अथ संन्याससंस्कारविधिं वक्ष्यामः
In Hindi:
संस्कृत में सूत्र की भूमिका : अथ संन्याससंस्कारविधिं वक्ष्यामः‘संन्यास संस्कार’ उस को कहते हैं कि जो मोहादि आवरण, पक्षपात छोड़के विरक्त होकर सब पृथिवी में परोपकारार्थ विचरे। अर्थात्—
सम्यङ् न्यस्यन्त्यधर्माचरणानि येन वा सम्यङ् नित्यं सत्यकर्मस्वास्त उपविशति स्थिरीभवति येन स ‘संन्यासः’। संन्यासो विद्यते यस्य स ‘संन्यासी’।
काल—प्रथम जो वानप्रस्थ के आदि में कह आये हैं कि ब्रह्मचर्य पूरा करके गृहस्थ और गृहस्थ होके वनस्थ, वनस्थ होके संन्यासी होवे। यह क्रम संन्यास, अर्थात् अनुक्रम से आश्रमों का अनुष्ठान करता-करता वृद्धावस्था में जो संन्यास लेना है, उसी को ‘क्रम संन्यास’ कहते हैं।
द्वितीय प्रकार— ‘यदहरेव विरजेत् तदहरेव प्रव्रजेद् वनाद् वा गृहाद् वा।‘ यह ब्राह्मणग्रन्थ का वाक्य है।
अर्थ—जिस दिन दृढ़ वैराग्य प्राप्त होवे उसी दिन, चाहे वानप्रस्थ का समय पूरा भी न हुआ हो, अथवा वानप्रस्थ आश्रम का अनुष्ठान न करके गृहाश्रम से ही संन्यासाश्रम ग्रहण करे। क्योंकि संन्यास में दृढ़ वैराग्य और यथार्थ ज्ञान का होना ही मुख्य कारण है।
तृतीय प्रकार— ‘ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत्’॥
यह भी ब्राह्मणग्रन्थ का वचन है।
यदि पूर्ण अखण्डित ब्रह्मचर्य, सच्चा वैराग्य और पूर्ण ज्ञान-विज्ञान को प्राप्त होकर विषयासक्ति की इच्छा आत्मा से यथावत् उठ जावे, पक्षपातरहित होकर सब के उपकार करने की इच्छा होवे, और जिस को दृढ़ निश्चय हो जावे कि मैं मरण-पर्यन्त यथावत् संन्यास-धर्म का निर्वाह कर सकूंगा तो वह न गृहाश्रम करे, न वानप्रस्थाश्रम, किन्तु ब्रह्मचर्याश्रम को पूर्ण कर ही के संन्यासाश्रम को ग्रहण कर लेवे।
अत्र वेदप्रमाणानि—
श॒र्य॒णाव॑ति॒ सोम॒मिन्द्रः॑ पिबतु वृत्र॒हा।
बलं॒ दधा॑न आ॒त्मनि॑ करि॒ष्यन् वी॒र्यं॑ म॒हद् इन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव॥1॥
आ प॑वस्व दिशां पत आर्जी॒कात् सो॑म मीढ्वः।
ऋ॒त॒वा॒केन॑ स॒त्येन॑ श्र॒द्धया॒ तप॑सा सु॒त इन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव॥2॥
अर्थ—मैं ईश्वर संन्यास लेनेहारे तुझ मनुष्य को उपदेश करता हूं कि जैसे (वृत्रहा) मेघ का नाश करनेहारा (इन्द्रः) सूर्य (शर्यणावति) हिंसनीय पदार्थों से युक्त भूमितल में स्थित (सोमम्) रस को पीता है, वैसे संन्यास लेनेवाला पुरुष उत्तम मूल फलों के रस को (पिबतु) पीवे और (आत्मनि) अपने आत्मा में (महत्) बड़े (वीर्यम्) सामर्थ्य को (करिष्यन्) करूंगा, ऐसी इच्छा करता हुआ (बलं दधानः) दिव्य बल को धारण करता हुआ (इन्द्राय) परमैश्वर्य के लिए, हे (इन्दो) चन्द्रमा के तुल्य सब को आनन्द करनेहारे पूर्ण विद्वान् तू संन्यास लेके सब पर (परि स्रव) सत्योपदेश की वृष्टि कर॥1॥
हे (सोम) सोम्यगुणसम्पन्न (मीढ्वः) सत्य से सब के अन्तःकरण को सींचनेहारे, (दिशां पते) सब दिशाओं में स्थित मनुष्यों को सच्चा ज्ञान देके पालन करनेहारे, (इन्दो) शमादिगुणयुक्त संन्यासिन् ! तू (ऋतवाकेन) यथार्थ बोलने, (सत्येन) सत्यभाषण करने से, (श्रद्धया) सत्य के धारण में सच्ची प्रीति और (तपसा) प्राणायाम योगाभ्यास से, (आर्जीकात्) सरलता से (सुतः) निष्पन्न होता हुआ, तू अपने शरीर इन्द्रिय मन बुद्धि को (आ पवस्व) पवित्र कर। (इन्द्राय) परमैश्वर्ययुक्त परमात्मा के लिए (परिस्रव) सब ओर से गमन कर॥2॥
ऋ॒तं वद॑न्नृतद्युम्न स॒त्यं वद॑न्त्सत्यकर्मन्।
श्र॒द्धां वद॑न्त्सोम राजन् धा॒त्रा सो॑म॒ परि॑ष्कृत॒ इन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव॥3॥
अर्थ—हे (ऋतद्युम्न) सत्यधन और सत्य कीर्तिवाले यतिवर! (ऋतं वदन्) पक्षपात छोड़के यथार्थ बोलता हुआ, हे (सत्यकर्मन्) सत्य वेदोक्त कर्मवाले संन्यासिन्! (सत्यं वदन्) सत्य बोलता हुआ, (श्रद्धाम्) सत्यधारण में प्रीति करने को (वदन्) उपदेश करता हुआ, (सोम) सोम्यगुणसम्पन्न, (राजन्) सब ओर से प्रकाशयुक्त आत्मावाले, सोम) योगैश्वर्ययुक्त (इन्दो) सब को आनन्ददायक संन्यासिन्! तू (धात्रा) सकल विश्व के धारण करनेहारे परमात्मा से योगाभ्यास करके (परिष्कृतः) शुद्ध होता हुआ (इन्द्राय) योग से उत्पन्न हुए परमैश्वर्य की सिद्धि के लिए (परिस्रव) यथार्थ पुरुषार्थ कर॥3॥
यत्र॑ ब्र॒ह्मा प॑वमान छन्द॒स्यां॒३॒॑ वाचं॒ वद॑न्।
ग्राव्णा॒ सोमे॑ मही॒यते॒ सोमे॑नान॒न्दं ज॒नय॒न् इन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव॥4॥
अर्थ—हे (छन्दस्याम्) स्वतन्त्रतायुक्त (वाचम्) वाणी को (वदन्) कहते हुए (सोमेन) विद्या, योगाभ्यास और परमेश्वर की भक्ति से (आनन्दम्) सब के लिए आनन्द को (जनयन्) प्रकट करते हुए, (इन्दो) आनन्दप्रद, (पवमान) पवित्रात्मन्, पवित्र करनेहारे संन्यासिन्! (यत्र) जिस (सोमे) परमैश्वर्ययुक्त परमात्मा में (ब्रह्मा) चारों वेदों का जाननेहारा विद्वान् (महीयते) महत्त्व को प्राप्त होकर सत्कार को प्राप्त होता है। जैसे (ग्राव्णा) मेघ से सब जगत् को आनन्द होता है, वैसे तू सब को (इन्द्राय) परमैश्वर्य्ययुक्त मोक्ष का आनन्द देने के लिये सब साधनों को (परिस्रव) सब प्रकार से प्राप्त करा॥4॥
यत्र॒ ज्योति॒रज॑स्रं॒ यस्मिँ॑ल्लो॒के स्व॑र्हि॒तम्।
तस्मि॒न् मां धे॑हि पव॑माना॒मृते॑ लो॒के अक्षि॑त॒ इन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव॥5॥
अर्थ—हे (पवमान) अविद्यादि क्लेशों के नाश करनेहारे, पवित्रस्वरूप, (इन्दो) सर्वानन्ददायक परमात्मन् ! (यत्र) जहां तेरे स्वरूप में (अजस्रम्) निरन्तर व्यापक तेरा (ज्योतिः) तेज है, (यस्मिन्) जिस (लोके) ज्ञान से देखने योग्य तुझ में (स्वः) नित्य सुख (हितम्) स्थित है, (तस्मिन्) उस (अमृते) जन्म-मरण और (अक्षिते) नाश से रहित (लोके) द्रष्टव्य अपने स्वरूप में आप (मा) मुझ को (इन्द्राय) परमैश्वर्यप्राप्ति के लिये (धेहि) कृपा से धारण कीजिए और मुझ पर माता के समान कृपाभाव से (परिस्रव) आनन्द की वर्षा कीजिए॥5॥
यत्र॒ राजा॑ वैवस्व॒तो यत्रा॑व॒रोध॑नं दि॒वः।
यत्रा॒मूर्य॒ह्वती॒राप॒स्तत्र॒ माम॒मृतं॑ कृ॒धीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव॥6॥
अर्थ—हे (इन्दो) आनन्दप्रद परमात्मन्! (यत्र) जिस तुझ में (वैवस्वतः) सूर्य का प्रकाश (राजा) प्रकाशमान हो रहा है, (यत्र) जिस आप में (दिवः) बिजुली अथवा बुरी कामना की (अवरोधनम्) रुकावट है, (यत्र) जिस आप में (अमूः) वे कारणरूप (यह्वतीः) बड़े व्यापक आकाशस्थ (आपः) प्राणप्रद वायु हैं, (तत्र) उस अपने स्वरूप में (माम्) मुझ को (अमृतम्) मोक्षप्राप्त (कृधि) कीजिए। (इन्द्राय) परमैश्वर्य के लिए (परिस्रव) आदर भाव से आप मुझ को प्राप्त हूजिये॥6॥
यत्रा॑नुका॒मं चर॑णं त्रिना॒के त्रि॑दि॒वे दि॒वः।
लो॒का यत्र॒ ज्योति॑ष्मन्त॒स्तत्र॒ माम॒मृतं॑ कृ॒धीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव॥7॥
अर्थ—हे (इन्दो परमात्मन्! (यत्र) जिस आप में (अनुकामम्) इच्छा के अनुकूल स्वतन्त्र (चरणम्) विहरना है, (यत्र) जिस (त्रिनाके) त्रिविध अर्थात् आध्यात्मिक, आधिभौतिक, और आधिदैविक दुःख से रहित, (त्रिदिवे) तीन सूर्य, विद्युत् और भौम्य अग्नि से प्रकाशित सुखस्वरूप में (दिवः) कामना करनेयोग्य शुद्ध कामनावाले, (लोकाः) यथार्थ ज्ञानयुक्त, (ज्योतिष्मन्तः) शुद्ध विज्ञानयुक्त मुक्ति को प्राप्त हुए सिद्ध पुरुष विचरते हैं, (तत्र) उस अपने स्वरूप में (माम्) मुझ को (अमृतम्) मोक्षप्राप्त (कृधि) कीजिये। और (इन्द्राय) उस परम आनन्दैश्वर्य के लिये (परिस्रव) कृपा से प्राप्त हूजिये॥7॥
यत्र॒ कामा॑ निका॒माश्च॒ यत्र॑ ब्र॒ध्नस्य॑ वि॒ष्टप॑म्।
स्व॒धा च॒ यत्र॒ तृप्ति॑श्च॒ तत्र॒ माम॒मृतं॑ कृ॒धीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव॥8॥
अर्थ—हे (इन्दो) निष्कामानन्दप्रद, सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मन्! (यत्र) जिस आप में (कामाः) सब कामना (निकामाः) और अभिलाषा छूट जाती हैं, (च) और (यत्र) जिस आप में (ब्रध्नस्य) सब से बड़े प्रकाशमान सूर्य का (विष्टपम्) विशिष्ट सुख, (च) और (यत्र) जिस आप में, (स्वधा) अपना ही धारण, (च) और जिस आप में (तृप्तिः)पूर्ण तृप्ति है, (तत्र) उस अपने स्वरूप में (माम्) मुझ को (अमृतम्) प्राप्त-मुक्तिवाला (कृधि) कीजिये तथा (इन्द्राय) सब दुःख-विदारण के लिए आप मुझ पर (परिस्रव) करुणावृत्ति कीजिए॥8॥
यत्रा॑न॒न्दाश्च॒ मोदा॑श्च॒ मुदः॑ प्र॒मुद॒ आस॑ते।
काम॑स्य॒ यत्रा॒प्ताः कामा॒स्तत्र॒ माम॒मृतं॑ कृ॒धीन्द्रा॑येन्दो॒ परि॑ स्रव॥9॥—ऋ॰ म॰ 9। सू॰ 113॥
अर्थ—हे (इन्दो) सर्वानन्दयुक्त जगदीश्वर! (यत्र) जिस आप में (आनन्दाः) सम्पूर्ण समृद्धि, (च) और (मोदाः) सम्पूर्ण हर्ष, (मुदः) सम्पूर्ण प्रसन्नता, (च) और (प्रमुदः) प्रकृष्ट प्रसन्नता (आसते) स्थित हैं, (यत्र) जिस आप में (कामस्य) अभिलाषी पुरुष की (कामाः) सब कामना (आप्ताः) प्राप्त होती हैं, (तत्र) उसी अपने स्वरूप में (इन्द्राय) परमैश्वर्य के लिये (माम्) मुझ को (अमृतम्) जन्म-मृत्यु के दुःख से रहित मोक्षप्राप्तियुक्त कि जिस से मुक्ति के समय के मध्य में संसार में नहीं आना पड़ता, उस मुक्ति की प्राप्तिवाला (कृधि) कीजिए और इसी प्रकार सब जीवों को (परिस्रव) सब ओर से प्राप्त हूजिए॥9॥
यद्दे॑वा॒ यत॑यो यथा॒ भुव॑ना॒न्यपि॑न्वत।
अत्रा॑ समु॒द्र आ गू॒ळमा सूर्य॑मजभर्त्तन॥10॥ऋ॰ म॰ 10। सू॰ 72। मं॰ 7॥
अर्थ—हे (देवाः) पूर्ण विद्वान् (यतयः) संन्यासी लोगो! तुम (यथा) जैसे (अत्र) इस (समुद्रे) आकाश में (गूढम्) गुप्त (आ सूर्यम्) स्वयं प्रकाशस्वरूप सूर्यादि का प्रकाशक परमात्मा है, उस को (आ अजभर्त्तन) चारों ओर से अपने आत्माओं में धारण करो और आनन्दित होओ, वैसे (यत्) जो (भुवनानि) सब भुवनस्थ गृहस्थादि मनुष्य हैं, उन को सदा (अपिन्वत) विद्या और उपदेश से संयुक्त किया करो, यही तुम्हारा परम धर्म है॥10॥
भ॒द्रमि॒च्छन्त॒ ऋष॑यः स्व॒र्विद॒स्तपो॑ दी॒क्षामु॑प॒निषे॑दु॒रग्रे॑।
ततो॑ रा॒ष्ट्रं बल॒मोज॑श्च॒ जा॒तं तद॑स्मै दे॒वा उप॒संन॑मन्तु॥11॥अथर्व॰ का॰ 19। सू॰ 41। मं॰ 1॥
अर्थ—हे विद्वानो! जो (ऋषयः) वेदार्थविद्या को प्राप्त, (स्वर्विदः) सुख को प्राप्त, (अग्रे) प्रथम (तपः) ब्रह्मचर्यरूप आश्रम को पूर्णता से सेवन तथा यथावत् स्थिरता से प्राप्त होके (भद्रम्) कल्याण की (इच्छन्तः) इच्छा करते हुए, (दीक्षाम्) संन्यास की दीक्षा को (उपनिषेदुः) ब्रह्मचर्य ही से प्राप्त होवें, उन का (देवाः) विद्वान् लोग (उपसंनमन्तु) यथावत् सत्कार किया करें। (ततः) तदनन्तर (राष्ट्रम्) राज्य (बलम्) बल (च) और (ओजः) पराक्रम (जातम्) उत्पन्न होवे, (तत्) उस से (अस्मै) इस संन्यासाश्रम के पालन के लिये यत्न किया करें॥11॥
अथ मनुस्मृतेश्श्लोकाः
वनेषु तु विहृत्यैवं तृतीयं भागमायुषः।
चतुर्थमायुषो भागं त्यक्त्वा सगन् परिव्रजेत्॥1॥
अधीत्य विधिवद् वेदान् पुत्रांश्चोत्पाद्य धर्मतः।
इष्ट्वा च शक्तितो यज्ञैर्मनो मोक्षे नियोजयेत्॥2॥
प्राजापत्यां निरूप्येष्टिं सर्ववेदसदक्षिणाम्।
आत्मन्यग्नीन् समारोप्य ब्राह्मणः प्रव्रजेद् गृहात्॥3॥
यो दत्त्वा सर्वभूतेभ्यः प्रव्रजत्यभयं गृहात्।
तस्य तेजोमया लोका भवन्ति ब्रह्मवादिनः॥4॥
आगारादभिनिष्क्रान्तः पवित्रोपचितो मुनिः।
समुपोढेषु कामेषु निरपेक्षः परिव्रजेत्॥5॥
अनग्निरनिकेतः स्याद् ग्राममन्नार्थमाश्रयेत्।
उपेक्षकोऽसङ्कुसुको मुनिर्भावसमाहितः॥6॥
नाभिनन्देत मरणं नाभिनन्देत जीवितम्।
कालमेव प्रतीक्षेत निर्देशं भृतको यथा॥7॥
दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।
सत्यपूतां वदेद् वाचं मनःपूतं समाचरेत्॥ 8॥
अध्यात्मरतिरासीनो निरपेक्षो निरामिषः।
आत्मनैव सहायेन सुखार्थी विचरेदिह॥ 9॥
क्लृप्तकेशनखश्मश्रुः पात्री दण्डी कुसुम्भवान्।
विचरेन्नियतो नित्यं सर्वभूतान्यपीडयन्॥10॥
इन्द्रियाणां निरोधेन रागद्वेषक्षयेण च।
अहिंसया च भूतानाममृतत्वाय कल्पते॥11॥
दूषितोऽपि चरेद् धर्मं यत्र तत्राश्रमे रतः।
समः सर्वेषु भूतेषु न लिङ्गं धर्मकारणम्॥12॥
फलं कतकवृक्षस्य यद्यप्यम्बुप्रसादकम्।
न नामग्रहणादेव तस्य वारि प्रसीदति॥13॥
प्राणायामा ब्राह्मणस्य त्रयोऽपि विधिवत् कृताः।
व्याहृतिप्रणवैर्युक्ता विज्ञेयं परमं तपः॥14॥
दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां हि यथा मलाः।
तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात्॥15॥
प्राणायामैर्दहेद् दोषान् धारणाभिश्च किल्विषम्।
प्रत्याहारेण संसर्गान् ध्यानेनानीश्वरान् गुणान्॥16॥
उच्चावचेषु भूतेषु दुर्ज्ञेयामकृतात्मभिः।
ध्यानयोगेन सम्पश्येद् गतिमस्यान्तरात्मनः॥17॥
सम्यग्दर्शनसम्पन्नः कर्मभिर्न निबध्यते।
दर्शनेन विहीनस्तु संसारं प्रतिपद्यते ॥18॥
अहिंसयेन्द्रियासङ्गैर्वैदिकैश्चैव कर्मभिः ।
तपसश्चरणैश्चोग्रैः साधयन्तीह तत्पदम्॥19॥
यदा भावेन भवति सर्वभावेषु निःस्पृहः ।
तदा सुखमवाप्नोति प्रेत्य चेह च शाश्वतम्॥20॥
अनेन विधिना सर्वांस्त्यक्त्वा सगञ्छनैः शनैः।
सर्वद्वन्द्वविनिर्मुक्तो ब्रह्मण्येवावतिष्ठते ॥21॥
इदं शरणमज्ञानामिदमेव विजानताम् ।
इदमन्विच्छतां स्वर्ग्यम् इदमानन्त्यमिच्छताम्॥22॥
अनेन क्रमयोगेन परिव्रजति यो द्विजः।
स विधूयेह पाप्मानं परं ब्रह्माधिगच्छति॥23॥
अर्थ—इस प्रकार जंगलों में आयु का तीसरा भाग अर्थात् अधिक से अधिक 25 पच्चीस वर्ष, अथवा न्यून से न्यून 12 बारह वर्ष तक विहार करके, आयु के चौथे भाग अर्थात् 70 सत्तर वर्ष के पश्चात् सब मोहादि संगों को छोड़कर संन्यासी हो जावे॥1॥
विधिपूर्वक ब्रह्मचर्याश्रम से सब वेदों को पढ़, गृहाश्रमी होकर धर्म से पुत्रोत्पत्ति कर, वानप्रस्थ में सामर्थ्य के अनुसार यज्ञ करके मोक्ष अर्थात् संन्यासाश्रम में मन को लगावे॥2॥
प्रजापति परमात्मा की प्राप्ति के निमित्त प्राजापत्येष्टि कि जिस में यज्ञोपवीत और शिखा का त्याग किया जाता है आहवनीय, गार्हपत्य और दक्षिणाग्नि संज्ञक अग्नियों को आत्मा में समारोपित करके, ब्राह्मण विद्वान् गृहाश्रम से ही संन्यास लेवे॥3॥
जो पुरुष सब प्राणियों को अभयदान सत्योपदेश देकर गृहाश्रम से ही संन्यास ग्रहण कर लेता है, उस ब्रह्मवादी वेदोक्त सत्योपदेशक संन्यासी को मोक्षलोक और सब लोक-लोकान्तर तेजोमय=ज्ञान से प्रकाशमय हो जाते हैं॥4॥
जब सब कामों को जीत लेवे, और उन की अपेक्षा न रहे, पवित्रात्मा और पवित्रान्तःकरण मननशील हो जावे, तभी गृहाश्रम से निकलकर संन्यासाश्रम का ग्रहण करे। अथवा ब्रह्मचर्य ही से संन्यास का ग्रहण कर लेवे॥5॥
वह संन्यासी (अनग्निः)[1]आहवनीयादि अग्नियों से रहित, और कहीं अपना स्वाभिमत घर भी न बांधे। और अन्न-वस्त्रादि के लिये ग्राम का आश्रय लेवे। बुरे मनुष्यों की उपेक्षा करता और स्थिरबुद्धि, मननशील होकर परमेश्वर में अपनी भावना का समाधान करता हुआ विचरे॥6॥
न तो अपने जीवन में आनन्द और न अपने मृत्यु में दुःख माने। किन्तु जैसे क्षुद्र भृत्य अपने स्वामी की आज्ञा की बाट देखता रहता है, वैसे ही काल और मृत्यु की प्रतीक्षा करता रहे॥7॥
चलते समय आगे-आगे देखके पग धरे। सदा वस्त्र से छानकर जल पीवे। सब से सत्य वाणी बोले, अर्थात् सत्योपदेश ही किया करे। जो कुछ व्यवहार करे, वह सब मन की पवित्रता से आचरण करे॥8॥
इस संसार में आत्मनिष्ठा में स्थित, सर्वथा अपेक्षारहित, मांस, मद्यादि का त्यागी, आत्मा के सहाय से ही सुखार्थी होकर विचरा करे और सब को सत्योपदेश करता रहे॥9॥
सब शिर के बाल दाढ़ी मूंछ और नखों को समय-समय पर छेदन कराता रहे। पात्री दण्डी और कुसुम्भ के रंगे हुए[2]वस्त्रों को धारण किया करे। सब भूत=प्राणीमात्र को पीड़ा न देता हुआ दृढात्मा होकर नित्य विचरा करे॥10॥
जो संन्यासी बुरे कामों से इन्द्रियों के निरोध, राग-द्वेषादि दोषों के क्षय, और निर्वैरता से सब प्राणियों का कल्याण करता है, वह मोक्ष को प्राप्त होता है॥11॥
यदि संन्यासी को मूर्ख संसारी लोग निन्दा आदि से दूषित वा अपमान भी करें, तथापि धर्म ही का आचरण करे। ऐसे ही अन्य ब्रह्मचर्याश्रमादि के मनुष्यों को करना उचित है। सब प्राणियों में पक्षपातरहित होकर समबुद्धि रक्खे। इत्यादि उत्तम काम करने ही के लिये संन्यासाश्रम का विधि है। किन्तु केवल दण्डादि चिह्न धारण करना ही धर्म का कारण नहीं है॥12॥
यद्यपि निर्मली वृक्ष का फल जल को शुद्ध करनेवाला है, तथापि उस के नामग्रहणमात्र से जल शुद्ध नहीं होता, किन्तु उस को ले, पीस, जल में डालने से ही उस मनुष्य का जल शुद्ध होता है। वैसे नाममात्र आश्रम से कुछ भी नहीं होता, किन्तु अपने-अपने आश्रम के धर्मयुक्त कर्म करने ही से आश्रमधारण सफल होता है, अन्यथा नहीं॥13॥
इस पवित्र आश्रम को सफल करने के लिए संन्यासी पुरुष विधिवत् योगशास्त्र की रीति से सात व्याहृतियों के पूर्व सात प्रणव लगाके, जैसा कि पृष्ठ 156 में प्राणायाम का मन्त्र लिखा है, उस को मन से जपता हुआ तीन भी प्राणायाम करे तो जानो अत्युत्कृष्ट तप करता है॥14॥
क्योंकि जैसे अग्नि में तपाने से धातुओं के मल छूट जाते हैं, वैसे ही प्राण के निग्रह से इन्द्रियों के दोष नष्ट हो जाते हैं॥15॥
इसलिए संन्यासी लोग प्राणायामों से दोषों को धारणाओं से अन्तःकरण के मैल को, प्रत्याहार से सङ्ग से हुए दोषों और ध्यान से अविद्या, पक्षपात आदि अनीश्वरता के दोषों को छुड़ाके, पक्षपातरहित आदि ईश्वर के गुणों को धारण कर, सब दोषों को भस्म कर देवे॥16॥
बड़े-छोटे प्राणी और अप्राणियों में जो अशुद्धात्माओं से देखने के योग्य नहीं है, उस अन्तर्यामी परमात्मा की गति अर्थात् प्राप्ति को ध्यानयोग से ही संन्यासी देखा करे॥17॥
जो संन्यासी यथार्थ ज्ञान वा षट्दर्शनों से युक्त है, वह दुष्ट कर्मों से बद्ध नहीं होता। और जो ज्ञान, विद्या, योगाभ्यास, सत्सङ्ग, धर्मानुष्ठान, वा षड्दर्शनों से रहित विज्ञानहीन होकर संन्यास लेता है, वह संन्यास पदवी और मोक्ष को प्राप्त न होकर जन्ममरणरूप संसार को प्राप्त होता है और ऐसे मूर्ख अधर्मी को संन्यास का लेना व्यर्थ और धिक्कार देने योग्य है॥18॥
और जो निर्वैर, इन्द्रियों के विषयों के बन्धन से पृथक्, वैदिक कर्माचरणों और प्राणायाम सत्यभाषणादि उत्तम उग्र कर्मों से सहित संन्यासी लोग होते हैं, वे इसी जन्म इसी वर्तमान समय में परमेश्वर की प्राप्तिरूप पद को प्राप्त होते हैं। उन का संन्यास लेना सफल और धन्यवाद के योग्य है॥19॥
जब संन्यासी सब पदार्थों में अपने भाव से निःस्पृह होता है, तभी इस लोक इस जन्म, और मरण पाकर परलोक और मुक्ति में परमात्मा को प्राप्त होके निरन्तर[3]सुख को प्राप्त होता है ॥20॥
इस विधि से धीरे-धीरे सब सङ्ग से हुए दोषों को छोड़के, सब हर्ष-शोकादि द्वन्द्वों से विशेषकर निर्मुक्त होके, विद्वान् संन्यासी ब्रह्म ही में स्थिर होता है॥21॥
और जो विविदिषा अर्थात् जानने की इच्छा करके गौण संन्यास लेवे, वह भी विद्या का अभ्यास, सत्पुरुषों का सङ्ग, योगाभ्यास और ओङ्कार का जप और उस के अर्थ=परमेश्वर का विचार भी किया करे।
यही अज्ञानियों का शरण, अर्थात् गौण संन्यासियों और यही विद्वान् संन्यासियों का, और यही सुख का खोज करनेहारे, और यही अनन्त[4]सुख की इच्छा करनेहारे मनुष्यों का आश्रय है॥22॥
इस क्रमानुसार संन्यासयोग से जो द्विज अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य संन्यास ग्रहण करता है, वह इस संसार और शरीर में सब पापों को छोड़-छुड़ाके परब्रह्म को प्राप्त होता है॥23॥
विधि— जो पुरुष संन्यास लेना चाहे वह जिस दिन सर्वथा प्रसन्नता हो, उसी दिन नियम और व्रत, अर्थात् तीन दिन तक दुग्धपान करके उपवास और भूमि में शयन और प्राणायाम, ध्यान तथा एकान्तदेश में ओटार का जप किया करे और पृष्ठ 12-14 में लिखे प्रमाणे सभामण्डप, वेदी, समिधा, घृतादि शाकल्य सामग्री एक दिन पूर्व कर रखनी। पश्चात् जिस चौथे दिन संन्यास लेना हो, प्रहर रात्रि से उठकर शौच, स्नानादि आवश्यक कर्म करके, प्राणायाम, ध्यान और प्रणव का जप करता रहे। सूर्योदय के समय उत्तम गृहस्थ धार्मिक विद्वानों का पृष्ठ 18 में लिखे प्रमाणे वरण कर, पृष्ठ 19-20 में लिखे प्रमाणेअग्न्याधान, समिदाधान, घृतप्रतपनऔरस्थालीपाककरके पृ॰ 7-11 में लिखे प्रमाणेस्वस्तिवाचन-शान्तिकरणका पाठ कर, पृ॰ 20 में लिखे प्रमाणे वेदी के चारों ओरजलप्रोक्षण, आघारावाज्यभागाहुति4 चार औरव्याहृतिआहुति 4 चार, तथा—
ओं भुवनपतये स्वाहा॥1॥
ओं भूतानां पतये स्वाहा॥2॥
ओं प्रजापतये स्वाहा॥3॥
इन में से एक-एक मन्त्र से एक-एक करके 11 ग्यारह आज्याहुति देके, जो विधिपूर्वक भात बनाया हो उस में घृत-सेचन करके, यजमान जो कि संन्यास का लेनेवाला है, और दो ऋत्विज् निम्नलिखित स्वाहान्त मन्त्रों से भात का होम और शेष दो ऋत्विज् भी साथ-साथ घृताहुति करते जावें—
ओं ब्रह्म॒ होता॒ ब्रह्म॑ य॒ज्ञा ब्रह्म॑णा॒ स्वर॑वो मि॒ताः।
अ॒ध्व॒र्युर्ब्रह्म॑णो जा॒तो ब्रह्म॑णो॒ऽन्तर्हितं ह॒विः स्वाहा॑॥1॥
ब्रह्म॒ स्रुचो॑ घृत्रतव॑ती॒र्ब्रह्म॑णा॒ वेदि॒रुद्धि॑ता।
ब्रह्म॑ य॒ज्ञश्च॑ स॒त्रं च ऋ॒त्विजो॒ ये ह॑वि॒ष्कृतः॑। श॒मि॒ताय॒ स्वाहा॑॥2॥
अं॒हो॒मुचे॒ प्र भ॑रे मनी॒षा मा सु॒त्राम्णे॑ सुम॒तिमा॑वृणा॒नः।
इ॒दमि॑न्द्र॒ प्रति॑ ह॒व्यं गृ॑भाय स॒त्याः स॑न्तु॒ यज॑मानस्य॒ कामाः॒ स्वाहा॑॥3॥
अं॒हो॒मुचं॑ वृष॒भं य॒ज्ञिया॑नां वि॒राज॑न्तं प्रथ॒मम॑ध्व॒राणा॑म्।
अ॒पां नपा॑तम॒श्विना हुवे॒ धि॒येन्द्रे॑ण म इन्द्रि॒यं द॑त्त॒मोजः॒ स्वाहा॑॥4॥
यत्र॑ ब्रह्म॒विदो॒ यान्ति॑ दी॒क्षया॒ तप॑सा स॒ह।
अ॒ग्निर्मा॒ तत्र॑ नयत्व॒ग्निर्मे॒धां द॑धातु मे। अ॒ग्नये॒ स्वाहा॑॥ इदमग्नये इदन्न मम॥5॥
यत्र॑ ब्रह्म॒विदो॒ यान्ति॑ दी॒क्षया॒ तप॑सा स॒ह।
वा॒युर्मा॒ तत्र॑ नयतु वा॒युः प्रा॒णान् द॑धातु मे। वा॒यवे॒ स्वाहा॑॥ इदं वायवे इदन्न मम॥6॥
यत्र॑ ब्रह्म॒विदो॒ यान्ति॑ दी॒क्षया॒ तप॑सा स॒ह।
सूर्यो॑ मा॒ तत्र॑ नयतु॒ चक्षुः॒ सूर्यो॑ दधातु मे। सूर्या॑य॒ स्वाहा॑॥ इदं सूर्याय इदन्न मम॥7॥
यत्र॑ ब्रह्म॒विदो॒ यान्ति॑ दी॒क्षया॒ तप॑सा स॒ह।
च॒न्द्रो मा॒ तत्र॑ नयतु॒ मन॑श्च॒न्द्रो द॑धातु मे। च॒न्द्राय॒ स्वाहा॑॥ इदं चन्द्राय इदन्न मम॥8॥
यत्र॑ ब्रह्म॒विदो॒ यान्ति॑ दी॒क्षया॒ तप॑सा स॒ह।
सोमो॑ मा॒ तत्र॑ नयतु॒ पयः॒ सोमो॑ दधातु मे। सोमा॑य॒ स्वाहा॑॥ इदं सोमाय इदन्न मम॥9॥
यत्र॑ ब्रह्म॒विदो॒ यान्ति॑ दी॒क्षया॒ तप॑सा स॒ह।
इन्द्रो॑ मा॒ तत्र॑ नयतु॒ बल॒मिन्द्रो॑ दधातु मे। इन्द्रा॑य स्वाहा॑॥ इदमिन्द्राय इदन्न मम॥10॥
यत्र॑ ब्रह्म॒विदो॒ यान्ति॑ दी॒क्षया॒ तप॑सा स॒ह।
आपो॑ मा॒ तत्र॑ नयन्त्व॒मृतं मोप॑तिष्ठतु। अ॒द्भ्यः स्वाहा॑॥ इदमद्भ्यः इदन्न मम॥11॥
यत्र॑ ब्रह्म॒विदो॒ यान्ति॑ दी॒क्षया॒ तप॑सा स॒ह।
ब्र॒ह्मा मा॒ त॑त्र नयतु ब्र॒ह्मा ब्रह्म॑ दधातु मे। ब्र॒ह्मणे॒ स्वाहा॑॥ इदं ब्रह्मणे इदन्न मम॥12॥
अथर्व॰ कां॰ 19। सू॰ 42, 43॥
ओं प्राणापानव्यानोदानसमाना मे शुध्यन्ताम्। ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासं स्वाहा॥1॥
वाङ्मनश्चक्षुःश्रोत्रजिह्वाघ्राणरेतोबुद्ध्याकूतिसङ्कल्पा मे शुध्यन्ताम्।
ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासं स्वाहा॥2॥
शिरःपाणिपादपार्श्वपृष्ठोरूदरजङ्घा शिश्नोपस्थपायवो मे शुध्यन्ताम्।
ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासं स्वाहा॥3॥
त्वक्चर्ममांसरुधिरमेदोमज्जास्नायवोऽस्थीनि मे शुध्यन्ताम्।
ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासं स्वाहा॥4॥
शब्दस्पर्शरूपरसगन्धा मे शुध्यन्ताम्।
ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासं स्वाहा॥5॥
पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशा मे शुध्यन्ताम्।
ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासं स्वाहा॥6॥
अन्नमयप्राणमयमनोमयविज्ञानमयानन्दमया मे शुध्यन्ताम्।
ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासं स्वाहा॥7॥
विविष्ट्यै स्वाहा॥8॥
कषोत्काय स्वाहा॥9॥
उत्तिष्ठ पुरुष हरित लोहित पिङ्गलाक्षि। देहि देहि ददापयिता मे शुध्यताम्।
ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासं स्वाहा॥10॥
ओं स्वाहा मनोवाक्कायकर्माणि मे शुध्यन्ताम्।
ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासं स्वाहा॥11॥
अव्यक्तभावैरहङ्कारैर्ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासं स्वाहा॥12॥
आत्मा मे शुध्यताम्। ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासं स्वाहा॥13॥
अन्तरात्मा मे शुध्यताम्। ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासं स्वाहा॥14॥
परमात्मा मे शुध्यताम्। ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासं स्वाहा॥15॥[5]
इन 15 मन्त्रों में से एक-एक करके भात की आहुति देनी। पश्चात् निम्नलिखित मन्त्रों से 35 घृताहुति देवें—
ओमग्नये स्वाहा॥16॥
ओं विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा॥17॥
ओं ध्रुवाय भूमाय स्वाहा॥18॥
ओं ध्रुवक्षितये स्वाहा॥19॥
ओमच्युतक्षितये स्वाहा॥20॥
ओमग्नये स्विष्टकृते स्वाहा॥21॥
ओं धर्माय स्वाहा॥22॥
ओमधर्माय स्वाहा॥23॥
ओमद्भ्यः स्वाहा॥24॥
ओमोषधिवनस्पतिभ्यः स्वाहा॥25॥
ओं रक्षोदेवजनेभ्यः स्वाहा॥26॥
ओं गृह्याभ्यः स्वाहा॥27॥
ओमवसानेभ्यः स्वाहा॥28॥
ओमवसानपतिभ्यः स्वाहा॥29॥
ओं सर्वभूतेभ्यः स्वाहा॥30॥
ओं कामाय स्वाहा॥31॥
ओमन्तरिक्षाय स्वाहा॥32॥
ओं पृथिव्यै स्वाहा॥33॥
ओं दिवे स्वाहा॥34॥
ओं सूर्याय स्वाहा॥35॥
ओं चन्द्रमसे स्वाहा॥36॥
ओं नक्षत्रेभ्यः स्वाहा॥37॥
ओमिन्द्राय स्वाहा॥38॥
ओं बृहस्पतये स्वाहा॥39॥
ओं प्रजापतये स्वाहा॥40॥
ओं ब्रह्मणे स्वाहा॥41॥
ओं देवेभ्यः स्वाहा॥42॥
ओं परमेष्ठिने स्वाहा॥43॥
ओं तद् ब्रह्म॥44॥
ओं तद्वायुः॥45॥
ओं तदात्मा॥46॥
ओं तत्सत्यम्॥47॥
ओं तत्सर्वम्॥48॥
ओं तत्पुरोर्नमः॥49॥
अन्तश्चरति भूतेषु गुहायां विश्वमूर्तिषु। त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वमिन्द्रस्त्वं रुद्रस्त्वं विष्णुस्त्वं ब्रह्म त्वं प्रजापतिः। त्वं तदाप आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुवः सुवरों स्वाहा॥50॥[6]
इन 50 मन्त्रों से आज्याहुति देके तदनन्तर जो संन्यास लेनेवाला है, वह पांच वा छः केशों को छोड़कर पृष्ठ 59-61 में लिखे प्रमाणे डाढ़ी मूंछ केश लोमों का छेदन अर्थात् क्षौर कराके यथावत् स्नान करे। तदनन्तर संन्यास लेनेवाला पुरुष अपने शिर पर पुरुषसूक्त के मन्त्रों से 108 एक सौ आठ बार अभिषेक करे। पुनः पृष्ठ 155-156 में लिखे प्रमाणे आचमन और प्राणायाम करके, हाथ जोड़, वेदी के सामने नेत्रोन्मीलन कर मन से—
ओं ब्रह्मणे नमः॥1॥ ओं सूर्याय नमः॥2॥ ओमात्मने नमः॥3॥
ओमिन्द्राय नमः॥4॥ ओं सोमाय नमः॥5॥ ओमन्तरात्मने नमः॥6॥
इन छह मन्त्रों को जपके—
ओमात्मने स्वाहा॥1॥
ओमन्तरात्मने स्वाहा॥2॥
ओं परमात्मने स्वाहा॥3॥
ओं प्रजापतये स्वाहा॥4॥
इन चार मन्त्रों से 4 चार आज्याहुति देकर, कार्यकर्त्ता—संन्यास ग्रहण करनेवाला पुरुष पृष्ठ 108-109 में लिखे प्रमाणे मधुपर्क की क्रिया करे। तदनन्तर प्राणायाम करके—
ओं भूः सावित्रीं प्रविशामि तत्सवितुर्वरेण्यम्॥1॥
ओं भुवः सावित्रीं प्रविशामि भर्गो देवस्य धीमहि॥2॥
ओं स्वः सावित्रीं प्रविशामि धियो यो नः प्रचोदयात्॥3॥
ओं भूर्भुवः स्वः। सावित्रीं प्रविशामि। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्॥4॥
इन मन्त्रों को मन से जपे।
ओमग्नये स्वाहा॥1॥
ओं भूः प्रजापतये स्वाहा॥2॥
ओमिन्द्राय स्वाहा॥3॥
ओं प्रजापतये स्वाहा॥4॥
ओं विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा॥5॥
ओं ब्रह्मणे स्वाहा॥6॥
ओं प्राणाय स्वाहा॥7॥
ओमपानाय स्वाहा॥8॥
ओं व्यानाय स्वाहा॥9॥
ओमुदानाय स्वाहा॥10॥
ओं समानाय स्वाहा॥11॥
इन मन्त्रों से वेदी में आज्याहुति देके—
ओं भूः स्वाहा॥1॥
इस मन्त्र से पूर्णाहुति करके—
पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्चोत्त्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति*॥—श॰ कां॰ 14॥
पुत्रैषणा वित्तैषणा लोकैषणा मया परित्यक्ता, मत्तः सर्वभूतेभ्योऽभयमस्तु स्वाहा*॥[7]
इस वाक्य को बोलके सब के सामने जल को भूमि में छोड़ देवे। पीछे नाभिमात्र जल में पूर्वाभिमुख खड़ा रहकर—
ओं भूः सावित्रीं प्रविशामि तत्सवितुर्वरेण्यम्॥
ओं भुवः सावित्रीं प्रविशामि भर्गो देवस्य धीमहि॥
ओं स्वः सावित्रीं प्रविशामि धियो यो नः प्रचोदयात्॥
ओं भूर्भुवः स्वः सावित्रीं प्रविशामि परो रजसेऽसावदोम्॥
इस का मन से जप करके प्रणवार्थ परमात्मा का ध्यान करके पूर्वोक्त (पुत्रैषणायाश्च॰) इस समग्र कण्डिका को बोलके प्रेष्य मन्त्रोच्चारण करे।
ओं भूः संन्यस्तं मया। ओं भुवः संन्यस्तं मया।
ओं स्वः संन्यस्तं मया॥
इस मन्त्र का मन से उच्चारण करे। तत्पश्चात् जल से अञ्जलि भर पूर्वाभिमुख होकर संन्यास लेनेवाला—
ओम् अभयं सर्वभूतेभ्यो मत्तः स्वाहा॥
इस मन्त्र से दोनों हाथ की अञ्जलि को पूर्व दिशा में छोड़ देवे।
येना॑ स॒हस्र॒॑ वह॑सि॒ येना॑ग्ने सर्ववेद॒सम्। तेने॒मं य॒ज्ञं नो॑ वह॒ स्वर्दे॒वेषु॒ गन्त॑वे॥[8]
अथर्व॰ का॰ 9। सू॰ 5। मं॰ 17॥
और इस पर स्मृति है-
प्राजापत्यां निरूप्येष्टिं सर्ववेदसदक्षिणाम् ।
आत्मन्यग्नीन् समारोप्य ब्राह्मणः प्रव्रजेद् गृहात्॥
इस श्लोक का अर्थ पहले लिख दिया है।
इस के पश्चात् मौन करके शिखा के लिये जो पांच वा सात केश रक्खे थे, उन को एक-एक उखाड़ और यज्ञोपवीत उतारकर हाथ में ले जल की अञ्जलि भर-
ओमापो वै सर्वा देवताः स्वाहा॥
ओं भूः स्वाहा॥
इन मन्त्रों से शिखा के बाल और यज्ञोपवीत सहित जलाञ्जलि को जल में होम कर देवे।
उस के पश्चात् आचार्य शिष्य को जल से निकालके काषाय वस्त्र की कोपीन, कटिवस्त्र, उपवस्त्र, अंगोछा, प्रीतिपूर्वक देवे। और शिष्य पृष्ठ 74 में लिखे प्रमाणे (यो मे दण्डः॰) इस मन्त्र से दण्ड धारण करके आत्मा में आहवनीयादि अग्नियों का आरोपण करे।
यो वि॒द्याद् ब्रह्म॑ प्र॒त्यक्षं॒ परूं॑षि॒ यस्य॑ संभा॒रा ऋचो॒ यस्या॑नू॒क्यम्॥1॥[9]
सामा॑नि॒ यस्य॒ लोमा॑नि॒ यजु॒र्हृद॑यमु॒च्यते॑ परि॒स्तर॑ण॒मिद्ध॒विः॥2॥[10]
यद्वा अति॑थिपति॒रति॑थीन् प्रति॒ पश्य॑ति देव॒यज॑नं॒ प्रेक्ष॑ते॥3॥[11]
यद॑भि॒वद॑ति दी॒क्षामुपै॑ति॒ यदु॑द॒कं याच॑त्य॒पः प्रण॑यति॥4॥[12]
या ए॒व य॒ज्ञ आपः॑ प्रणी॒यन्ते॒ ता ए॒व ताः॥5॥[13]
यदा॑वस॒थान् क॒ल्पय॑न्ति सदो हविर्धा॒नान्ये॒व तत्क॑ल्पयन्ति*॥6॥[14]
यदु॑पस्तृ॒णन्ति॑ ब॒र्हिरे॑व तत्*॥7॥[15]
तेषा॒मास॑न्नाना॒मति॑थिरा॒त्मन् जु॑होति*॥8॥[16]
स्रु॒चा हस्ते॑न प्रा॒णे यूपे॑ स्रुक्का॒रेण॑ वषट्का॒रेण॑*॥9॥[17]
ए॒ते वै प्रि॒याश्चाप्रि॑याश्च॒र्त्विजः॑ स्व॒र्गं लो॒कं ग॒मयन्ति॒ यदति॑थयः*॥10॥[18]
प्रा॒जा॒प॒त्यो वा ए॒तस्य॑ य॒ज्ञो वित॑तो॒ य उ॑प॒हर॑ति*॥11॥[19]
प्र॒जाप॑ते॒र्वा ए॒ष वि॑क्र॒मान॑नु॒विक्र॑मते॒ य उ॑प॒हर॑ति*॥12॥[20]
योऽति॑थीनां॒ स आ॑हव॒नीयो॒ यो वेश्म॑नि॒ स गार्ह॑पत्यो॒ यस्मि॒न् पच॑न्ति॒ स द॑क्षिणा॒ग्निः॥13॥[21]
इ॒ष्टं च॒ वा ए॒ष पू॒र्तं च॑ गृ॒हाणा॑मश्नाति॑ यः पूर्वोऽति॑थेर॑श्नाति॑*॥14॥[22]—अथर्व॰ का॰ 9। सू॰ 6॥
तस्यैवं विदुषो यज्ञस्यात्मा यजमानः श्रद्धा पत्नी शरीरमिध्ममुरो वेदिर्लोमानि बर्हिर्वेदः शिखा हृदयं यूपः काम आज्यं मन्युः पशुस्तपोऽग्निर्दमः शमयिता दक्षिणा वाग्घोता प्राण उद्गाता चक्षुरध्वर्युर्मनो ब्रह्म श्रोत्रमग्नीत्। यावद् ध्रियते सा दीक्षा यदश्नाति तद्धविर्यत्पिबति तदस्य सोमपानम्। यद्रमते तदुपसदो यत्सञ्चरत्युप- विशत्युत्तिष्ठते च स प्रवर्ग्यो यन्मुखम् तदाहवनीयो या व्याहृति- राहुतिर्यदस्य विज्ञानं तज्जुहोति यत्सायं प्रातरत्ति तत्समिधं यत्प्रातर्मध्यन्दिनं सायं च तानि सवनानि। ये अहोरात्रे ते दर्शपौर्णमासौ येऽर्द्धमासाश्च मासाश्च ते चातुर्मास्यानि य ऋतवस्ते पशुबन्धा ये संवत्सराश्च परिवत्सराश्च तेऽहर्गणाः सर्ववेदसं वा एतत्सत्रं यन्मरणं तदवभृथः। एतद्वै जरामर्यमग्निहोत्रं सत्रं य एवं विद्वानुदगयने प्रमीयते देवानामेव महिमानं गत्वाऽऽदित्यस्य सायुज्यं गच्छत्यथ यो दक्षिणे प्रमीयते पितंणामेव महिमानं गत्वा चन्द्रमसः सायुज्यं सलोकतामाप्नोत्येतौ वै सूर्याचन्द्रमसोर्महिमानौ ब्राह्मणो विद्वानभिजयति तस्माद् ब्रह्मणो महिमानमाप्नोति तस्माद् ब्रह्मणो महिमानमित्युपनिषत्॥[23]
तैत्ति॰ आ॰ प्रपा 10। अनु॰ 64॥
[*]
अथ संन्यासे पुनः प्रमाणानि—
न्यास इत्याहुर्मनीषिणो ब्रह्माणम्। ब्रह्मा विश्वः कतमः स्वयम्भूः प्रजापतिः संवत्सर इति। संवत्सरोऽसावादित्यो यऽ एष आदित्ये पुरुषः स परमेष्ठी ब्रह्मात्मा। याभिरादित्यस्तपति रश्मिभिस्ताभिः पर्जन्यो वर्षति पर्जन्येनौषधि-वनस्पतयः प्रजायन्त ओषधिवनस्पतिभिरन्नं भवत्यन्नेन प्राणाः प्राणैर्बलं बलेन तपस्तपसा श्रद्धा श्रद्धया मेधा मेधया मनीषा मनीषया मनो मनसा शान्तिः शान्त्या चित्तं चित्तेन स्मृतिं स्मृत्या स्मारं स्मारेण विज्ञानं विज्ञानेनात्मानं वेदयति तस्मादन्नं ददन्त्सर्वाण्येतानि ददात्यन्नात् प्राणा भवन्ति भूतानाम्। प्राणैर्मनो मनसश्च विज्ञानं विज्ञानादानन्दो ब्रह्मयोनिः। स वा एष पुरुषः पञ्चधा पञ्चात्मा येन सर्वमिदं प्रोतं पृथिवी चान्तरिक्षं च द्यौश्च दिशश्चावान्तरदिशश्च स वै सर्वमिदं जगत् स भूतं स भव्यं जिज्ञासक्लृप्त ऋतजा रयिष्ठाः श्रद्धा सत्यो महस्वांस्तमसो वरिष्ठात्। ज्ञात्वा तमेवं मनसा हृदा च भूयो मृत्युमुपयाहि विद्वान्। तस्मात् न्यासमेषां तपसामति- रिक्तमाहुः। वसुरण्वो विभूरसि प्राणे त्वमसि सन्धाता ब्रह्मंस्त्वमसि विश्वसृत् तेजोदास्त्वमस्यग्नेरसि वर्चोदास्त्वमसि सूर्यस्य द्युम्नोदास्त्वमसि चन्द्रमस उपयामगृहीतोऽसि ब्रह्मणे त्वा महसे। ओमित्यात्मानं युञ्जीत। एतद्वै महोपनिषदं देवानां गुह्यम्। य एवं वेद ब्रह्मणो महिमानमाप्नोति तस्माद् ब्रह्मणो महिमानमित्युप निषत्॥[24]
तैत्ति॰ आ॰ प्रपा॰ 10। अनु॰ 63॥
संन्यासी का कर्त्तव्याऽकर्त्तव्य
दृते॒ दृं॒ह॑ मा मि॒त्रस्य॑ मा॒ चक्षु॑षा॒ सर्वा॑णि भू॒तानि॒ समी॑क्षन्ताम्।
मि॒त्रस्या॒हं चक्षु॑षा॒ सर्वा॑णि भू॒तानि॒ समी॑क्षे। मि॒त्रस्य॒ चक्षु॑षा॒ समी॑क्षामहे॥1॥—यजु॰ अ॰ 36। मं॰ 18॥
ओम् अग्ने॒ नय॑ सु॒पथा॑ रा॒येऽअ॒स्मान् विश्वा॑नि देव व॒युना॑नि वि॒द्वान्।
यु॒यो॒ध्यस्मज्जु॑हुरा॒णमेनो॒ भूयि॑ष्ठान्ते॒ नम॑ऽउक्तिं विधेम॒ स्वाहा॑॥2॥
यस्तु सर्वा॑णि भू॒तान्या॒त्मन्ने॒वानु॒पश्य॑ति।
स॒र्व॒भू॒तेषु॑ चा॒त्मानं॒ ततो॒ न वि चि॑कित्सति॥3॥
यस्मि॒न्त्सर्वा॑णि भू॒तान्या॒त्मैवाभू॑द्विजान॒तः।
तत्र॒ को मोहः॒ कः शोक॑ऽ एक॒त्वम॑नु॒पश्य॑तः॥4॥यजु॰ अ॰ 40। मं॰ 16, 6, 7॥
प॒रीत्य॑ भू॒तानि॑ प॒रीत्य॑ लो॒कान् प॒रीत्य॒ सर्वाः॑ प्र॒दिशो॒ दिश॑श्च।
उ॒प॒स्थाय॑ प्रथम॒जामृ॒तस्या॒त्मना॒त्मान॑म॒भि सं वि॑वेश॥5॥यजु॰ अ॰ 32। मं॰ 11॥
ऋ॒चो अ॒क्षरे॑ पर॑मे व्यो॑म॒न् यस्मि॑न् दे॒वा अधि॒ विश्वे॑ निषे॒दुः।
यस्तन्न वेद॒ किमृ॒चा क॑रिष्यति॒ य इत्तद्वि॒दुस्त इ॒मे समा॑सते॥6॥ऋ॰ म॰ 1। सूक्त 164। मं॰ 39॥
समाधिनिर्धूतमलस्य चेतसो निवेशितस्यात्मनि यत् सुखं भवेत्।
न शक्यते वर्णयितुं गिरा तदा स्वयं तदन्तःकरणेन गृह्यते॥7॥कठवल्ली॥
अर्थ—हे (दृते) सर्वदुःखविदारक परमात्मन्! तू (मा) मुझ को संन्यासमार्ग में (दृंह) बढ़ा। हे सर्वमित्र! तू (मित्रस्य) सर्वसुहृद् आप्त पुरुष की (चक्षुषा) दृष्टि से (मा) मुझ को सब का मित्र बना। जिस से (सर्वाणि) सब (भूतानि) प्राणिमात्र मुझ को मित्र की दृष्टि से (समीक्षन्ताम्) देखें, और (अहम्) मैं (मित्रस्य) मित्र की (चक्षुषा) दृष्टि से (सर्वाणि भूतानि) सब जीवों को (समीक्षे) देखूं। इस प्रकार आप की कृपा और अपने पुरुषार्थ से हम लोग एक-दूसरे को (मित्रस्य चक्षुषा) सुहृद्भाव की दृष्टि से (समीक्षामहे) देखते रहें॥1॥
हे (अग्ने) स्वप्रकाशस्वरूप, सब दुःखों के दाहक, (देव) सब सुखों के दाता परमेश्वर! (विद्वान्) आप (राये) योग के विज्ञानरूप धन की प्राप्ति के लिए (सुपथा) वेदोक्त धर्ममार्ग से (अस्मान्) हम को (विश्वानि) सम्पूर्ण (वयुनानि) प्रज्ञान और उत्तम कर्मों को (नय) कृपा से प्राप्त कीजिये और (अस्मत्) हम से (जुहुराणम्) कुटिल पक्षपातसहित (एनः) अपराध पाप कर्म को (युयोधि) दूर रखिये और इस अधर्माचरण से हम को सदा दूर रखिये। इसीलिए (ते) आप ही की (भूयिष्ठाम्) बहुत प्रकार (नमउक्तिम्) नमस्कारपूर्वक प्रशंसा को नित्य (विधेम) किया करें॥2॥
(यः) जो संन्यासी (तु) पुनः (आत्मन्नेव) आत्मा में अर्थात् परमेश्वर ही में तथा अपने आत्मा के तुल्य (सर्वाणि भूतानि) सम्पूर्ण जीव और जगत्स्थ पदार्थों को (अनुपश्यति) अनुकूलता से देखता है, (च) और (सर्वभूतेषु) सम्पूर्ण प्राणी अप्राणियों में (आत्मानम्) परमात्मा को देखता है, (ततः) इस कारण वह किसी व्यवहार में (न विचिकित्सति) संशय को प्राप्त नहीं होता, अर्थात् परमेश्वर को सर्वव्यापक सर्वान्तर्यामी सर्वसाक्षी जानके अपने आत्मा के तुल्य सब प्राणीमात्र को हानि-लाभ सुख-दुःखादि व्यवस्था में देखे, वही उत्तम संन्यास-धर्म को प्राप्त होता है॥3॥
(विजानतः) विज्ञानयुक्त संन्यासी का (यस्मिन्) जिस पक्षपातरहित धर्मयुक्त संन्यास में (सर्वाणि भूतानि) सब प्राणीमात्र (आत्मैव) आत्मा ही के तुल्य जानना, अर्थात् जैसा अपना आत्मा अपने को प्रिय है, उसी प्रकार का निश्चय (अभूत्) होता है, (तत्र) उस संन्यासाश्रम में (एकत्वमनुपश्यतः) आत्मा के एकभाव को देखनेवाले संन्यासी को (को मोहः) कौन सा मोह और (कः शोकः) कौन सा शोक होता है? अर्थात् न उस को किसी से कभी मोह और न शोक होता है। इसलिए संन्यासी मोह-शोकादि दोषों से रहित होकर सदा सब का उपकार करता रहे॥4॥
जो (भूतानि) सम्पूर्ण पृथिव्यादि भूतों में (परीत्य) व्याप्त (लोकान्) सम्पूर्ण लोकों में (परीत्य) पूर्ण हो, और (सर्वाः) सब (प्रदिशो दिशश्च) दिशा और उपदिशाओं में (परीत्य) व्यापक होके स्थित है, (ऋतस्य) सत्यकारण के योग से (प्रथमजाम्) सब महत्तत्त्वादि सृष्टि को धारण करके पालन कर रहा है, उस (आत्मानम्) परमात्मा को संन्यासी (आत्मना) स्वात्मा से (उपस्थाय) समीप स्थित होकर उस में (अभिसंविवेश) प्रतिदिन समाधियोग से प्रवेश किया करे॥5॥
हे संन्यासी लोगो ! (यस्मिन्) जिस (परमे) सर्वोत्तम (व्योमन्) आकाशवत् व्यापक (अक्षरे) नाशरहित परमात्मा में (ऋचः) ऋग्वेदादि वेद और (विश्वे) सब (देवाः) पृथिव्यादि लोक और समस्त विद्वान् (अधिनिषेदुः) स्थित हुए और होते हैं, (यः) जो जन (तत्) उस व्यापक परमात्मा को (न वेद) नहीं जानता, वह (ऋचा) वेदादि शास्त्र पढ़ने से (किं करिष्यति) क्या सुख वा लाभ कर लेगा ? अर्थात् विद्या के विना परमेश्वर का ज्ञान कभी नहीं होता। और विद्या पढ़के भी जो परमेश्वर को नहीं जानता और न उस की आज्ञा में चलता है, वह मनुष्य-शरीर धारण करके निष्फल चला जाता है और (ये) जो विद्वान् लोग (तत्) उस ब्रह्म को (विदुः) जानते हैं। (ते इमे इत्) वे ये ही उस परमात्मा में (समासते) अच्छे प्रकार समाधियोग से स्थिर होते हैं॥6॥
(समाधिनिर्धूतमलस्य) समाधियोग से निर्मल (चेतसः) चित्त के सम्बन्ध से (आत्मनि) परमात्मा में (निवेशितस्य) निश्चल प्रवेश कराये हुए जीव को (यत्) जो (सुखम्) सुख (भवेत्) होवे, वह (गिरा) वाणी से (वर्णयितुम् न शक्यते) कहा नहीं जा सकता। क्योंकि (तदा) तब वह समाधि में स्वयं स्थित जीवात्मा (तत्) उस ब्रह्म को (अन्तःकरणेन) शुद्ध अन्तःकरण से (गृह्यते) ग्रहण करता है, वह वर्णन करने में पूर्ण रीति से कभी नहीं आ सकता। इसलिए संन्यासी लोग परमात्मा में स्थित रहें और उस की आज्ञा अर्थात् पक्षपात-रहित न्याय-धर्म में स्थित होकर सत्योपदेश, सत्यविद्या के प्रचार से सब मनुष्यों को सुख पहुंचाते रहें॥7॥
इस प्रकार परमात्मा की स्तुति प्रार्थना और धर्म में दृढ़ निष्ठा करके,
सम्मानाद् ब्राह्मणो नित्यमुद्विजेत विषादिव।
अमृतस्येव चाकाङ्क्षेदवमानस्य सर्वदा ॥1॥
यमान् सेवेत सततं न नियमान् केवलान् बुधः।
यमान् पतत्यकुर्वाणो नियमान् केवलान् भजन्॥2॥
अर्थ—संन्यासी जगत् के सम्मान से विष के तुल्य डरता रहे और अमृत के समान अपमान की चाहना करता रहे, क्योंकि जो अपमान से डरता और मान की इच्छा करता है, वह प्रशंसक होकर मिथ्यावादी और पतित हो जाता है। इसलिए चाहे निन्दा चाहे प्रशंसा, चाहे मान चाहे अपमान, चाहे जीना चाहे मृत्यु, चाहे हानि चाहे लाभ हो, चाहे कोई प्रीति करे चाहे वैर बांधे, चाहे अन्न पान वस्त्र उत्तम स्थान न मिले वा मिले, चाहे शीत उष्ण कितना ही क्यों न हो, इत्यादि सब का सहन करे और अधर्म का खण्डन तथा धर्म का मण्डन सदा करता रहे। इससे परे उत्तम धर्म दूसरे किसी को न माने। परमेश्वर से भिन्न किसी की उपासना न करे। न वेदविरुद्ध कुछ माने। परमेश्वर के स्थान में सूक्ष्म वा स्थूल तथा जड़ और जीव को भी कभी न माने। आप सदा परमेश्वर को अपना स्वामी माने, और आप सेवक बना रहे। वैसा ही उपदेश अन्य को भी किया करे। जिस-जिस कर्म से गृहस्थों की उन्नति हो, वा माता, पिता पुत्र, स्त्री, पति, बन्धु, बहिन, मित्र, पाड़ोसी, नौकर, बड़े और छोटों में विरोध छूट कर प्रेम बढ़े, उस-उस का उपदेश करे।
जो वेद से विरुद्ध मतमतान्तर के ग्रन्थ बायबल, कुरान, पुराण, मिथ्याभिलाप तथा काव्यालङ्कार कि जिन के पढ़ने-सुनने से मनुष्य विषयी और पतित हो जाते हैं, उन सब का निषेध करता रहे। विद्वानों और परमेश्वर से भिन्न न किसी को देव तथा विद्या, योगाभ्यास, सत्सङ्ग और सत्यभाषणादि से भिन्न न किसी को तीर्थ और विद्वानों की मूर्तियों से भिन्न पाषाणादि मूर्तियों को न माने, न मनवावे। वैसे ही गृहस्थों को माता पिता आचार्य अतिथि, स्त्री के लिये विवाहित पुरुष और पुरुष के लिये विवाहित स्त्री की मूर्ति से भिन्न किसी की मूर्ति को पूज्य न समझावे, किन्तु वैदिक मत की उन्नति और वेदविरुद्ध पाखण्डमतों के खण्डन करने में सदा तत्पर रहे।
वेदादि शास्त्रों में श्रद्धा और तद्विरुद्ध ग्रन्थों वा मतों में अश्रद्धा किया कराया करे। आप शुभ गुण, कर्म, स्वभावयुक्त होकर सब को इसी प्रकार के करने में प्रयत्न किया करे और जो पूर्वोक्त उपदेश लिखे हैं, उन-उन अपने संन्यासाश्रम के कर्त्तव्य कर्मों को किया करे। खण्डनीय कर्मों का खण्डन करना कभी न छोड़े। आसुर अर्थात् अपने को ईश्वर ब्रह्म माननेवालों का भी यथावत् खण्डन करता रहे। परमेश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव और न्याय आदि गुणों का प्रकाश करता रहे। इस प्रकार कर्म करता हुआ स्वयम् आनन्द में रहकर सब को आनन्द में रक्खे।
सर्वदा (अहिंसा) निर्वैरिता, (सत्यम्) सत्य बोलना, सत्य मानना, सत्य करना, (अस्तेयम्) मन, कर्म, वचन से अन्याय करके पर-पदार्थ का ग्रहण न करना चाहिये, न किसी को करने का उपदेश करे। (ब्रह्मचर्यम्) सदा जितेन्द्रिय होकर अष्टविध मैथुन का त्याग रखके वीर्य की रक्षा और उन्नति करके चिरञ्जीवी होकर सब का उपकार करता रहे। (अपरिग्रहः) अभिमानादि दोष रहित, किसी संसार के धनादि पदार्थों में मोहित होकर कभी न फंसे। इन पांच यमों का सेवन सदा किया करे और इन के साथ 5 पांच नियम अर्थात् (शौच) बाहर-भीतर से पवित्र रहना, (सन्तोष) पुरुषार्थ करते जाना और हानि-लाभ में प्रसन्न और अप्रसन्न न होना। (तपः) सदा पक्षपातरहित न्यायरूप धर्म का सेवन प्राणायामादि योगाभ्यास करना। (स्वाध्याय) सदा प्रणव का जप अर्थात् मन में चिन्तन और उस के अर्थ=ईश्वर का विचार करते रहना। (ईश्वर-प्रणिधान) अर्थात् अपने आत्मा को वेदोक्त परमेश्वर की आज्ञा में समर्पित करके परमानन्द परमेश्वर के सुख को जीता हुआ भोगकर शरीर छोड़के सर्वानन्दयुक्त मोक्ष को प्राप्त होना संन्यासियों के मुख्य कर्म हैं।
हे जगदीश्वर! सर्वशक्तिमन्, सर्वान्तर्यामिन्, दयालो, न्यायकारिन्, सच्चिदानन्दानन्त नित्य शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव, अजर, अमर, पवित्र, परमात्मन्! आप अपनी कृपा से संन्यासियों को पूर्वोक्त कर्मों में प्रवृत्त रखके परममुक्ति-सुख को प्राप्त कराते रहिए॥
॥ इति संन्याससंस्कारविधिः समाप्तः॥
[1]इसी पद से भ्रान्ति में पड़के संन्यासियों का दाह नहीं करते, और संन्यासी लोग अग्नि को नहीं छूते। यह पाप संन्यासियों के पीछे लग गया। यहां आहवनीयादिसंज्ञक अग्नियों को छोड़ना है स्पर्श वा दाहकर्म छोड़ना नहीं है।
[2]अथवा गेरू से रंगे हुए वस्त्रों को पहिने।
[3]निरन्तर शब्द का इतना ही अर्थ है कि मुक्ति के नियत समय के मध्य में दुःख आकर विघ्न नहीं कर सकता।
[4]अनन्त इतना ही है कि मुक्ति-सुख के समय में अन्त अर्थात् जिस का नाश न होवे।
[5](प्राणापान) इत्यादि से लेके (परमात्मा में शुध्यताम्) इत्यन्त मन्त्रों से संन्यासी के लिये उपदेश है, अर्थात् जो संन्यासाश्रम ग्रहण करे, वह धर्माचरण सत्योपदेश, योगाभ्यास, शम, दम, शान्ति, सुशीलतादि, विद्या-विज्ञानादि शुभ गुण, कर्म, स्वभावों से सहित होकर, परमात्मा को अपना सहायक मान कर, अत्यन्त पुरुषार्थ से शरीर, प्राण, मन, इन्द्रियादि को अशुद्ध व्यवहार से हटा शुद्ध व्यवहार में चलाके, पक्षपात, कपट, अधर्म व्यवहारों को छोड़, अन्य के दोष पढ़ाने और उपदेश से छुड़ा कर, स्वयम् आनन्दित होके, सब मनुष्यों को आनन्द पहुंचाता रहे।
[6]ये सब प्राणापानव्यान॰ आदि मन्त्र तैत्तिरीय आरण्यक दशम प्रपाठक अनुवाक 51। 52। 53। 54। 55। 56। 57। 58। 59। 60॥ 66। 67। 68 के हैं।
[7]* पुत्रादि के मोह, वित्तादि पदार्थों के मोह और लोकस्थ प्रतिष्ठा की इच्छा से मन को हटाकर परमात्मा में आत्मा को दृढ़ करके जो भिक्षाचरण करते हैं, वे ही सब को सत्योपदेश से अभयदान देते हैं, अर्थात् दहने हाथ में जल लेके मैंने आज से पुत्रादि का तथा वित्त का मोह और लोक में प्रतिष्ठा की इच्छा करने का त्याग कर दिया, और मुझ से सब भूत प्राणीमात्र को अभय प्राप्त होवे, यह मेरी सत्य वाणी है।
[8]हे (अग्ने) विद्वन् ! (येन) जिस से (सहस्रम्) सब संसार को अग्नि धारण करता है, और (येन) जिस से तू (सर्ववेदसम्) गृहाश्रमस्थ पदार्थमोह यज्ञोपवीत और शिखा आदि को (वहसि) धारण करता है, उन को छोड़। (तेन) उस त्याग से (नः) हम को (इमम्) इस संन्यासरूप (स्वाहा) सुख देनेहारे (यज्ञम्) प्राप्त होने योग्य यज्ञ को (देवेषु) विद्वानों में (गन्तवे) जाने को (वह) प्राप्त हो।
[9](यः) जो पुरुष (प्रत्यक्षम्) साक्षात्कारता से (ब्रह्म) परमात्मा को (विद्यात्) जाने, (यस्य) जिस के (परूंषि) कठोर स्वभाव आदि, (सम्भाराः) होम करने के साकल्य और (यस्य) जिस के (ऋचः) यथार्थ सत्यभाषण, सत्योपदेश और ऋग्वेद ही (अनूक्यम्) अनुकूलता से कहने के योग्य वचन हैं, वही संन्यास ग्रहण करे॥1॥
[10](यस्य) जिस के (सामानि) सामवेद (लोमानि) लोम के समान, (यजुः) यजुर्वेद जिस के (हृदयम्) हृदय के समान (उच्यते) कहा जाता है, (परिस्तरणम्) जो सब ओर से शास्त्र, आसन आदि सामग्री (हविरित्) होम करने योग्य के समान है, वह संन्यास ग्रहण करने में योग्य होता है॥2॥
[11](वा) वा (यत्) जो (अतिथिपतिः) अतिथियों का पालन करने हारा (अतिथीन्) अतिथियों के प्रति (प्रतिपश्यति) देखता है, वही विद्वान् संन्यासियों में (देवयजनम्) विद्वानों के यजन करने के समान (प्रेक्षते)
ज्ञानदृष्टि से देखता और संन्यास लेने का अधिकारी होता है॥3॥
[12]और (यत्) जो संन्यासी (अभिवदति) दूसरे के साथ संवाद वा दूसरे को अभिवादन करता है, वह जानो (दीक्षाम्) दीक्षा को (उपैति) प्राप्त होता है, (यत्) जो (उदकम्) जल की (याचति) याचना करता है, वह जानो (अपः) प्रणीता आदि में जल को (प्रणयति) डालता है॥4॥
[13](यज्ञे) यज्ञ में (याः एव) जिन्हीं (आपः) जलों का (प्रणीयन्ते) प्रयोग किया जाता है (ता एव) वे ही (ताः) पात्र में रक्खे जल संन्यासी की यज्ञस्थ जलक्रिया हैं॥5॥
[14]संन्यासी (यत्) जो (आवसथान्) निवास स्थान (कल्पयन्ति) कल्पना करते हैं, वे (सदः) यज्ञशाला (हविर्धानान्येव) हविष् के स्थापन करने के ही पात्र (तत्) वे कल्पयन्ति समर्थित करते हैं॥6॥
[15]और (यत्) जो संन्यासी लोग (उपस्तृणन्ति) बिछौने आदि करते हैं, (बर्हिरेव तत्) वह कुशपिञ्जूली के समान है॥7॥
[16]और जो (तेषाम्) उन (आसन्नानाम्) समीप बैठनेहारों के निकट बैठा हुआ (अतिथिः) जिस की कोई नियत तिथि न हो, वह भोजनादि करता है, वह (आत्मन्) जानो वेदीस्थ अग्नि में होम करने के समान आत्मा में (जुहोति) आहुतियां देता है॥8॥
[17]और जो संन्यासी (हस्तेन) हाथ से खाता है, वह जानो (स्रुचा) चमसा आदि से वेदी में आहुति देता है। जैसा (यूपे) स्थम्भे में अनेक प्रकार के पशु आदि को बांधते हैं, वैसे वह संन्यासी (स्रुक्कारेण) स्रुचा के समान (वषट्कारेण) होमक्रिया के तुल्य (प्राणे) प्राण में मन और इन्द्रियों को बांधता है॥9॥
[18](एते वै) ये ही (ऋत्विजः) समय-समय में प्राप्त होनेवाले (प्रियाः च अप्रियाः च) प्रिय और अप्रिय भी संन्यासी जन (यत्) जिस कारण (अतिथयः) अतिथिरूप हैं, इस से गृहस्थ को (स्वर्गं लोकम्) दर्शनीय अत्यन्त सुख को (गमयन्ति) प्राप्त कराते हैं॥10॥
[19](एतस्य) इस संन्यासी का (प्राजापत्यः) प्रजापति परमात्मा को जानने का आश्रमधर्मानुष्ठान रूप (यज्ञः) अच्छे प्रकार करने योग्य यतिधर्म (विततः) व्यापक है, अर्थात् (यः) जो इस को सर्वोपरि (उपहरति) स्वीकार करता है, (वै) वही संन्यासी होता है॥11॥
[20](यः) जो (एषः) यह संन्यासी (प्रजापतेः) परमेश्वर के जानने रूप संन्यासाश्रम के (विक्रमान्) सत्याचारों की (अनुविक्रमते) अनुकूलता से क्रिया करता है, (वै) वही सब शुभगुणों को (उपहरति) स्वीकार करता है॥12॥
[21](यः) जो (अतिथीनाम्) अतिथि अर्थात् उत्तम संन्यासियों का संग है, (सः) वह संन्यासी के लिए (आहवनीयः) आहवनीय अग्नि अर्थात् जिस में ब्रह्मचर्याश्रम में ब्रह्मचारी होम करता है, और (यः) जो संन्यासी का (वेश्मनि) घर में अर्थात् स्थान में निवास है, (सः) वह उस के लिए (गार्हपत्यः) गृहस्थ सम्बन्धी अग्नि है, और संन्यासी का (यस्मिन्) जिस जाठराग्नि में अन्नादि को (पचन्ति) पकाते हैं (सः) वह (दक्षिणाग्निः) वानप्रस्थ सम्बन्धी अग्नि है, इस प्रकार आत्मा में सब अग्नियों का आरोपण करे॥13॥
[22](यः) जो गृहस्थ (अतिथेः) संन्यासी से (पूर्वः) प्रथम (अश्नाति) भोजन करता है, (एषः) यह जानो (गृहाणाम्) गृहस्थों के (इष्टम्) इष्ट सुख (च) और उस की सामग्री, (पूर्त्तम्) तथा जो ऐश्वर्यादि की पूर्णता (च) और उस के साधनों का (वै) निश्चय करके (अश्नाति) भक्षण अर्थात् नाश करता है। इसलिए जिस गृहस्थ के समीप अतिथि उपस्थित होवे उस को पूर्व जिमाकर पश्चात् भोजन करना अत्युचित है॥14॥
[23]इस के आगे तैत्तिरीय आरण्यक का अर्थ करते हैं—(एवम्) इस प्रकार संन्यास ग्रहण किये हुए (तस्य) उस (विदुषः) विद्वान् संन्यासी के संन्यासाश्रमरूप (यज्ञस्य) अच्छे प्रकार अनुष्ठान करने योग्य यज्ञ का (यजमानः) पति (आत्मा) स्वस्वरूप है, और जो ईश्वर, वेद और सत्यधर्माचरण, परोपकार में (श्रद्धा) सत्य का धारणरूप दृढ़ प्रीति है, वह उस की (पत्नी) स्त्री है, और जो संन्यासी का (शरीरम्) शरीर है, वह (इध्मम्) यज्ञ के लिए इन्धन है, और जो उस का (उरः) वक्षःस्थल है, वह (वेदिः) कुण्ड, और जो उस के शरीर पर (लोमानि) रोम हैं, वे (बर्हिः) कुशा हैं, और जो (वेदः) वेद और उन का शब्दार्थ-सम्बन्ध जानकर आचरण करना है, वह संन्यासी की (शिखा) चोटी है, और जो संन्यासी का (हृदयम्) हृदय है, वह (यूपः) यज्ञ का स्तम्भ है, और जो इस के शरीर में (कामः) काम है, वह (आज्यम्) ज्ञान अग्नि में होम करने का पदार्थ है, और जो (मन्युः) संन्यासी में क्रोध है, वह (पशुः) निवृत्त करने अर्थात् शरीर के मलवत् छोड़ने के योग्य है, और जो संन्यासी (तपः) सत्यधर्मानुष्ठान प्राणायामादि योगाभ्यास करता है, वह (अग्निः) जानो वेदी का अग्नि है, जो संन्यासी (दमः) अधर्माचरण से इन्द्रियों को रोकके धर्माचरण में स्थिर रखके चलाता है, वह (शमयिता) जानो दुष्टों को दण्ड देनेवाला सभ्य है, और जो संन्यासी की (वाक्) सत्योपदेश करने के लिए वाणी है वह जानो सब मनुष्यों को (दक्षिणा) अभयदान देना है। जो संन्यासी के शरीर में (प्राणः) प्राण है, वह (होता) होता के समान, जो (चक्षुः) चक्षु है, वह (उद्गाता) उद्गाता के तुल्य, जो (मनः) मन है वह (अध्वर्युः) अध्वर्यु के समान, जो (श्रोत्रम्) श्रोत्र है, वह (ब्रह्मा) ब्रह्मा और (अग्नीत्) अग्नि लानेवाले के तुल्य, (यावत् ध्रियते) जितना कुछ संन्यासी धारण करता है, (सा) वह (दीक्षा) दीक्षाग्रहण, और (यत्) जो संन्यासी (अश्नाति) खाता है (तद्धविः) वह घृतादि साकल्य के समान, (यत् पिबति) और जो वह जल, दुग्धादि पीता है, (तदस्य सोमपानम्) वह इस का सोमपान है, और (यद्रमते) वह जो इधर-उधर भ्रमण करता है, (तदुपसदः) वह उपसद उपसामग्री, (यत्सञ्चरत्युपविशत्युत्तिष्ठते च) जो वह गमन करता, बैठता और उठता है (स प्रवर्ग्यः) यह इस का प्रवर्ग्य है, (यन्मुखम्) जो इस का मुख है (तदाहवनीयः) वह संन्यासी की आहवनीय अग्नि के समान, (या व्याहृतिराहुतिर्यदस्य विज्ञानम्) जो संन्यासी का व्याहृति का उच्चारण करना वा जो इस का विज्ञान आहुतिरूप है (तज्जुहोति) वह जानो होम कर रहा है, (यत्सायं प्रातरत्ति) संन्यासी जो सायं और प्रातःकाल भोजन करता है (तत्समिधम्) वे समिधा हैं, (यत्प्रातर्मध्यन्दिनं सायं च) जो संन्यासी प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल में कर्म करता है (तानि सवनानि) वे तीन सवन, (ये अहोरात्रे) जो दिन और रात्रि हैं (ते दर्शपौर्णमासौ) वे संन्यासी के पौर्णमासेष्टि और अमावास्येष्टि हैं, (येऽर्धमासाश्च, मासाश्च) जो कृष्ण शुक्लपक्ष और महीने हैं (ते चातुर्मास्यानि) वे संन्यासी के चातुर्मास्य याग हैं, (य ऋतवः) जो वसन्तादि ऋतु हैं (ते पशुबन्धाः) वे जानो संन्यासी के पशुबन्ध अर्थात् पशुओं का बांधना रखना है, (ये संवत्सराश्च परिवत्सराश्च) जो संवत्सर और परिवत्सर अर्थात् वर्ष वर्षान्तर हैं (तेऽहर्गणाः) वे संन्यासी के अहर्गण—दो रात्रि वा तीन रात्रि आदि के व्रत हैं, जो (सर्ववेदसं वै) सर्वस्व दक्षिणा अर्थात् शिखा सूत्र यज्ञोपवीत आदि पूर्वाश्रम चिह्नों का त्याग करना है, (एतत्सत्रम्) यह सब से बड़ा यज्ञ है, (यन्मरणम्) जो संन्यासी का मृत्यु है (तदवभृथः) वह यज्ञान्तस्नान है, (एतद्वै जरामर्यमग्निहोत्रं सत्रम्) यही जरावस्था और मृत्युपर्यन्त अर्थात् यावज्जीवन है तावत् सत्योपदेश योगाभ्यासादि संन्यास के धर्म का अनुष्ठान अग्निहोत्ररूप बड़ा दीर्घ यज्ञ है। (य एवं विद्वानुदगयने॰) जो इस प्रकार विद्वान् संन्यास लेकर विज्ञान, योगाभ्यास करके शरीर छोड़ता है वह विद्वानों ही के महिमा को प्राप्त होकर स्वप्रकाशस्वरूप परमात्मा के सङ्ग को प्राप्त होता है, और जो योग-विज्ञान से रहित है सो सांसारिक दक्षिणायनरूप व्यवहार में मृत्यु को प्राप्त होता है। वह पुनः पुनः माता-पिताओं ही के महिमा को प्राप्त होकर चन्द्रलोक के समान वृद्धि-क्षय को प्राप्त होता है और जो इन दोनों के महिमाओं को विद्वान् ब्राह्मण अर्थात् संन्यासी जीत लेता है वह उस से परे परमात्मा के महिमा को प्राप्त होकर मुक्ति के समय-पर्यन्त मोक्ष-सुख को भोगता है।
[24](न्यास इत्याहुर्मनीषिणः॰) इस अनुवाक का अर्थ सुगम है इसलिए भावार्थ कहते हैं। न्यास अर्थात् जो संन्यास शब्द का अर्थ पूर्व कह आये, उस रीति से जो संन्यासी होता है वह परमात्मा का उपासक है। वह परमेश्वर सूर्यादि लोकों में व्याप्त और पूर्ण है कि जिस के प्रताप से सूर्य तपता है। उस तपने से वर्षा, वर्षा से ओषधी वनस्पति की उत्पत्ति, उन से अन्न, अन्न से प्राण, प्राण से बल, बल से तप अर्थात् प्राणायाम योगाभ्यास, उस से श्रद्धा— सत्यधारण में प्रीति, उस से बुद्धि, बुद्धि से विचारशक्ति, उस से ज्ञान, ज्ञान से शान्ति, शान्ति से चेतनता, चित्त से स्मृति, स्मृति से पूर्वापर का ज्ञान, उस से विज्ञान और विज्ञान से आत्मा को संन्यासी, जानता और जनाता है। इसलिए अन्नदान श्रेष्ठ जिस से प्राण, बल, विज्ञानादि होते हैं। जो प्राणों का आत्मा, जिस से यह सर्व जगत् ओतप्रोत व्याप्त हो रहा है। वह सब जगत् का कर्त्ता, वही पूर्वकल्प और उत्तरकल्प में भी जगत् को बनाता है। उस के जानने की इच्छा से उस को जानकर हे संन्यासिन् ! तू पुनः-पुनः मृत्यु को प्राप्त मत हो, किन्तु मुक्ति के पूर्ण सुख को प्राप्त हो। इसलिए सब तपों का तप, सब से पृथक् उत्तम संन्यास को कहते हैं। हे परमेश्वर ! जो तू सब में वास करता हुआ विभु है, तू प्राण का प्राण, सब का सन्धान करनेहारा, विश्व का स्रष्टा, धर्त्ता, सूर्यादि को तेजदाता है। तू ही अग्नि से तेजस्वी, तू ही विद्यादाता, तू ही सूर्य का कर्त्ता, तू ही चन्द्रमा के प्रकाश का प्रकाशक है। वह सब से बड़ा पूजनीय देव है। (ओम्) इस मन्त्र का मन से उच्चारण करके परमात्मा में आत्मा को युक्त करे। जो इस विद्वानों की ग्राह्य महोत्तम विद्या को उक्त प्रकार से जानता है, वह संन्यासी परमात्मा के महिमा को प्राप्त होकर आनन्द में रहता है।