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Samaadhi Paada / Trance / 34
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Samaadhi Paada / Trance / 34

प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य॥३४॥

Padas Name : Samaadhi Paada / Trance | Sutra No : 34

In Hindi:

पदपाठ : प्रच्छर्दनविधारणाभ्याम् वा प्राणस्य॥

हिंदी में अर्थ : (वा) अथवा (प्राणस्य) प्राण के (प्रच्छर्दनविधारणाभ्याम्) प्रर्च्छदन = वमन जैसे वेग से बाहर फेंकने तथा विधारण = उस वायु को बाहर ही रोकने = धारण करने से चित्त की एकाग्रता का सम्पादन होता है॥

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : संस्कृत में अर्थ करते हुए महर्षि ने व्यासभाष्य के अतिरिक्त इतना विशेष लिखा है —

छर्दनं भक्षितान्नवमनवत् प्रयत्नेने शरीरस्थं प्राणं बाह्यदेशं निस्सार्य्य यथाशक्ति बहिरेव स्तम्भनेन चित्तस्य स्थिरता सम्पादनीया॥

(प्रच्छर्दन०) जैसे भोजन के पीछे किसी प्रकार से वमन हो जाता है, वैसे ही भीतर के वायु को बाहर निकाल के सुखपूर्वक जितना बन सके उतना ही बाहर रोक दे, पुनः धीरे-धीरे भीतर लेके पुनरपि ऐसे ही करे। इस प्रकार बार-बार अभ्यास करने से प्राण उपासक के वश में हो जाता है और प्राण के स्थिर होने से मन, मन के स्थिर होने से आत्मा भी स्थिर हो जाता है।

इन तीनों के स्थिर होने के समय अपने आत्मा के बीच में जो आनन्दस्वरूप अन्तर्यामी व्यापक परमेश्वर है, उसके स्वरूप में मग्न हो जाना चाहिए। जैसे मनुष्य जल में गोता मारकर ऊपर आता है फिर गोता लगा जाता है, इसी प्रकार अपने आत्मा में परमेश्वर के बीच में बार-बार मग्न करना चाहिए॥ (ऋ० भू॰ उपासनाविषय)

“जैसे अत्यन्त वेग से वमन होकर अन्न जल बाहर निकल जाता है वैसे प्राण को बल से बाहर फेंक के बाहर ही यथाशक्ति रोक देवे जब बाहर निकालना चाहे तब मूलेन्द्रिय को ऊपर खींच रक्खे तब तक प्राण बाहर रहता है। इसी प्रकार प्राण बाहर अधिक ठहर सकता है जब गभराहट हो तब धीरे २ भीतर वायु को लेके फिर भी वैसे ही करता जाय जितना सामर्थ्य और इच्छा हो। और मन में (ओ३म्) इस का जप करता जाय इस प्रकार करने से आत्मा और मन की पवित्रता और स्थिरता होती है। एक “बाह्यविषय” अर्थात् बाहर ही अधिक रोकना। दूसरा “आभ्यन्तर” अर्थात् भीतर जितना प्राण रोका जाय उतना रोक के। तीसरा “स्तम्भवृत्ति” अर्थात् एक ही वार जहां का तहां प्राण यथाशक्ति रोक देना। चौथा “बाह्याभ्यन्तराक्षेपी” अर्थात् जब प्राण भीतर से बाहर निकलने लगे तब उस से विरुद्ध उस को न निकलने देने के लिये बाहर से भीतर ले और जब बाहर से भीतर आने लगे तब भीतर से बाहर की ओर प्राण को धक्का देकर रोकता जाय। ऐसे एक दूसरे के विरुद्ध क्रिया करें तो दोनों की गति रुक कर प्राण अपने वश मे होने से मन और इन्द्रियें भी स्वाधीन होते हैं। बल पुरुषार्थ बढकर बुद्धि तीव्र सूक्ष्म रूप हो जाती है कि जो बहुत कठिन और सूक्ष्म विषय को भी शीघ्र ग्रहण करती है। इस से मनुष्य शरीर में वीर्य्य वृद्धि को प्राप्त हो कर स्थिर बल पराक्रम जितेन्द्रियता सब शास्त्रों को थोड़े ही काल में समझ कर उपस्थित कर लेगा। स्त्री भी इसी प्रकार योगाभ्यास करे।” (स० प्र० तृतीय समु॰)

व्यास भाष्य : कौष्ठ्यस्य वायोर्नासिकापुटाभ्यां प्रयत्नविशेषाद्वमनं प्रच्छर्दनम्। विधारणं प्राणायामः। ताभ्यां वा मनसः स्थितिं सम्पादयेत्॥

हिंदी में अर्थ : (कौष्ठ्यस्य वायोः) उदर के वायु को (नासिकापुटाभ्याम्) नासिका के दोनों छिद्रों के द्वारा (प्रयत्नविशेषात्) प्रयत्न विशेष से = योगशास्त्रीय रीति से (वमनम्) वमन की भाँति बाहर निकालना (प्रच्छर्दनम्) प्रर्च्छदन है; और (विधारणम्) उस वायु को प्रयत्नविशेष से वहाँ ही रोकना = धारण करना (प्राणायामः) प्राणायाम है। (वा) अथवा (ताभ्याम्) उन दोनों = प्रर्च्छदन और विधारण क्रिया के द्वारा (मनसः) मन की (स्थितिम्) स्थिति = स्थिरता का (सम्पादयेत्) सम्पादन करे॥

वैदिक योग मीमांसा : चित्त की स्थिरता हेतु दूसरे उपाय को बताते हुए महर्षि पतञ्जलि ने प्राणायाम का विधान किया है। प्रच्छर्दन और विधारण रूपी क्रियाओं के द्वारा चित्त की स्थिरता के सम्पादन का निर्देश इस सूत्र में किया गया है। वायु को उदर से वेग पूर्वक बाहर निकालना प्रच्छर्दन और उस वायु को वहाँ ही रोकना विधारण कहाता है। इन दोनों क्रियाओं के द्वारा योगमार्ग के पथिक का चित्त, स्थिरता को प्राप्त होकर, आत्मा की स्थिरता का साधन बन जाता है। प्राणायाम के शेष तीनों भेदों का वर्णन महर्षि पतञ्जलि ने साधनपाद के दो सूत्रों २.५०-५१ में किया है। महर्षि दयानन्द ने प्रसंगवशात् व्याख्या करते हुए प्राणायाम के चारों भेदों का वर्णन इस सूत्र की व्याख्या के साथ कर दिया है।

प्राणायाम हेतु प्रच्छर्दन और विधारण रूपी क्रियाओं को करने के साथ-साथ महर्षि दयानन्द ने “ओ३म्” के जप का विधान भी किया है। और इसका लाभ बताते हुए कहा है कि इससे आत्मा और मन की पवित्रता और स्थिरता होती है। इस प्रकार से प्राणायाम के साथ “ओ३म्” जप का विधान महर्षि पतञ्जलि की भावना के ही अनुकूल है। महर्षि पतञ्जलि के अनुसार ईश्वरप्रणिधान का सम्पादन, योग मार्ग के पथिक को अपनी सभी क्रियाओं के साथ ही करना चाहिए, जिससे कि समाधि की सिद्धि और समाधि के फल कैवल्य का लाभ अतिशीघ्र हो सके।

वस्तुतः प्राणायाम की महत्ता का वर्णन वेदादि सत्यशास्त्रों में बहुत स्थानों पर हुआ है। उपनिषदों में प्राण की इन्द्रियों पर श्रेष्ठता का वर्णन करने हेतु एक आख्यायिका आयी है। प्रश्नोपनिषद् के द्वितीय प्रश्न, बृहदारण्यक० १.३ तथा छान्दोग्योपनिषद ५.१ में इस आख्यायिका का वर्णन है; जिसमें वाणी, नेत्र, श्रोत्र, मन आदि पर प्राण की श्रेष्ठता को दिखाया है। वाणी, नेत्र, मन आदि इन्द्रियों के न रहने से भी शरीर का व्यापार चालू रहता है, परन्तु प्राण के उत्क्रमण करने पर इस शरीर में कोई भी इन्द्रिय स्थित नहीं रह पाती और सभी की सभी इन्द्रियाँ प्राण के साथ ही उत्क्रमण करने लगती हैं। प्राण के शरीर में प्रतिष्ठित होने पर ही सभी इन्दियाँ शरीर में प्रतिष्ठित होती हैं। अतः प्राण नियन्त्रण से ही मन = चित्त और सभी इन्दियों पर नियन्त्रण सम्भव है। इसी तथ्य को महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश के प्रथम समुल्लास में अथर्व० ११.४.१ के आधार पर कहा है — “जैसे प्राण के वश सब शरीर, इन्द्रियाँ होती हैं वैसे परमेश्वर के वश में सब जगत् रहता है।” भोज ने इस सूत्र के भाष्य में उपनिषदों की भावना के अनुरूप इस तथ्य को इस प्रकार से कहा है — “सर्वासामिन्द्रियवृत्तीनां प्राणवृत्तिपूर्वकत्वात्, मनः-प्राणयोश्च स्वव्यापारेपरस्परमेकयोगक्षेमत्वात्, क्षीयमाणः प्राणः समस्तेन्द्रियवृत्ति- निरोधद्वारेण चित्तस्यैकाग्रतायां प्रभवति।” अर्थात् सभी इन्द्रियों की वृत्तियों का प्राण वृत्ति के अनुसार होने से, मन और प्राण दोनों का अपने-अपने व्यापार में परस्पर = एक दूसरे के प्रति एक योग क्षेम वाला होने के कारण प्राणायाम के द्वारा क्षीण = निर्बल हुआ प्राण, समस्त इन्द्रियों की वृत्तियों के निरोध के द्वारा, चित्त की एकाग्रता में समर्थ होता है।

मनुस्मति में भी प्राणायाम से इन्द्रियों के दोषों का क्षय होना कहा है —

दह्यन्ते ध्यायमानानां धातूनां हि यथा मलाः। तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात्॥ मनु॰ ६.७१॥

जैसे अग्नि में तपाने और गलाने से सुवर्णादि धातुओं का मल नष्ट होकर शुद्ध होता है वैसे प्राणायाम करके मन आदि इन्द्रियों के दोष क्षीण होकर निर्मल हो जाते हैं। (स० प्र० तृतीयसमु॰) अतः इस प्रकार दोषों का क्षय हो जाने पर चित्त की एकाग्रता सम्भव होती है।

महर्षि दयानन्द ने इस सूत्र पर व्याख्यान करते हुए प्राणायाम से दो लाभों का होना कहा है। प्रथम लाभ यह है कि प्राण के वश में होने से मन और इन्दियाँ भी आत्मा के आधीन होती हैं। इससे वीर्य लाभ होकर, बल पुरुषार्थ बढ़कर बुद्धि तीव्र सूक्ष्मरूप हो जाती है कि जो बहुत कठिन और सूक्ष्म विषय को भी शीघ्र ग्रहण करती है। दूसरा लाभ बताते हुए कहा है कि प्राण के स्थिर होने से मन, और मन के स्थिर होने से आत्मा स्थिर होता है। इन तीनों के स्थिर होने से आत्मा परमात्मा के स्वरूप में मग्न हो सकता है। इसके परिणामस्वरूप ही आत्मा बारम्बार परमात्मा के स्वरूप में गोता लगाते हुआ मग्न होता है।

वेद में प्राणायाम से मनोनिग्रह और परमात्मप्राप्ति का उपदेश है। भोज ने भी स्पष्ट रूप से कहा है “समस्तदोषक्षयकारित्वञ्चास्यागमे श्रूयते” अर्थात् वेद में प्राणायाम के प्रभाव से समस्त दोषों का क्षय = नाश होना सुना जाता है। इस विषय में वेद के कुछ प्रमाण यहाँ उपस्थित हैं —

प्र वा॒युमच्छा॑ बृह॒ती म॑नी॒षा बृ॒हद्र॑यिं वि॒श्ववा॑रं रथ॒प्राम्। ॥ ऋ० ६.४९.४॥

इस मन्त्र के भावार्थ में महर्षि दयानन्द लिखते हैं — ये मनुष्याः शुद्धया बुद्धया योगाभ्यासेन च सर्वसुखप्रदं सर्वजगद्धरं वायुं प्राणायामे वशीकुर्वन्ति ते सर्वाणि सुखानि प्राप्नुवन्ति॥ अर्थात् जो मनुष्य शुद्ध बुद्धि और योगाभ्यास से सर्व सुख देने तथा सर्व जगत् के धारण करने वाले पवन को प्राणायाम से वश में करते हैं वे सर्वसुख को प्राप्त होते हैं॥

अगले मन्त्र के भावार्थ में महर्षि दयानन्द प्राणायाम के महत्त्व को और अधिक कहते हैं — हे मनुष्या येन वायुना योगिनो विविधं विज्ञानं प्राप्नुवन्ति येन सर्वं जगत्सर्वे प्राणिनश्य जीवन्ति तदभ्यासेन परमात्मानं विदित्वा मुक्तिपथेनानन्दं प्राप्नुत॥ (ऋ० ६.४९.५) अर्थात् हे मनुष्यों ! जिस वायु से योगीजन विविध प्रकार के विज्ञान को प्राप्त होते हैं तथा जिससे सब जगत् वा सब प्राणी जीते हैं उसके अभ्यास से परमात्मा को जानकर मुक्ति पथ से आनन्द को प्राप्त होओ।

यजु॰ १९.९० के भावार्थ में महर्षि दयानन्द कहते हैं — यथा धार्मिको न्यायाधीशः प्रजा रक्षति, तथैव प्राणायामादिभिः संसाधिताः प्राणा योगिनं सर्वेभ्यो दुःखेभ्यस्त्रायन्ते॥ अर्थात् जैसे धार्मिक न्यायाधीश प्रजा की रक्षा करता है वैसे ही प्राणायाम आदि से सिद्ध हुए प्राण योगी को सब दुःखों से बचाते हैं।

यु॒ञ्जनि्॑त ब्र॒ध्नम॑रु॒षं चर॑न्तं॒ परि॑ त॒स्थुषः॑। रोच॑न्ते रोच॒ना दि॒वि॥ ऋ० १.६.१॥

अर्थात् सब पदार्थों की सिद्धि का मुख्य हेतु प्राण है उसको प्राणायाम की रीति से अत्यन्त प्रीति के साथ परमात्मा में युक्त करते हैं। इसी कारण वे लोग मोक्ष को प्राप्त होके सदा आनन्द में रहते हैं॥ (ऋ० भू॰ उपासनाविषय)

अग्निर्यत्राभिमथ्यते वायुर्यत्राभियुज्यते। सोमोयत्रातिरिच्यते तत्र संजायते मनः॥ (श्वेता॰ २.६)

अर्थात् बहुत साधनों द्वारा ज्ञानाग्नि का उद्दीपन करके यमनियमादि सहित प्राणायाम के अभ्यास और भोग की तृष्णा के त्याग से मन शुद्ध समाहित और स्थिर हो जाता है।

प्राणान प्रपीड्येह स युक्तचेष्टः क्षीणे प्राणे नासिकयोच्छ्वसीत। दुष्टाश्वयुक्तमिव वाहमेनं विद्वान्मनो धारयेताप्रमत्तः॥ (श्वेता॰ २.९)

अर्थात् वह प्राणायाम का अभ्यास करने वाला योगी पुरुष, शरीर की चेष्ठा को शान्त कर, बार-बार रोकने द्वारा प्राण के गमन आगमन को शान्तप्रवाह से चलने वाला करके, इन्द्रियों को जीत सकता है। दुष्ट घोडे़ जिसमें जुड़े हो, ऐसे रथ के तुल्य दुष्ट इन्द्रियरूप घोड़ों से युक्त शरीर रथ को जानता हुआ, प्रमाद न करके लगाम रूप मन को दृढ़ता से पकड़े रहे। अतः प्राण की चेष्टा के स्थिर होने से इन्द्रियों की शक्ति के शान्त होने पर भी, बीच-बीच आत्मा के किंचित् भी भूल जाने पर, वे इन्द्रिय फिर-फिर विषयों की ओर भंडियाये पशु के समान भागते हैं। इस कारण इन्द्रियों के रुकने से चित्त के एकाग्र होने पर भी दुष्ट घोड़ों के समान इन्द्रियों को जानता रहे।

इस प्रकार हम देखते हैं कि प्राणायाम से मनोनिग्रह, चित्त के दोषों का क्षय, चित्त की स्थिति संस्थापन और आत्मोन्नति तो होती ही है; तथा साधक के परम लक्ष्य परमात्मप्राप्ति में भी प्राणायाम परम सहायक है।