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Samveda/1872

यो नः स्वोऽरणो यश्च निष्ठ्यो जिघासति। देवास्त सर्वे धूर्वन्तु ब्रह्म वर्म ममान्तर शर्म वर्म ममान्तरम् (वी)।। [धा. । उ नास्ति । स्व. ।]॥१८७२

Veda : Samveda | Mantra No : 1872

In Hindi:

ऋषि : ज्ञासो भारद्वाजः | देवता : संग्रामशिषः | छन्द : पंक्तिः | स्वर : पञ्चमः

विषय : अगले मन्त्र में वधेच्छु के विनाश का उपाय दर्शाते हैं।

पदपाठ : यः । नः । स्वः । अरणः । यः । च । निष्टयः । जिघासति । देवाः । तम् । सर्वे । धूर्वन्तु । ब्रह्म । वर्म । मम । अन्तरम् । शर्म । वर्म । मम । अन्तरम्॥

पदार्थ : (यः) जो (नः) हमें (स्वः) अपना दुर्भाव, (अरणः) पराया दुर्भाव, (यः च) और जो (निष्ठ्यः) शत्रु का दुर्भाव (जिघांसति) नष्ट करना चाहता है, (तम्) उस काम-क्रोध आदि दुर्भाव का (सर्वे) सब (देवाः) दिव्यगुण वा सदाचारी विद्वान् जन (धूर्वन्तु) वध कर दें। (ब्रह्म) महान् जगदीश्वर (मम) मेरा (अन्तरम्) आन्तरिक (वर्म) कवच अर्थात् रक्षा-साधन हो जाए, (शर्म) जगदीश की शरण (मम) मेरा (अन्तरम्) आन्तरिक (वर्म) कवच अर्थात् रक्षा-साधन हो जाए ॥३॥                    

भावार्थ : कभी मनुष्य निज मन से उत्पन्न पाप में प्रवृत्त होता है और कभी परिचित जन से प्रेरित वा शत्रु से प्रेरित पाप में लिप्त होता है। दिव्य विचारों से, विद्वानों के सङ्ग से और परमेश्वर के ध्यान-चिन्तन से उन पापों को नष्ट करके वह निष्पाप और सच्चरित्र हो सकता है ॥३॥