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Samveda/1813

अग्नि होतारं मन्ये दास्वन्तं वसोः सूनु सहसो जातवेदसं विप्रं न जातवेदसम्। य ऊर्ध्वरो स्वध्वरो देवो देवाच्या कृपा। घृतस्य विभ्राष्टिमनु शुक्रशोचिष आजुह्वानस्य सर्पिषः॥१८१३

Veda : Samveda | Mantra No : 1813

In Hindi:

ऋषि : परुच्छेपो दैवोदासिः | देवता : अग्निः | छन्द : अत्यष्टिः | स्वर : गान्धारः

विषय : प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ४६५ क्रमाङ्क पर हो चुकी है। परमेश्वर के गुण-कर्म-स्वभावों का वर्णन करते हैं।

पदपाठ : अग्निम् । होतारम् । मन्ये । दास्वन्तम् । वसोः । मूनुम् । सहसः । जातवेदसम् । जात । वेदसम् । विप्रम् । वि । प्रम । न । जातवेदसम् । जात । वेदसम् । यः । ऊर्ध्वया । स्वध्वरः । सु । अध्वरः । देवः । देवाच्या । कृपा । घृतस्य । विभ्राष्टिम् । वि । भ्राष्टिम् । अनु । शुक्रशोचिष । शुक्र । शोचिषः । आजुह्वानस्य । आ । जुह्वानस्य । सर्पिषः॥ ।

पदार्थ : मैं (अग्निम्) जगन्नायक परमेश्वर को (होतारम्) श्रद्धा का उपहार ग्रहण करनेवाला (वसोः) दिव्य तथा भौतिक धन का (दास्वन्तम्) दाता, (सहसः) बल, उत्साह और उद्बोधन का (सूनुम्) प्रेरक, (जातवेदसम्) प्रत्येक उत्पन्न पदार्थ में विद्यमान, सर्वान्तर्यामी, (विप्रं न) और विद्वान् मनुष्य के समान (जातवेदसम्) उत्पन्न पदार्थों का ज्ञाता (मन्ये) मानता हूँ, (यः देवः) जो प्रकाशक परमेश्वर (ऊर्ध्वया) उन्नत, (देवाच्या) प्रकाशक अग्नि, बिजली, सूर्य आदियों में व्यक्त हुई (कृपा) शक्ति से (स्वध्वरः) उत्कृष्ट जगत्प्रपञ्च-रूप यज्ञ का सञ्चालक है, साथ ही जो (आजुह्वानस्य) यज्ञाग्नि में होमे जानेवाले, (शुक्रशोचिषः) चमकीली चमकवाले, (सर्पिषः) पिघले हुए (घृतस्य) घृत की (विभ्राष्टिम्) विशिष्ट दीप्ति में भी (अनु) अनुप्रविष्ट है ॥१॥यहाँ उपमालङ्कार है। ‘जातवेदसं’ की आवृत्ति में यमक और ‘देवो, देवा’ में छेकानुप्रास है, सकार आदि की अनेक बार आवृत्ति में वृत्त्यनुप्रास है ॥१॥

भावार्थ : सूर्य, चन्द्र, बिजली, तारे आदियों में और घृत की आहुति से प्रदीप्त अग्नि-ज्वालाओं में जो प्रभा दृष्टिगोचर होती है, वह जगदीश्वर की ही दी हुई है ॥१॥