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Samveda/1811

ते सुतासो विपश्चितः शुक्रा वायुमसृक्षत॥१८११

Veda : Samveda | Mantra No : 1811

In Hindi:

ऋषि : जमदग्निर्भार्गवः | देवता : पवमानः सोमः | छन्द : द्विपदा गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : आगे फिर उसी विषय को कहा गया है।

पदपाठ : ते । सुतासः । विपश्चितः । विपः । चितः । शुक्राः । वायुम् । असृक्षत॥

पदार्थ : (सुतासः) परमात्मा द्वारा प्रेरित, (विपश्चितः) मेधायुक्त, (शुक्राः) पवित्र (ते) वे प्रसिद्ध ब्रह्मानन्द-रस रूप सोम (वायुम्) प्राण को (असृक्षत) ऊपर की ओर प्रेरित करते हैं ॥२॥

भावार्थ : प्राप्त हुए ब्रह्मानन्द योगी के प्राणों को ऊपर की ओर प्रेरित करते हुए उसे मोक्ष प्रदान करते हैं ॥२॥