वे विघ्न, पाप, दोष आदि के विनाश में समर्थ होते हैं ॥३॥