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Samaadhi Paada / Trance / 36
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Samaadhi Paada / Trance / 36

विशोका वा ज्योतिष्मती॥३६॥

Padas Name : Samaadhi Paada / Trance | Sutra No : 36

In Hindi:

पदपाठ : विशोका वा ज्योतिष्मती॥

हिंदी में अर्थ : (वा) अथवा चित्त की (विशोका) शोकरहित, वासना रहित, सन्तुष्टरूप; और (ज्योतिष्मती) प्रकाश स्वरूप प्रवृत्ति भी मन की स्थिति को बाँधने वाली होती है॥

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : इस सूत्र पर हुगली शास्त्रार्थ (प्रतिमापूजन विचार) में महर्षि दयानन्द सरस्वती कहते हैं —

“इसमें यह देखना चाहिये कि ह्रदय में धारणा चित्त की लिखी। इससे निर्मल प्रकाशस्वरूप चित्त होता है। जैसा सूक्ष्म विभु आकाश है, वैसी ही योगी की बुद्धि होती है। तत्र नाम अपने ह्रदय में विशाल स्थिति के होने से, बुद्धि की जो शुद्ध प्रवृत्ति, सोई बुद्धि सूर्य, चन्द्र, ग्रह, मणि इन्हों की, जैसी प्रभा, वैसे ही योगी की बुद्धि समाधि में होती है।

तथा अस्मिता मात्र अर्थात् यह मेरा स्वरूप है, ऐसा साक्षात्कार स्वरूप का ज्ञान बुद्धि को जब होता है, तब चित्त निस्तरंग, अर्थात् निष्कम्प समुद्र की नाई एकरस व्यापक होता है। तथा शान्त, निरुपद्रव, अनन्त अर्थात् जिसकी सीमा न होवे, वही मेरा स्वरूप है, अर्थात् मेरा आत्मा है, सो विगत अर्थात् शोकरहित जो प्रवृत्ति ही विषयवती प्रवृत्ति कहाती है। उसको अस्मितामात्र प्रवृत्ति कहते हैं। तथा ज्योतिष्मती भी उसी को कहते हैं। योगी का जो चित्त है, सोई चन्द्रादित्य आदि स्वरूप का हो जाता है।”

व्यास भाष्य : प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धनीत्यनुवर्त्तते। हृदयपुण्डरीके धारयतो या बुद्धिसंवित्, बुद्धिसत्त्वं हि भास्वरमाकाशकल्पम्, तत्र स्थितिवैशारद्यात्प्रवृत्तिः सूर्येन्दुग्रहमणिप्रभारूपाकारेण विकल्पते। तथाऽस्मितायां समापन्नं चित्तं निस्तरङ्गमहोदधिकल्पं शान्तमनन्तमस्मितामात्रं भवति।

यत्रेदमुक्तम् — तमणुमात्रमात्मानमनुविद्याऽस्मीत्येवं तावत्सम्प्रजानीत इति। एषा द्वयी विशोका विषयवती, अस्मितामात्रा च प्रवृत्तिर्ज्योतिष्मतीत्युच्यते, यया योगिनश्चित्तं स्थितिपदं लभत इति॥

हिंदी में अर्थ : (प्रवृत्तिः उत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धनी इति अनुवर्त्तते) “प्रवृत्ति उत्पन्न हुई मन की स्थिति को बाँधने वाली होती है” यह पूर्व सूत्र से अनुवृति आती है। (हृदयपुण्डरीके) हृदय कमल में (धारयतः) धारणा करते हुए योगी को (या) जो (बुद्धिसंवित्) बुद्धि का ज्ञान = साक्षात्कार होता है, वह (बुद्धिसत्त्वम्) बुद्धि वस्तु (हि) निश्चयरूप से (भास्वरम्) प्रकाशरूप (आकाशकल्पम्) आकाश के समान होती है; (तत्र) वहाँ (स्थिति) चित्त की स्थिरता और (वैशारद्यात्) निर्मलता के कारण (प्रवृत्तिः) शुद्ध साक्षात्कार रूपी प्रवृत्ति, (सूर्येन्दुग्रहमणिप्रभारूपाकारेण) सूर्य, चन्द्र, ग्रह, मणि की प्रभा जैसी ही, (विकल्पते) उत्पन्न होती है।

(तथा) उसी प्रकार (अस्मितायाम्) अस्मिता = अपने आत्मस्वरूप में (समापन्नम्) समापन्न = समाहित हुआ (चित्तम्) चित्त (निस्तरङ्गमहोदधिकल्पम्) तरङ्गों से रहित = निष्कम्प समुद्र के समान (शान्तम्) शान्त = निरुपद्रव (अनन्तम्) महान् = विशाल = निस्मीम, (अस्मितामात्रम्) अस्मितामात्र = आत्मस्वरूपाकार = केवल आत्मानुभूति करने वाला (भवति) होता है। (यत्र) जिसके विषय में (इदमुक्तम्) यह कहा गया है — (तम्) उस (अणुमात्रम्) अणुमात्र = अत्यन्त सूक्ष्म रूप (आत्मानम्) ‘अपने’ आत्मा को (अनुविद्य) जानकर (अस्मि इति एवम्) “हूँ” इस प्रकार से (तावत्) उस समय (सम्प्रजानीत इति) आत्मानुभूति का सम्यक् ज्ञान करता है = साक्षात्कार करता है।

(एषा द्वयी) यह दो प्रकार की (विशोका) विशोका (प्रवृत्ति) है — पहली (विषयवती) विषयवती = बुद्धिसंवित् रूपा (च) और दूसरी (अस्मितामात्रा) अस्मितामात्र (प्रवृत्तिः) प्रवृत्ति, जोकि (ज्योतिष्मती) ज्योतिष्मती (इति उच्यते) कही जाती हैं। (यया) जिस ज्योतिष्मती प्रवृत्ति से (योगिनः) साधक योगी का (चित्तम्) चित्त (स्थितिपदम्) एकाग्रता = स्थिरता को (लभत इति) प्राप्त करता है॥

वैदिक योग मीमांसा : चित्त की एकाग्रता सम्पादन का एक अन्य महत्त्वपूर्ण साधन बताते हुए महर्षि पतञ्जलि कहते है कि चित्त की शोकरहित, वासना रहित प्रवृत्ति और ज्ञानरूप ज्योतिष्मती प्रवृत्ति भी मन की स्थिति को बाँधने वाली होती है।

महर्षि पतञ्जलि ने योगसूत्र ३.४९ में सत्त्वपुरुषान्यताख्याति से योगी को सर्वभावाधिष्ठातृत्व और सर्वज्ञातृत्व की प्राप्ति को कहा है। इस सूत्र पर भाष्य करते हुए महर्षि व्यास ने उपरोक्त सर्वज्ञातृत्व को “विशोका” नामक सिद्धि कहा है, जिसे प्राप्त कर योगी सर्वज्ञ अर्थात् विवेकज्ञान से युक्त हो जाता है। इसका अभिप्राय यह है कि योगी को भूत, वर्त्तमान और भविष्यत् धर्मों के रूप में स्थित सभी रूपों वाले गुणों का बिना किसी क्रम के विवेकज्ञान होता है। इसी विशिष्ट स्थिति के सन्दर्भ में इस सूत्र के भाष्य को यहाँ समझना चाहिए।

ह्रदयकमल में धारणा करने वाले साधक को बुद्धि का ज्ञान = साक्षात्कार होता है। वह बुद्धि कैसी होती है ? वह बुद्धि ज्ञानस्वरूप सूक्ष्म आकाश के समान विभु! अर्थात् योगी की बुद्धि की जो शुद्ध प्रवृत्ति होती है वह सूक्ष्म तत्त्वों का ज्ञान कराने वाली, आकाशवत् व्यापक = विशाल होती है। इसकी पवित्रता = शुद्धता के लिए महर्षि व्यास ने सूर्य आदि की प्रभा का उदाहरण दिया है। जैसे सूर्य आदि की प्रभा = ज्योति जगत् में अन्धकार का नाश कर पदार्थों का सम्यक् ज्ञान कराने में सहायक होती है, वैसे ही योगी की बुद्धि अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश करती हुई सूक्ष्म एवं सूक्ष्मतम तत्त्वों के साक्षात्कार में सहायक होती है। इसे ही ज्योतिष्मती प्रवृत्ति कहा है। आत्मपक्ष में ज्योति का अर्थ ज्ञान होता है। आत्मा ज्ञानस्वरूप होने से ही उसके स्वरूप में प्रवृत्ति को ही ज्योतिष्मती प्रवृत्ति कहा जाता है। इसी भावना को महर्षि दयानन्द ने भी स्पष्ट रूप से कहा है।

इसी प्रकार अस्मितामात्र = अपने आत्मस्वरूप में समाहित होने पर, जब बुद्धि में आत्मस्वरूप अनुभूति का ज्ञान होता है, तब चित्त निस्तरङ्ग = वृत्तियों की तरङ्गों से रहित हुआ प्रशान्त = परम शान्त समुद्र के समान एकरस, अनन्त = सर्वत्र आत्मानुभूति करने वाला होता है। (चित्त प्रकृति का विकार होने से अनन्त नहीं हो सकता।) देखो, छान्दोग्योपनिषद् का ऋषि कहता है — मनो ब्रह्मेत्युपासीतेत्यध्यात्म् (३.१८.१) अर्थात् अध्यात्म पक्ष में मन को ब्रह्म कहा है, इसका तात्पर्य है कि मन सभी इन्द्रियों में अतिशय श्रेष्ठ तथा वृत्यानुसार व्यापक गति वाला है। इस प्रकार से मन के गुणों का ग्रहण करें। छान्दोग्योपनिषद् के इसी प्रवाक में अधिदैवत पक्ष को इस प्रकार से कहा है — “अथाधिदैवतमाकाशो ब्रह्मेत्युभयमादिष्टम्॥” अर्थात् अधिदैवत यह है कि आकाश महाभूतों में सर्वश्रेष्ठ एवं अतिशय बड़ा है, यह जानकर इसका विचार करें। इसी भाव को ध्यान में रखकर ही ऋषियों ने मन = चित्त को आकाशवत् विभु कहा है।

ऐसी ज्ञानमय अनुभूति के अभ्यास से योगी के चित्त में सभी शोक, वासनाओं का अन्त हो जाता है। इस वृत्ति को विशोका प्रवृत्ति कहा जाता है। इस विषय में महर्षि व्यास ने पंचशिखाचार्य का एक वाक्य उद्धृत किया है — “तमणुमात्रमात्मानमनुविद्याऽस्मीत्येवं तावत्संप्रजानीत इति” अर्थात् उस अणुमात्र = अत्यन्त सूक्ष्म रूप अपने आत्मा को जानकर, अपनी सत्ता रूप “हूँ” इस प्रकार से उस समय आत्मानुभूति का साक्षात्कार करता है। उपरोक्त उद्धरण में “अस्मि” शब्द से पूर्व “अहम्” शब्द का प्रयोग नहीं किया गया। अर्थात् इस अवस्था में योगी ने अंहकार नामक तत्त्व के साक्षात्कार की अवस्था को भी पार कर लिया होता है। मात्र अपनी सत्ता रूप अनुभूति का चित्त के माध्यम से होना माना गया है। यह अवस्था “अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि” की प्राप्ति की है, जिसमें चित्त के माध्यम से आत्मानुभूति का वर्णन है।

आत्मानुभूति से सभी प्रकार के शोकों का अन्त हो जाता है। महर्षि व्यास ने तो योग १.४७ के भाष्य में कहा है — “प्रज्ञाप्रासादमारुह्य अशोच्यः शोचतो जनान्। भूमिष्ठानिव शैलस्थः सर्वान्प्राज्ञोऽनुपश्यति॥” अर्थात् प्रज्ञाप्रसाद = चित्त की निर्मलता को प्राप्त होकर शोकादि से रहित होकर बुद्धिमान् योगी शोक करने वाले दूसरे अयोगी मनुष्यों को ऐसे देखता है जैसे पर्वत पर स्थित मनुष्य नीचे भूमि पर स्थित मनुष्यों को देखता है। निर्विचार सम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में हुए मूल प्रकृति पर्यन्त सभी सूक्ष्म पदार्थों के साक्षात्कार से उत्पन्न वैशारद्य से, अगर ऐसी स्थिति होती है तो आत्मानुभूति से शोकरहित अवस्था का होना स्वाभाविक ही है। “तत्र॒ को मोहः॒ कः शोक॑ऽएक॒त्वम॑नुपश्य॑तः॥” यजु॰ ४०.७ के भावार्थ में महर्षि दयानन्द लिखते हैं कि संन्यासी सभी प्राणियों को आत्मवत् देखता हुआ मोह और शोक से रहित हो जाता है। आत्मानुभूति से ही योगी वास्तव में शोकरहित होता है।

अतः इस अवस्था में योगी शोकरहित = विशोका प्रवृत्ति के आश्रय से चित्त की स्थिति सम्पादन को प्राप्त होता है। इसी शोक रहित विशोका प्रवृत्ति को ही महर्षि दयानन्द ने अस्मितामात्र प्रवृत्ति कहा है और इसी को ही ज्योतिष्मती प्रवृत्ति भी कहा जाता है। इस ज्योतिष्मती प्रवृत्ति में संयम करने वाले योगी को सूक्ष्म, व्यवहित और विप्रकृष्ट विषयों के ज्ञान की प्राप्ति योगसूत्र ३.२५ में प्रतिपादित की है। इस विभूति के रहस्य को समझने हेतु विशोका प्रवृत्ति को हृदयङ्गम करना आवश्यक है।

उपरोक्त प्रवृत्ति से सम्पादित हुई चित्त की स्थिरता को भी योगी का अन्तिम लक्ष्य नहीं माना गया है।