Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1829

युञ्जे वाच शतपदीं गाये सहस्रवर्तनि। गायत्रं त्रैष्टुभं जगत्॥१८२९

Veda : Samveda | Mantra No : 1829

In Hindi:

ऋषि : मृगः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अगले मन्त्र में साम का गान करनेवाला कह रहा है।

पदपाठ : युञ्जे । वाचम् । शतपदीम् । शत । पदीम् । गाये । सहस्रवर्तनि । सहस्र । वर्तनि । गायत्रम् । त्रष्टुभम् । त्रै । स्तुभम् । जगत्॥

पदार्थ : मैं (शतपदीम्) अनेक पादोंवाली (वाचम्) वेदवाणी को (युञ्जे) प्रयोग में लाता हूँ। साथ ही, (गायत्रम्) गायत्री छन्दवाले साम को, (त्रैष्टुभम्) त्रिष्टुप् छन्दवाले साम को और (जगत्) जगती छन्दवाले साम को और (सहस्रवर्तनि) सहस्र मार्गों से (गाये) गाता हूँ ॥२॥

भावार्थ : ऋचाओं पर आश्रित सामों के गान से हृदय और सामाजिक वातावरण पवित्र होता है ॥२॥