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Samveda/1864

कङ्काः सुपर्णा अनु यन्त्वेनान् गृध्राणामन्नमसावस्तु सेना। मैषां मोच्यघहारश्च नेन्द्र वयास्येनाननुसंयन्तु सर्वान्॥१८६४

Veda : Samveda | Mantra No : 1864

In Hindi:

ऋषि : पायुर्भारद्वाजः | देवता : इन्द्रः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : प्रथम मन्त्र में शत्रुसेना के समूलोच्छेद का विषय है।

पदपाठ : कङ्काः । सुपर्णाः । सु । पर्णाः । अनु । यन्तु । एनान् । घृध्राणाम् । अग्नम् । असौ । अस्तु । सेना । मा । एषाम् । मोची । अघहारः । अघ्र । हारा । च । न । इन्द्र । वयासि । एनान् । अनुसंयन्तु । अनु । संयन्तु । सर्वान्॥

पदार्थ : (सुपर्णाः) सुदृढ़ पङ्खोंवाली (कङ्काः) चीलें (एनान्) इन शत्रुओं का (अनुयन्तु) पीछा करें। (असौ सेना) वह शत्रु-सेना (गृध्राणाम्) गिद्धों का (अन्नम् अस्तु) भोजन बने। हे (इन्द्र) सेनापतितुल्य जीवात्मन् ! (एषाम्) इन शत्रुओं में से (अघहारः च न) पाप का भागी कोई भी (मा मोचि) जिन्दा न छूटे। (एनान् सर्वान्) इन सबका (वयांसि) माँसभक्षी पक्षी (अनु संयन्तु) पीछा करें, इन्हें खा जाएँ ॥१॥

भावार्थ : जैसे बाह्य युद्ध में मारे गये शत्रु गिद्ध आदि माँसभक्षक पक्षियों से समाप्त किये जाते हैं, वैसे ही आन्तरिक देवासुरसङ्ग्राम में जीवात्मा से मारे गये काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाम भी न बचे, ऐसा प्रयत्न मनुष्यों को करना चाहिए ॥१॥