Donation Appeal Download Our App
Samaadhi Paada / Trance / 51
Choose Sutra
Samaadhi Paada / Trance / 51

तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः॥५१॥

Padas Name : Samaadhi Paada / Trance | Sutra No : 51

In Hindi:

पदपाठ : तस्य अपि निरोधे सर्वनिरोधात् निर्बीजः समाधिः॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : किं चास्य भवति—

हिंदी में अर्थ : (च) और (अस्य) इस सम्प्रज्ञात समाधि के संस्कारों का (किम्) क्या (भवति) होता है —

हिंदी में अर्थ : परवैराग्य के अभ्यास द्वारा (तस्य) उस समाधिप्रज्ञा तथा उसके संस्कारों का (अपि) भी (निरोधे) निरोध किए जाने पर (सर्वनिरोधात्) चित्तगत सभी वृत्तियों एवं संस्कारों का निरोध होने पर (निर्बीजः समाधिः) निर्बीज समाधि = निरालम्बन समाधि = असम्प्रज्ञात समाधि होती है॥

व्यास भाष्य : स न केवलं समाधिप्रज्ञाविरोधी। प्रज्ञाकृतानामपि संस्काराणां प्रतिबन्धी भवति। कस्मात्? निरोधजः संस्कारः समाधिजान्संस्कारान्बाधत इति।

निरोधस्थितिकालक्रमानुभवेन निरोधचित्तकृतसंस्कारास्तित्वमनुमेयम्। व्युत्थाननिरोध-समाधिप्रभवैः सह कैवल्यभागीयैः संस्कारैश्चित्तं स्वस्यां प्रकृताववस्थितायां प्रविलीयते। तस्मात्ते संस्कारश्चित्तस्याधिकारविरोधिनो न स्थितिहेतवो भवन्तीति। यस्मादवसिताधिकारं सह कैवल्यभागीयैः संस्कारैश्चित्तं निवर्त्तते।

तस्मिन्निवृत्ते पुरुषः स्वरूपमात्रप्रतिष्ठोऽतः शुद्धः केवलो मुक्त इत्युच्यत इति॥

॥इति पातञ्जलयोगसूत्रे व्यासभाष्ये समाधिपादः प्रथमः॥

हिंदी में अर्थ : (सः) वह = असम्प्रज्ञात समाधि (केवलम्) केवल (समाधिप्रज्ञाविरोधी) समाधिप्रज्ञा की ही विरोधी (न) नहीं है; अपितु (प्रज्ञाकृतानाम्) उस समाधिप्रज्ञा कृत (संस्काराणाम्) संस्कारों का (अपि) भी (प्रतिबन्धी भवति) निरोध करती है। (कस्मात्) किस कारण से ? (निरोधजः संस्कारः) निरोधजन्य संस्कार (समाधिजान् संस्कारान्) सम्प्रज्ञात समाधि जन्य संस्कारों को = समाधिप्रज्ञा से उत्पन्न संस्कारों को (बाधते इति) बाधित करते हैं = निरुद्ध करते हैं।

यहाँ यह प्रश्न उठता है — क्या निरोध के भी संस्कार उत्पन्न होते हैं? समाधान करते हुए कहा है — (निरोधस्थितिकालक्रमानुभवेन) निरोध अवस्था के कालक्रम के अनुभव से (निरोधचित्तकृतसंस्काराः) निरोध चित्त कृत = निरुद्ध चित्त में उत्पन्न संस्कारों का (अस्तित्वम्) अस्तित्व (अनुमेयम्) अनुमान से जाना जाता है।

(व्युत्थाननिरोधसमाधिप्रभवैः) व्युत्थान = सम्प्रज्ञात समाधि पर्यन्त संस्कारों का निरोध करने वाली असम्प्रज्ञात समाधि से उत्पन्न संस्कार जो (कैवल्यभागीयैः) कैवल्य = मोक्षप्रापक (संस्कारैः) संस्कार है, उनके (सह) साथ (चित्तम्) चित्त (स्वस्याम्) अपनी (अवस्थितायाम् प्रकृतौ) अवस्थित प्रकृति में (प्रविलीयते) प्रविलीन = प्रलय को प्राप्त हो जाता है। (तस्मात्) इसलिए (ते संस्कारः) वे निरोध संस्कार (चित्तस्य) चित्त के (अधिकारविरोधिनः) अधिकारविरोधी = गुणाधिकार विरोधी = भोग प्राप्ति रूप कार्य सम्पादन के विरोधी होते हैं; (स्थितिहेतवः) चित्त की स्थिति = चित्त के बने रहने में कारण (न भवन्ति इति) नहीं होते, (यस्मात्) क्योंकि (अवसिताधिकारम् चित्तम्) समाप्त अधिकारों वाला = कृतकार्य हुआ चित्त (कैवल्यभागीयैः) कैवल्यभागीय = मोक्षप्रापक (संस्कारैः) संस्कारों के (सह) साथ (निवर्त्तते) निवृत्त हो जाता है। (तस्मिन्) उस चित्त के (निवृत्ते) निवृत्त होने पर (पुरुषः) पुरुष = आत्मा (स्वरूपमात्रप्रतिष्ठः) केवल अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित = स्थित हो जाता है; (अतः) उस समय अपने स्वरूप में स्थित होने से (शुद्धः केवलः मुक्तः) शुद्ध = त्रिगुणातीत, केवल, मुक्त (इति उच्यते इति) कहा जाता है॥

वैदिक योग मीमांसा : (विशेष :— इस सूत्र की व्याख्या को यथार्थ रूप में समझने हेतु योगसूत्र १.१६ तथा १.१८ पर व्यासभाष्य तथा व्याख्या को एक बार फिर से पढ़ लें)

सम्प्रज्ञात समाधि के अन्तर्गत योगी प्रकृति के स्थूल और सूक्ष्म विकारों तथा मूल प्रकृति का आलम्बन करता हुआ, इनके यथार्थ रूप का साक्षात्कार करता हुआ, इनको जड़, परिणामी, विकारी, संसारचक्र का कारण जानता हुआ, वैराग्य को प्राप्त हुआ, चेतन पुरुष = स्वयं का आलम्बन चित्त में करता है। सम्प्रज्ञात समाधि के अन्तिम स्तर = अस्मितानुगत में वह चित्त के माध्यम से स्वयं = आत्मा का आलम्बन करता हुआ स्वयं = आत्मा का सम्प्रज्ञान प्राप्त करता है। इस अवस्था में उसे अपने चैतन्य स्वरूप की अनुभूति होने से प्रकृति और प्रकृति के सभी विकार हेय लगते हैं। इस समाधिप्रज्ञा और उसके संस्कारों से, वह चित्तगत सभी व्युत्थान संस्कारों को बाधित कर देता है। परन्तु यह अवस्था भी योगी के लिए अन्तिम लक्ष्य नहीं है, क्योंकि चित्त का अधिकार = भोगोन्मुख वृत्ति अभी समाप्त नहीं हुई है। शुद्ध प्रकृष्ट सत्त्वगुण विशिष्ट यह समाधिप्रज्ञा उत्कृष्ट होते हुए भी, अभी चित्त के गुणाधिकार की विरोधी नहीं होती। इस अवस्था में जब चितिशक्ति = जीवात्मा को पुरुषख्याति के समक्ष यह विवेकख्याति = समाधिप्रज्ञा, जो कि शुद्ध सत्त्वगुण का ही परिणाम है, भी हेय लगती है, तब वह उससे भी विरक्त होकर उसका भी निरोध करना आरम्भ कर देता है। इस अवस्था में हुए पुरुषदर्शन अभ्यास से वह प्रकृति के सत्त्व, रज और तम गुणों के प्रति सर्वथा विरक्त होता है। इसी परवैराग्य के सम्यक् अभ्यास से वह निर्बीज समाधि = असम्प्रज्ञात समाधि को प्राप्त करता है।

महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि उस पूर्वोक्त समाधिप्रज्ञा और उसके संस्कारों का निरोध हो जाने पर, सर्वनिरोध = सभी का निरोध हो जाने पर साधक = योगी असम्प्रज्ञात समाधि को प्राप्त करता है। यहाँ सर्वनिरोध से अभिप्राय है कि चित्त की सभी वृत्तियों का सर्वथा निरोध होना = रुक जाना; न केवल सभी वृत्तियों का अपितु चित्तगत सम्प्रज्ञात समाधि काल तक बने सभी संस्कारों का भी निरोध हो जाने से असम्प्रज्ञात समाधि होती है। सम्प्रज्ञात समाधि को सबीज और सालम्बन समाधि कहा गया है, और असम्प्रज्ञात समाधि को निर्बीज और निरालम्बन समाधि। सबीज का अर्थ करते हुए महर्षि व्यास ने योग० १.४६ में कहा है “ताश्चतस्रः समापत्तयो बहिर्वस्तुबीजा इति समाधिरपि सबीजः।” अर्थात् वे चारों सवितर्क, निर्वितर्क, सविचार और निर्विचार समापत्तियाँ बाह्यवस्तुओं = पुरुष से भिन्न आलम्बनरूपी बीज वाली है; अतः समाधि भी सबीज होती है। निर्विचार समाधि के उपरान्त आनन्दानुगत में ह्लाद तथा अस्मितानुगत में पुरुष का आलम्बन चित्त के माध्यम से होता है। ये सभी आलम्बन चित्त के आश्रय से होते हैं। अतः सम्प्रज्ञात समाधि के सभी भेदों = प्रकारों में ध्येय विषयों का सम्प्रज्ञान चित्त के आश्रय से होने से ये सभी समाधियाँ सालम्बन कहलाती है। दूसरी ओर निर्बीज समाधि से अभिप्राय है कि योगी के ध्येय विषय के रूप में पुरुष अर्थात् जीवात्मा तथा परमात्मा ही होते हैं, न कि प्रकृति या उसके विकार रूपी बाह्य पदार्थ; और निरालम्बन से अभिप्राय है कि उपरोक्त ध्येय विषय भी अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि के समान चित्त के आलम्बन = आश्रय से नहीं होते। वस्तुतः परमात्मा की अनुभूति जड़ पदार्थ प्रकृति और उसके विकार चित्त के माध्यम से हो ही नहीं सकती। उपनिषद् का ऋषि इसका स्पष्ट रूप से प्रतिपादन कर रहा है — न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनो... (केन० १.३); तथा नैव वाचा न मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा। ... (कठो॰ ६.१२)। दूसरी ओर, परमात्मा जीवात्मा के अन्दर व्यापक होने और जीवात्मा के व्याप्य होने से परमात्मा ही उसका परम आन्तरिक एवं चेतन सखा है, और वही उसका लक्ष्य भी है। इस अवस्था में उसे = जीवात्मा को परमात्मा के साक्षात्कार के साथ स्वयं का साक्षात्कार भी हो जाता है। और वह अपने चैतन्य स्वरूप के द्वारा परमात्मा के स्वरूप में स्थित हो जाता है। इस अवस्था की प्राप्ति में “परवैराग्य” के सम्पादन की महती आवश्यकता है।

यह असम्प्रज्ञात समाधि चित्त की निरुद्धावस्था में होती है। चित्त के निरोध परिणाम की अवस्था को स्पष्ट करते हुए महर्षि पतञ्जलि कहते है — व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौ निरोधक्षणचित्तान्वयो निरोधपरिणामः॥ योग० ३.९॥ अर्थात् व्युत्थान संस्कारों का अभिभव और निरोध संस्कारों का प्रादुर्भाव होने पर निरोध क्षण = काल से चित्त का युक्त रहना चित्त का निरोध परिणाम है। अतः सभी व्युत्थान संस्कारों का अभिभव होने पर और निरोधावस्था के संस्कारों का क्रम चालू रहने से चित्त निरुद्धावस्था को प्राप्त हुआ निर्बीज = असम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति का कारण बनता है। इस प्रकार से निरुद्ध हुए चित्त में निरोध संस्कारों के प्रभाव से प्रशान्त = लगातार शान्त स्थिति बनी रहती है।

इस असम्प्रज्ञात समाधि में, परवैराग्य की उत्कृष्टता के कारण, सम्प्रज्ञात समाधि काल की समाधिप्रज्ञा और उसके संस्कारों का भी निरोध हो जाता है। यह अवस्था चित्त की निरुद्धावस्था कहलाती है, और इस निरुद्धावस्था के निरोधज संस्कार = निरोध समाधि के संस्कार, सम्प्रज्ञात समाधिजन्य संस्कारों को निरुद्ध करने में समर्थ होते हैं। क्योंकि इस काल में परवैराग्य के दीर्घकालिक, निरन्तर सेवन से योगी की प्रकृति के गुणों के प्रति तृष्णा का सर्वथा अभाव होने से, उसके लिए मात्र पुरुष = आत्मा और परमात्मा ही उपादेय रहते हैं। दूसरी और समाधिप्रज्ञा और उसके संस्कारों में प्रकृति के सत्त्वादि गुणों का समावेश रहता है।

यहाँ यह शंका उठायी गयी है कि “क्या निरुद्धावस्था के काल में = निरोध समाधि के भी संस्कार उत्पन्न होते हैं।” उत्तर में महर्षि व्यास कहते हैं कि निरोध अवस्था के कालक्रम के अनुभव से उस निरुद्ध चित्त में संस्कारों का अस्तित्व अनुमान से जाना जाता है। अर्थात् उस काल में निरोधज संस्कार बनते हैं परन्तु कालक्रम के अनुभव से उत्पन्न होने वाले संस्कारों को शब्द रूप में प्रकट करना सम्भवतः सम्भव नहीं है इसलिए महर्षि व्यास ने उनको अनुमान से जानने योग्य कहा है।

सम्प्रज्ञात समाधि की अपेक्षा से क्षिप्त, मूढ और विक्षिप्त अवस्था ही व्युत्थान अवस्था कहलाती है परन्तु असम्प्रज्ञात समाधि की अपेक्षा से सम्प्रज्ञात समाधि भी व्युत्थान अवस्था ही है। इस निर्बीज समाधि के संस्कार सम्प्रज्ञात समाधि तक के सभी संस्कारों को निरुद्ध करने वाले होते हैं, और ये निरोधज संस्कार कैवल्यभागीय अर्थात् मोक्ष को प्राप्त कराने वाले होते हैं। इन मोक्षप्रापक संस्कारों के साथ चित्त अपनी अवस्थित प्रकृति में प्रलय को प्राप्त हो जाता है। इसी कारण ये निरोध संस्कार चित्त के अधिकार विरोधी कहलाते हैं। चित्त का अधिकार है — भोग और अपवर्ग का सम्पादन करना = चित्त, प्रकृति का विकार होने से गुणों के अधिकारों को चालू रखता है अर्थात् जीवात्मा के लिए संसारचक्र = जन्म-मृत्यु-जन्म रूपी चक्र को निरन्तर चालू रखता है। इन निरोध संस्कारों से चित्त का अधिकार समाप्त हो जाता है, अर्थात् चित्त सत्त्व, रज, तम गुणों के कार्य का सम्पादन नहीं करता, भोगप्रदान अर्थात् जन्म-मृत्यु-जन्म = संसारचक्र को चालू नहीं रखता; अतः ये संस्कार चित्त की स्थिति को = सत्ता को बनाए रखने में कारण नहीं होते। इस प्रकार कृतकार्य हुआ चित्त अपने मोक्षप्रापक संस्कारों के साथ ही निवृत्त हो जाता है।

इस चित्त के निवृत्त होने पर पुरुष अपने शुद्ध स्वरूप मात्र में स्थित हो जाता है, वह केवल अर्थात् प्रकृति के सम्बन्ध से सर्वथा रहित, और मुक्त होता है; अर्थात् वर्त्तमान शरीर के वियोग के पश्चात् परमात्मा की व्यवस्था में मुक्ति को प्राप्त कर लेता है। इस अवस्था में जीवात्मा अपने शुद्ध चेतन स्वरूप में स्थित होता हुआ अपने में व्याप्त चेतन परमात्मा के स्वरूप में निमग्न हो जाता है। क्योंकि सर्वव्यापक परमात्मा स्थान और काल की दृष्टि से सर्वदा ही प्राप्त तथा जीवात्मा के अत्यन्त सन्निकट है। अतः इस अवस्था में जीवात्मा ज्ञानपूर्वक परमात्मा को प्राप्त करता हुआ उसके स्वरूप में निमग्न हो जाता है। यही उसकी स्वरूपस्थिति है यही उसका कैवल्य है॥

पुरुष को कैवल्य प्राप्ति हेतु महर्षि पतञ्जलि द्वारा प्रतिपादित सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात समाधियों के महत्त्वपूर्ण विधान को समझना होगा। महर्षि पतञ्जलि ने पुरुषविशेष ईश्वर का व्याख्यान करते हुए योगसूत्र १.२४ में उसे अन्य पुरुषों की अपेक्षा क्लेश, कर्म, विपाक और आशय = संस्कारों से सर्वथा असम्बद्ध कहा है। जबकि अन्य पुरुष अर्थात् जीवात्माएँ बन्धन काल में इनसे सम्बद्ध रहते हैं और इनकी निवृत्ति होने पर ही उनको कैवल्य की प्राप्ति होती है। अतः महर्षि पतञ्जलि ने इनकी निवृत्ति हेतु ही योगदर्शन में विधान किया है। धर्ममेघ-समाधि की प्राप्ति पर पुरुष के क्लेश और कर्म की निवृत्ति हो जाती है। धर्ममेघ-समाधि सम्प्रज्ञात समाधि की उच्चावस्था है। इस अवस्था में योगी के कर्म अशुक्ल-अकृष्ण हो जाते हैं। परन्तु अभी तक आशय = संस्कारों के बने रहने से चित्त कृतकृत्य नहीं होता, अतः बन्धन की स्थिति का नाश नहीं हुआ। तत्पश्चात् योगी चितिशक्ति = जीवात्मा की श्रेष्ठता को जानकर, इस स्थिति का भी निरोध कर, निर्बीज समाधि के द्वारा, सम्प्रज्ञात समाधि जन्य प्रज्ञा और इसके संस्कारों का भी निरोध करने में सक्षम होता हुआ उन संस्कारों को भी नष्ट करता है। इसी अवस्था में आकर ही चित्त कृतकृत्य होता है। इस निरुद्धावस्था के संस्कारों से चित्त का अधिकार समाप्त हो जाता है, और ये संस्कार चित्त की स्थिति को = सत्ता को बनाए रखने में कारण नहीं होते। अतः पुरुष की यह चरमदेह = अन्तिमदेह कहलाती है, और इस देह को त्याग कर पुरुष कैवल्य को प्राप्त कर लेता है।

॥इति सतीशार्यविरचितायां पातञ्जलयोगसूत्रव्यासभाष्यराजमार्तण्डवृत्तिव्याख्यायां

वैदिकयोगमीमांसायां समाधिपादः प्रथमः॥