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Samveda/1815

स हि पुरू चिदोजसा विरुक्मता दीद्यानो भवति द्रुहन्तरः परशुर्न द्रुहन्तरः। वीडु चिद्यस्य समृतौ श्रुवद्वनेव यत्स्थिरम्। निष्षहमाणो यमते नायते धन्वासहा नायते॥१८१५

Veda : Samveda | Mantra No : 1815

In Hindi:

ऋषि : परुच्छेपो दैवोदासिः | देवता : अग्निः | छन्द : अत्यष्टिः | स्वर : गान्धारः

विषय : अगले मन्त्र में जीवात्मा का रणकौशल वर्णित है।

पदपाठ : सः । हि । पुरु । चित् । ओजसा । विरुक्मता । वि । रुक्मता । दीद्यानः । भवति । द्रुहन्तरः । द्रुहम् । तरः । परशुः । न । द्रहुन्तरः । द्रुहम् । तरः । वीडु । चित् । यस्य । समृतौ । सम । ऋतौ । श्रुवत् । वना । इव । यत् । स्थिरम् । निष्पहमाणः । निः । सहमानः । यमते । न । अयते । धन्वासहा । धन्वा । सहा । न । अयते॥

पदार्थ : (विरुक्मता) दीप्तियुक्त (ओजसा) प्रताप से (पुरु चित्) बहुत अधिक (दीद्यानः) द्युतिमान् (स हि) वह अग्नि अर्थात् अग्रनायक जीवात्मा (द्रुहन्तरः) द्रोह करनेवाले काम, क्रोध आदि शत्रु को पार करनेवाला (भवति) हो जाता है, (परशुः न) परशु के समान (द्रुहन्तरः) द्रोहकर्ता का वध करनेवाला हो जाता है, (यस्य) जिस जीवात्मा की (समृतौ) टक्कर होने पर (वीडु चित्) बलवान् भी, (वना इव) वन के समान (यत् स्थिरम्) जो स्थिर है, वह भी (श्रुवत्) विनष्ट हो जाता है या डगमगा जाता है, जो (निष्षहमाणः) शत्रुओं को तिरस्कृत करता हुआ, उन्हें (यमते) युद्ध से हटा देता है, (न अयते) स्वयं युद्ध से पलायन नहीं करता, अपितु (धन्वसहा न) धनुर्धारी के समान (अयते) देवासुरसङ्ग्राम में जाता है ॥३॥इस मन्त्र में उपमालङ्कार है, तीन उपमाएँ हैं। ‘द्रुहन्तरः’ और ‘नायते’ की आवृत्ति में यमक है ॥३॥

भावार्थ : देहधारी जीवात्मा जड़ जमाये हुए भी आन्तरिक तथा बाह्य सब शत्रुओं का उन्मूलन करके रणकुशल सेनापति के समान देवासुरसङ्ग्राम में विजयी हो ॥३॥इस खण्ड में परमात्मा और जीवात्मा के विषय का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥नवम प्रपाठक में प्रथम अर्ध समाप्त ॥