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Samaadhi Paada / Trance / 42
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Samaadhi Paada / Trance / 42

तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः सङ्कीर्णा सवितर्का समापत्तिः॥४२॥

Padas Name : Samaadhi Paada / Trance | Sutra No : 42

In Hindi:

पदपाठ : तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः सङ्कीर्णा सवितर्का समापत्तिः॥

हिंदी में अर्थ : (तत्र) उन समापत्तियों में (शब्दार्थज्ञानविकल्पैः) शब्द, अर्थ और ज्ञान के विकल्पों = भेदों = रूपों से (सङ्कीर्णा) मिश्रित हुई = मिली हुई (सवितर्का) सवितर्क (समापत्तिः) समापत्ति = सम्प्रज्ञात समाधि होती है॥

व्यास भाष्य : तद्यथा गौरिति शब्दो गौरित्यर्थो गौरिति ज्ञानमित्यविभागेन विभक्तानामपि ग्रहणं दृष्टम्। विभज्यमानाश्चान्ये शब्दधर्मा अन्येऽर्थधर्मा अन्ये ज्ञानधर्मा इत्येतेषां विभक्तः पन्थाः। तत्र समापन्नस्य योगिनो यो गवाद्यर्थः समाधिप्रज्ञायां समारूढः स चेच्छब्दार्थज्ञानविकल्पानुविद्ध उपावर्त्तते सा संकीर्णा समापत्तिः सवितर्केत्युच्यते॥

हिंदी में अर्थ : (तद्यथा) जैसे कि (गौः इति) ‘गौः’ यह (शब्दः) कण्ठ, जिह्वा और तालु के संयोग से उच्चारण होने वाला तथा श्रोत्र इन्द्रिय से ग्रहण होने वाला ध्वनिरूप ‘शब्द’ है; (गौः इति) ‘गौः’ यह (अर्थः) इस शब्द से लक्षित सास्ना आदि युक्त शरीर = पिण्ड वाला पशु विशेष ‘अर्थ’ है; और (गौः इति) ‘गौः’ (ज्ञानम्) गोपदार्थाकार कारित बुद्धि वृत्ति ‘ज्ञान’ है। (इति) इस प्रकार (विभक्तानाम्) गौ शब्द, गौ अर्थ तथा गौ ज्ञान = इन तीनों विभक्त = परस्पर भिन्न-भिन्न का (अपि) भी (अविभागेन) अभेद रूप से = एक रूप से (ग्रहणम्) ग्रहण किया जाना = व्यवहार किया जाना (दृष्टम्) देखा जाता है।

(च) और विवेचना = विचार किये जाने से ये तीनों (विभज्यमानाः) भिन्न-भिन्न हैं क्योंकि (शब्दधर्माः) शब्द के धर्म — कण्ठ, जिह्वा आदि के संयोग, उदात्त आदि ध्वनि से उच्चारित होना आदि (अन्ये) अन्य = भिन्न है; (अर्थधर्माः) अर्थ के धर्म — रूप, आकार, जडत्व आदि से युक्त होना (अन्ये) अन्य = भिन्न है; और (ज्ञानधर्माः) ज्ञान के धर्म — बुद्धि वृत्ति रूप प्रकाशत्व आदि (अन्ये) अन्य = भिन्न हैं; (इति) इस प्रकार (एतेषाम्) इन तीनों का (विभक्तः पन्थाः) मार्ग = अस्तित्व भिन्न-भिन्न है। (तत्र) उस गौ आदि विषय में (समापन्नस्य) समाहित = समाधि को प्राप्त (योगिनः) योगी की (समाधिप्रज्ञायाम्) समाधिप्रज्ञा में (यः) जो (गवादि) गौ आदि (अर्थः) अर्थ (समारूढः) उपस्थित है (सः) वह (चेत्) यदि (शब्दार्थज्ञानविकल्पानुविद्धः) शब्द, अर्थ और ज्ञान के विकल्प से मिला हुआ = एकरूप होता हुआ (उपावर्त्तते) भासित होता है तो (सा) वह (संकीर्णा) तीनों से मिश्रित = मिली-जुली (समापत्तिः) समापत्ति (सवितर्का इति उच्यते) सवितर्क सम्प्रज्ञात समाधि कही जाती है॥

वैदिक योग मीमांसा : सम्प्रज्ञात समाधि के वितर्कानुगत भेद में स्थूल पदार्थों के सम्प्रज्ञान = साक्षात्कार होता है। उस वितर्कानुगत सम्प्रज्ञात समाधि का एक भेद सवितर्क है। इस सवितर्क समाधि मेंं योगी को किसी भी विषय के शब्द, अर्थ और ज्ञान के भेद का पृथक्-पृथक् बोध न होकर इन तीनों के मिश्रण = मिले-जुले रूप की अनुभूति = प्रतीति होती है। सूत्रकार ने इसके लिए “शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा” कहा है। इसको समझाने हेतु महर्षि व्यास ने “गौ” का उदाहरण लिया है, जिसे इस प्रकार समझना चाहिए —

गौ-शब्द — गौ शब्द से तात्पर्य किसी व्यक्ति द्वारा कण्ठ, तालु आदि के संयोग से उच्चारित होने वाला और श्रोत्र इन्द्रिय द्वारा ग्रहण होने वाला ध्वनिरूप है। और इस उच्चारित शब्द के धर्म — उदात्त आदि ध्वनियों से बोला जाना, मुख से उच्चारित होना, श्रोत्र इन्द्रिय से ग्रहण होना आदि हैं।

गौ-अर्थ — गौ शब्द से लक्षित सींग, सास्नादि युक्त शरीर = पिण्ड वाला पशु विशेष इस का अर्थ है। इस अर्थ के धर्म — रंग, रूप, आकार-प्रकार, जडत्व आदि हैं।

गौ-ज्ञान — बुद्धि में गौ पदार्थाकार कारित वृत्ति ज्ञान कहाता है। इस ज्ञान के धर्म — पदार्थ के स्वरूप को प्रकाशित करना, विषय और इन्द्रिय के सन्निकर्ष से उत्पन्न होना आदि है।

किसी भी विषय का शब्द, अर्थ और ज्ञान से भिन्न होता है; इसी प्रकार अर्थ, शब्द और ज्ञान से भिन्न होता है; और ज्ञान भी शब्द और अर्थ से भिन्न होता है। परन्तु लोक व्यवहार में ये तीनों पृथक्-पृथक् होते हुए भी मिश्रित = मिले-जुले रूप से व्यवहृत होते हैं। न केवल शब्द, अर्थ और ज्ञान ही वरन् इन तीनों के धर्म भी भिन्न-भिन्न हैं, जैसा कि ऊपर दिखाया गया है। अतः इन तीनों के भेद होने पर भी अभेद रूप = एक रूप से प्रतीति = अनुभव होने को ही विकल्प कहा गया है। किसी वक्ता द्वारा “गौ” शब्द बोले जाने पर वहाँ पर गौ के उपस्थित न होते हुए भी, श्रोता को इस शब्द के साथ-साथ “गौ” अर्थ और “गौ” ज्ञान का भी ज्ञान होता है। इसी प्रकार “गौ” अर्थ को देखने पर “गौ” शब्द और “गौ” ज्ञान का भी बोध साथ-साथ होता है। और “गौ” ज्ञान स्मृत होने पर “गौ” शब्द और “गौ” अर्थ की भी प्रतीति होती है। वास्तव में तीनों शब्द, अर्थ और ज्ञान एक न होते हुए भी “गौ” इस शब्द से ज्ञानानुपाती जो एकत्व ज्ञान है, वह विकल्प है; अर्थात् एक के होने पर शेष दो का भी उपस्थित हो जाने से इन तीनों की मिश्रित प्रतीति ही विकल्प वृत्ति है।

साधक = योगी को समाधि की जिस अवस्था में, किसी स्थूल विषय के “अर्थ” के साक्षात्कार के साथ-साथ उस विषय के “शब्द” और उस विषय के “ज्ञान” का भी बोध हो रहा हो, अर्थात् तीनों के मिश्रित रूप का बोध हो रहा हो, तो उस अवस्था को सवितर्क सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं। समाधि में किसी भी विषय के “अर्थ” का साक्षात्कार तो लक्षित होता है परन्तु इस “अर्थ” साक्षात्कार के साथ-साथ आरम्भिक अवस्था में उस साधक को उस विषय के “शब्द” और “ज्ञान” का बोध भी समाधि काल में बना रहता है। वस्तुतः श्रवण-चतुष्ठय की प्रक्रिया के अनुसार सर्वप्रथम साधक को श्रवण / पठन के द्वारा किसी भी विषय के “शब्द” का ही बोध होता है, तथा मनन के द्वारा उस विषय का सम्यक् “ज्ञान” होता है; और फिर साधक के द्वारा निदिध्यासन और साक्षात्कार से, उसे विषय के “अर्थ” का सम्यक् साक्षात्कार होता है। यही “अर्थ” साक्षात्कार ही किसी विषय के सम्यग्ज्ञान हेतु अन्तिम लक्ष्य है, और इसी को समाधि के द्वारा प्राप्त किया जाता है। वितर्कानुगत सम्प्रज्ञात समाधि का विषय = आलम्बन स्थूल पदार्थ ही रहते हैं। इन स्थूल पदार्थों के आलम्बन से होने वाली समाधि में शब्द, अर्थ और ज्ञान के विकल्पों से संकीर्ण रूप से अनुभूति, वितर्कानुगत सम्प्रज्ञात समाधि का पहला भेद सवितर्क है।

वितर्कानुगत सम्प्रज्ञात समाधि का आलम्बन बनने वाले स्थूल विषयों का उल्लेख योग सूत्र १.१७ की व्याख्या में किया है। जो कि इस प्रकार हैं — पाँच स्थूल भूत (पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश), अंहकार के विकार एकादश इन्द्रियाँ (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और मन) — अर्थात् सभी अन्तिम कार्य पदार्थ। यथा व्यासभाष्य में गौ, घट आदि का उदाहरण लिया है, जो कि पृथिवी आदि महाभूतों से बने हैं, इन्द्रियों से ग्रहण होने वाले हैं। जैसा कि अन्य भाष्यकारों ने एकादश इन्द्रियों को स्थूल भूतों की अपेक्षा से सूक्ष्म होने से इनको स्थूल विषयों में नहीं माना है, तो यहाँ शंका होती है कि इन्हें वितर्कानुगत समाधि का आलम्बन = ध्येय विषय कैसे स्वीकार करें ? इस विषय पर प्रमाणों तथा तर्कों को योगसूत्र १.१७ की व्याख्या में दिया गया है।