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भ्रान्ति-निवारण - 2

In Hindi:

महर्षि दयानन्द व्याख्या : पण्डित महेशचन्द्र न्यायरत्नकृत वेदभाष्यपरत्व प्रश्नपुस्तक का

पण्डित स्वामी दयानन्द सरस्वतीजी की ओर से उत्तर

पण्डित महेशचन्द्र न्यायरत्नजी ने विरुद्ध पण्डितों के साथ में अपनी राय दी है, तो उन्हीं के उत्तर में इन का भी उत्तर मेरी ओर से जान लेना।

पं॰ महेश॰—पण्डित दयानन्द सरस्वतीजी के परिश्रम, विद्या और पण्डिताई निस्सन्देह प्रशंसा योग्य हैं, परन्तु उनका कुछ फल मालूम नहीं देता।

स्वामीजी—सम्मति देने वालों की निष्पक्षता और न्याय तो उन के कथन से ही प्रत्यक्ष है कि जिस को छोटे विद्वान् लड़के भी जान लेंगे। क्योंकि पण्डितजी लिखते हैं कि ‘स्वामीजी सब तरह विद्या आदि पूर्ण गुणयुक्त होने से प्रशंसायोग्य हैं, परन्तु कुछ फलदायक नहीं।’ तो उन का यह कथन पूर्वापर विरोधी है, और इस में उन का हठ वा वेदविद्या से विमुखता साबित होती है।

पं॰ महेश॰—स्वामीजी का यह गुमान वा अभिप्राय है कि वेद में एक परमेश्वर की पूजा ठीक है, तथा सब संसारी विद्या और वर्त्तमानकाल की कलाकौशलादि पदार्थ विद्या वेदों से ही निकली है। इत्यादि बातें उन का काम मट्टी कर देती हैं।

स्वामीजी—इस बात का उत्तर मैं ग्रिफिथ साहब के उत्तर में दे चुका हूँ। जब पण्डितजी के विचार से वेदों में एक परमेश्वर की उपासना नहीं है तो उन को उचित था वा अब भी चाहिये कि कोई मन्त्र वेदों में से लिख कर यह बात सिद्ध करदें कि वेदों में अनेक परमेश्वरों का होना सिद्ध है। क्योंकि उन्होंने वेदमन्त्रों में से कोई प्रमाण अपने पक्ष की पुष्टि के लिये नहीं लिखा, इससे इनके मन का अभिप्राय खुल गया, और उन की विद्या की थाह मिल गई कि उन्होंने जो अटकलपच्चू कूप शब्द के समान चतुराई दिखलाई है, ये सब किसी ईर्ष्यक, स्वार्थी, विद्याहीन और पक्षपाती मनुष्य के फुसलाने से वा अपनी ही थोड़ी सामग्री अर्थात् हलदी की गाँठ के बल से लिखकर बैठ रहे, कि जिस में वृथा कीर्ति देश में हो जावे।

सो पण्डितजी यह न समझें कि भारतवर्ष में विद्वान् नहीं रहे। यह व्याघ्र की खाल किसी दिन उघड़ कर सब कलई खुल जावेगी। और मैं तो अपनी थोड़ीसी विद्या और बुद्धि के अनुसार जो कुछ लिखूँगा वह सब को मालूम होता जावेगा, और जितना कर चुका वह जान लिया होगा। और कदाचित् पण्डितजी ने भी समझ लिया होगा, परन्तु मूक के समान संसारी और कल्पित भय से कंद का स्वाद जानकर यथार्थ और निष्पक्षता से कह और मान नहीं सकते हैं।

परमात्मा की कृपा से मेरा शरीर बना रहा और कुशलता से वह दिन देख मिला कि वेदभाष्य सम्पूर्ण हो जावे तो निस्सन्देह इस आर्य्यावर्त्त देश में सूर्य्य का सा प्रकाश हो जावेगा कि जिस के मेटने और झाँपने को किसी का सामर्थ्य न होगा। क्योंकि सत्य का मूल ऐसा नहीं कि जिस को कोई सुगमता से उखाड़ सके। और कभी भानु के समान ग्रहण में भी आजावे, तो थोड़े ही काल में फिर उग्रह अर्थात् निर्मल हो जावेगा।

पं॰ महेश॰—स्वामीजी हिन्दुओं के धर्मप्रचारी ग्रन्थों को नहीं मानते कि जिन में कर्मकाण्ड और होमादिक का विधान है, किन्तु केवल वेदों ही की तरफ खचते हैं। इससे मेरी समझ से तो उन को यही उचित है कि वेदों को भी एक तरफ डाल कर अपनी युक्ति और बुद्धि ही के अनुसार वर्ताव वर्त्तें।

स्वामीजी—इस जगह पण्डितजी की और भी बढ़कर भूल साबित होती है, तथा जाना जाता है कि उन्होंने प्राचीन सत्य ग्रन्थ कभी देखे भी नहीं। और कल्पना किया कि देखे हों तो केवल दर्शनमात्र किया हो, नहीं तो खाली तुकें न मिलाते। अब कोई साहब पण्डितजी से पूछें कि उन्होंने हिन्दू शब्द कौन से ग्रन्थ में देखा है, कि जिस के अर्थ गुलाम वा काफिर आदि के हैं, और जो कि आर्य्यावर्त्तियों को कलंकरूप नाम यवनादिक की ओर से है। और आर्य्य शब्द जिस के अर्थ श्रेष्ठ के हैं, वह वेदों में अनेक ठिकाने मिलता है। सो पण्डितजी नौका में धूर उड़ाते हैं। सो कब हो सकता है? और भूषण को दूषण करके मानते हैं, तो माना करो, परन्तु विद्वानों और पूर्ण पण्डितों की ऐसी उल्टी रीति निज धर्मशास्त्र से विरुद्ध कभी नहीं होगी।

आगे वे लिखते हैं कि ‘स्वामीजी धर्मप्रचारी ग्रन्थों को ही नहीं मानते हैं कि जिन में कर्मकाण्ड का विधान है।’ तो यह बड़े तमाशे की बात है कि न तो पण्डितजी ने कभी मुझ से मिलकर चिरकाल विचार किया, और न उन्होंने मेरे बनाये हुये ग्रन्थ देखे, किन्तु प्रथम ही मेरे मानने न मानने के विषय में अपना सिद्धान्त कर बैठे। तो यह वही बात हुई कि सोवें झोंपड़े में और स्वप्न देखें राजमहलों का। क्योंकि मैं अपने निश्चय और परीक्षा के अनुसार ऋग्वेद से लेके पूर्व मीमांसा पर्य्यन्त अनुमान से तीन हजार ग्रन्थों के लगभग मानता हूँ।

तथा कर्मकाण्ड के विषय में यह उत्तर है कि मेरा मत वेद पर है। इसलिये जो जो कर्मकाण्ड वेदानुकूल है, उस सब को मानता हूँ, उस से विरुद्ध को नहीं। क्योंकि वे ग्रन्थ मनुष्यों ने अपने स्वार्थसाधन के निमित्त रच लिये हैं। वे वेद, युक्ति वा प्रमाण से सिद्ध नहीं हो सकते। जो संस्कार आदि मैं मानता हूँ वे सब मेरी बनाई हुई वेद भूमिका अङ्क ३ में तथा संस्कारविधि आदि ग्रन्थों में देखना चाहिये।

और वे लिखते हैं कि ‘वेदों को भी एक तरफ धर दें केवल अपनी युक्ति वा बुद्धि ही के आधारी रहें’ तो उत्तर यह है कि मैं वेदों में कोई बात युक्तिविरुद्ध वा दोष की नहीं देखता, और उन्हीं पर मेरा मत है। सो यह सब भेद मेरे वेदभाष्य में खुलता जायगा। और विद्वानों का यह काम नहीं कि किसी हेतु से सत्य को त्याग के असत्य का ग्रहण करें।

पं॰ महेश॰—हिन्दुओं का विश्वास है कि देववाणी का प्रकाश परमेश्वर की ओर से वेद पुस्तकों के रूप से हुआ है, वा ऋषियों के द्वारा प्रेरणा की गई है, परन्तु मेरी समझ से तो दोनों प्रकार ठीक नहीं हो सकता।

स्वामीजी—इस बात का उत्तर वेदभाष्य की भूमिका अङ्क १ प्रथम ‘वेदोत्पत्ति प्रकरण’ में देख लेना चाहिये। परन्तु इतना यहाँ भी मैं कहता हूँ कि आर्य्य लोग सनातन से युक्ति-प्रमाण सहित वेदों को परमेश्वरकृत मानते बराबर चले आये हैं। इस का ठीक ठीक विचार आर्य्य लोग ही कर सकते हैं, हिन्दू विचारों का क्या ही सामर्थ्य है।

पं॰ महेश॰—वेद इस विषय में स्वतः प्रमाण हैं कि उन में बहुधा होम बलिदान आदि का विधान है। तथा इस का प्रमाण अन्य ग्रन्थों में भी पाया जाता है कि जिन को स्वामीजी भी मानते हैं। इसलिये वे वेदमत को स्वीकार करके होमादिक से अलग नहीं बच सकते हैं, सिवाय ऐसे मनुष्य के कि जो स्वामीजी की तरह अपनी नवीन रीति से मन्त्रभाष्य की रचना करे। देखना चाहिये कि यह स्वामीजी का परिश्रम कैसा वृथा समझा जा सकता है कि जब मैं उन के भाष्य की परीक्षा करूँगा।

स्वामीजी—वेदों में जो यज्ञादिक करने की आज्ञा है, उस सब को प्रमाण और युक्ति सिद्ध होने के कारण मैं मानता हूँ, और सब को अवश्य मानना चाहिये, जैसे कि वेदभूमिका अङ्क ३ के ‘यज्ञप्रकरण’ में लिख दिया है। उस से विरुद्ध जो बलिदान आदि आजकल के लोगों ने समझ रक्खा है, यह सब वेदविरुद्ध है। और मेरा भाष्य तो नवीन रीति का नहीं ठहर सकता, क्योंकि वह प्राचीन सत्य ग्रन्थों के प्रमाणयुक्त बनता है। परन्तु पंडितजी का जो कथन है, सो केवल अप्रमाण है, और पंडितजी ने मन के ही गुलगुले खाये हैं। आगे मेरे ग्रन्थ की परीक्षा तो तमाम देश भर को हो ही जावेगी, परन्तु पंडितजी की विद्या तो अभी तुल गई।

पं॰ महेश॰—स्वामीजी का मन्त्रभाष्य ही अद्भुत नहीं है, किन्तु उनके लिखने की रीति और व्याकरण भी पंडितों के आगे हँसी के कराने वाले हैं। तथा कई अशुद्धियाँ जो उनके परीक्षकों ने निकाली हैं, वे इस बात को साफ साफ सिद्ध करती हैं कि स्वामीजी सत्य का प्रकाश तो नहीं करते किन्तु अपनी कीर्त्ति और नाम की प्रसिद्धि अवश्य चाहते हैं। जैसे कि वे ‘उपचक्रे’ शब्द को पाणिनि के ‘गन्धनावक्षे॰’ सूत्र से सिद्ध करते हैं, यह कभी नहीं हो सकता। यह बात मानी जा सकती है कि ‘उपचक्रे’ में आत्मनेपद लाया गया है साफ कहने के अर्थ में। परन्तु ‘उप कृञ्’ से यह अर्थ नहीं निकल सकता है, और न स्वामीजी का यह अभिप्राय है। क्योंकि वे उस का भाषा में अर्थ करते हैं कि ‘किया है’।

स्वामीजी—इन का उत्तर मैं पंडित गुरुप्रसाद आदि के ‘तर्कखंडन’ के साथ दे चुका हूँ, और पंडितजी ने कुछ उन से विशेष पकड़ नहीं की है। परन्तु इस बात का भेद सिवाय अन्तर्यामी परमेश्वर के, जीव नहीं जान सकता कि मैं लोकहित चाहता हूँ वा केवल विजय, अर्थात् नाम की प्रसिद्धि।

भाषार्थ में जो शब्द ‘किया है’ लाया गया तो इस का कारण यह है कि भाषा में संस्कृत का अभिप्रायमात्र लिखा है, केवल शब्दार्थ ही नहीं, क्योंकि भाषा करने का तो केवल यही तात्पर्य है कि जिन लोगों को संस्कृत का बोध नहीं है, उन को विना भाषार्थ के यथार्थ वेदज्ञान नहीं हो सकेगा। इसलिये भला यह कोई बात है कि ऐसी तुच्छ बातों में दोष पैदा करना, जो कि विद्वानों के विचार से दूर हैं। और ‘उप, कृञ्’ धातु का अर्थ है ‘उपकार और किया’ ये दोनों अर्थ भी भूतकाल की क्रिया को बतलाते हैं कि ईश्वर ने जीवों के हित के लिये वेदों का उपदेश किया है और ठीक ठीक घट सकता है।

पं॰ महेश॰—खैर ये तो साधारण बातें थीं, परन्तु अब मैं भारी भारी दोषों पर आता हूँ। मन्त्रभाष्य के प्रथम संस्कृतखंड में ‘अग्निमीडे पुरोहितम्’ इस के भाष्य में स्वामीजी ने अग्नि शब्द से ईश्वर का ग्रहण किया है, जबकि प्रसिद्ध अर्थ अग्नि शब्द के सिवाय आग के दूसरे कोई नहीं ले सकता। तथा सायणाचार्य्य वेद के भाष्यकार की इसी विषय में साक्षी वर्त्तमान है।

स्वामीजी अपने पक्ष में शतपथ ब्राह्मण और निरुक्त आदि को प्रमाण मानते हैं, परन्तु क्या ये भाष्य आदि अग्नि शब्द से परमेश्वर के अर्थ की पुष्टि कर सकते हैं, अर्थात् कभी नहीं। क्योंकि जो जो शब्द उन में ईश्वरार्थ में लिखे हैं, उन में अग्नि शब्द का नाम भी नहीं है। फिर स्वामीजी इसी पक्ष में ऐतरेयब्राह्मण का प्रमाण धरते हैं कि—“अग्निर्वै सर्वा देवताः॥ ऐ॰ १। पं॰ १॥” जिस का यहाँ कुछ सम्बन्ध नहीं है, किन्तु दीक्षास्थिति यज्ञ में लग सकता है। मैं यह आगे का वाक्य डाक्टर एम. हाग साहब के टीका सहित लिखता हूँ।

स्वामीजी—अब पंडितजी की ऐसी पकड़ से मालूम हो गया कि उन को संस्कृत ग्रन्थ समझने का बहुत ही बोध है, और विद्वानों को चाहिये कि पंडितजी की खातर से मान भी लें कि वेदविद्या के बड़े प्रवीण हैं। सत्य तो यह है कि उन्होंने प्राचीन ऋषि मुनियों के ग्रन्थ कभी नहीं देखे, और उन को ठीक ठीक अर्थ समझने का बिलकुल ज्ञान नहीं। क्योंकि जिन जिन ग्रन्थों अर्थात् वेद, शतपथ और निरुक्त आदियों के प्रमाण मैंने वेदभाष्य में लिखे हैं, उन को ठीक ठीक विचारने से आयने के समान जान पड़ता है कि ‘अग्नि’ शब्द से ‘आग’ और ‘ईश्वर’ दोनों का ग्रहण है। जैसे देखो कि—

१-‘इन्द्रं मित्रं वरुण॰॥’ २-‘तदेवाग्निस्तदादित्य॰॥’ ३-‘अग्निर्होता कविः०॥’ ४-‘ब्रह्म ह्यग्निः॥’ ५-‘आत्मा वा अग्निः॥’

देखिये विद्यानेत्र से इन पाँच प्रमाणों में ‘अग्नि’ शब्द से परमेश्वर ही का ग्रहण होता है। ‘अयं वा अग्निः प्रजाश्च प्रजापतिश्च॥’ और इस प्रमाण में प्रजा शब्द से भौतिक अग्नि और प्रजापति शब्द से परमेश्वर लिया जाता है। इसी प्रकार “संवत्सरोऽग्निः॥” इत्यादि प्रमाणों मे ‘अग्नि’ शब्द से ठीक ठीक परमेश्वर का ग्रहण होता है।

तथा ‘अग्निर्वै सर्वा देवताः॥’ इस वचन में भी परमेश्वर और सांसारिक अग्नि का ग्रहण होता है। क्योंकि जहाँ उपास्य उपासक प्रकरण में सर्व देवता शब्द से अग्निसंज्ञक परमेश्वर का ग्रहण होता है, इस में मनु का प्रमाण दिया है। क्योंकि—

‘यत्रोपास्यत्वेन सर्वा देवतेत्युच्यते तत्र ब्रह्मात्मैव ग्राह्यः॥’

जो वे इस पंक्ति का अभिप्राय समझते तो उन को अग्नि शब्द से परमेश्वर के ग्रहण में कभी भ्रम न होता।

तथा निरुक्त से भी परमेश्वर और भौतिक इन दोनों का यथावत् ग्रहण होता है। देखो एक तो ‘अग्रणी’ इस शब्द से उत्तम परमेश्वर माना जाता है, इस में कुछ सन्देह नहीं। और दूसरा हेतु यह है कि ‘इतात्’ इस शब्द से अग्नि नाम ज्ञानस्वरूप परमेश्वर ही का ग्रहण हो सकता है। क्योंकि ‘इण् गतौ’ इस धातु से यहाँ ज्ञानार्थ ही अभिप्रेत है। ‘दग्धात्’ इस पद से केवल भौतिक अग्नि लिया जायगा, परमेश्वर नहीं। तथा ‘अक्तात्’ और ‘नीतात्’ इन दोनों से परमेश्वर और भौतिक दोनों लिये जाते हैं। क्योंकि इण् धातु से ऋषि का प्राप्ति और गमन अर्थ ही लेने का अभिप्राय होता, तो ‘अक्तात् दग्धात्, नीतात्’ ऐसे शब्दों का ग्रहण नहीं करते।

तथा जो ‘अग्नि’ शब्द से धात्वर्थ ग्रहण में यास्कमुनि का अभिप्राय नहीं होता, तो पृथक् पृथक् धातुओं को नहीं गिनते। और ‘अग्निर्वै सर्वा देवता इति निर्वचनाय’ इस वचन का अर्थ निरुक्तकार करते हैं कि जिस को बुद्धिमान् लोग अनेक नामों से वर्णन करते हैं, जो कि एक अद्वितीय, सब से बड़ा, सब का आत्मा है, उसी को ‘अग्नि’ कहते हैं।

‘उत्तरे ज्योतिषी एतेन नामधेयेन भजेते॥’

इस वचन में अग्नि शब्द से परमेश्वर और भौतिक दोनों का ग्रहण होता है। क्योंकि इस अग्नि नामधेय से दोनों उत्तर ज्योति अर्थात् अनन्त ज्ञान प्रकाशयुक्त परमेश्वर जो कि प्रलय के उत्तर सब से सूक्ष्म तथा आधार है, उस का, और जो विद्युत्रूप गुण वाला सब से सूक्ष्म स्थूल पदार्थों में प्रकाशित और प्रकाश करने वाला भौतिक अग्नि है, इन दोनों का यथावत् ग्रहण होता है।

इसी प्रकार ‘अग्निः पवित्रमुच्यते॥’ इत्यादि में भी अग्नि शब्द से दोनों ही को लेना होता है। तथा ‘प्रशासितारं॰’ जो सब को शिक्षा करने वाला, सूक्ष्म से भी अत्यन्त सूक्ष्म, प्रकाशस्वरूप, समाधियोग से जानने योग्य पर पुरुष परमात्मा है, विद्वान् उसी को परमेश्वर जानें। फिर ‘एतमेके वदन्त्यग्न॰’ विद्वान् लोग अग्नि आदि नामों करके एक परमेश्वर को ही कहते हैं।

ऊपर के सब प्रमाण अग्नि अर्थात् परमेश्वर में प्राचीन सत्यग्रन्थों की साक्षी से ठीक ठीक घटते हैं, परन्तु जो पण्डितजी के घर से निराले ग्रन्थ हैं, उनमें न होगा। और कदाचित् वे कहें कि निघण्टु में जो ईश्वर के नाम हैं उन में अग्नि शब्द नहीं आता, इस से मालूम हुआ कि अग्नि परमेश्वर की वाची नहीं, तो समझना चाहिये कि जैसे—निघण्टु के अ॰ २। खं॰ २२। में जो ‘राष्ट्री, अर्य्यः, नियुत्वान्, इनः’ ये चार ईश्वर के अप्रसिद्ध नाम हैं। और यह नहीं हो सकता कि जो नाम ईश्वर के निघण्टु में हों वे ही माने जायं, औरों को विद्वान् लोग छोड़ देवें। परमेश्वर के तो असंख्यात नाम हैं, और आप क्या चार ही नाम ईश्वर के समझते हैं? और क्या निघण्टु में न लिखने से ब्रह्म, परमात्मा आदि ईश्वर के नाम नहीं हैं? यह पण्डितजी की बिलकुल भूल है। जैसे ब्रह्म आदि ईश्वर के नाम निघण्टु के विना लिखे भी लिये जाते हैं, वैसे अग्नि आदि भी परमेश्वर के नाम हैं। इस पूर्वपक्ष में जो कुछ अवश्य था संक्षेप से लिख दिया। यह बात वेदभाष्य के अङ्क ३ में विस्तारपूर्वक सिद्ध कर दी है, वहाँ देख लेना।

पंडितजी आर॰ ग्रिफिथ साहब और सी॰ एच॰ टानी साहबों के पीछे पीछे चलते हैं। सो इस का कारण यह है कि पंडितजी ने महीधरादि की अशुद्ध टीका देख ली है। और उक्त साहबों ने प्रोफेसर विलसन आदि के उन्हीं अशुद्ध भाष्यों के उलथे अंग्रेजी में देख लिये होंगे। उनसे क्या हो सकता है। जब तक सत्य ग्रन्थों और मूलमन्त्रों को न देखें समझें, तब तक वेद-मन्त्रों का अभिप्राय ठीक ठीक जान लेना लड़कों का खिलौना नहीं है। इसी के समान पंडितजी का और कथन भी है, इसलिये अब दूसरी बात का उत्तर लिखते हैं—

‘अग्निर्वै सर्वा देवताः। देवानामवमो विष्णुः परमस्तदन्तरेण सर्वा अन्या देवताः’ इत्यादि पर जो पंडितजी ने लिखा है, सो भी अयुक्त है। क्योंकि वेदमन्त्रादि प्रमाणों को छोड़ कर ‘अग्निर्वै सर्वा॰’ इस पद पर लिखने से मालूम होता है कि पंडितजी ने भाष्य की परीक्षा तो न की किन्तु छल अवश्य किया है। सो भी पंडितजी ने इस वाक्य को तो लिखा परन्तु उसके अभिप्राय को यथार्थ नहीं जाना। क्योंकि इस का अभिप्राय यह है कि सब कर्मकाण्ड के अग्निहोत्रादि अश्वमेध पर्य्यन्त होम क्रिया में अग्नि मन्त्र प्रथम और विष्णु मन्त्र का पश्चात् उच्चारण करते हैं। जहाँ कहीं व्यावहारिक ३३ देव गिनाये हैं, वहाँ भी अग्नि का प्रथम और विष्णु का अन्त में ग्रहण किया है। सो एतरेय ब्राह्मण के पं॰ १, अ॰ २, क॰ १० में लिखा है कि ‘त्रयसि्ंत्रशद् वै देवा अष्टौ वसवः’ इत्यादि।

तथा शतपथ ब्राह्मण में भी इसी बात की व्याख्या वेदभाष्य की भूमिका के अङ्क ३ के पृष्ठ ५९ की पंक्ति ३१ में देवता शब्द से किस किस को किस किस गुण से ग्रहण करना लिखा है, वहाँ देख लेना। तथा उसी अङ्क ३ के पृष्ठ ६६ पंक्ति ७ में अग्नि से आरम्भ करके प्रजापति यज्ञ अर्थात् विष्णु में गिनती पूर्ण कर दी है। इसलिये ‘अग्निर्वै॰’ इस वचन में अग्नि को प्रथम और विष्णु को अन्त में गिना है। सो पूर्व लिखित ग्रन्थ में देखने से सब शंका निवारण हो जायगी। तथा उक्त साहब लोगों और पंडितजी की यह भी शंका निवृत्त हो जावेगी कि वेदों में एक के सिवाय दूसरा ईश्वर कोई भी नहीं है, किन्तु जिस जिस हेतु से जिस जिस पदार्थ का नाम देव धरा है, उस उस को वहाँ अर्थात् अङ्क ३ में देख लेना।

और डाक्टर एम॰ [हाग] साहब की अशुद्ध टीका का जो हवाला देते हैं, तो यह पंडितजी को एक लज्जा की बात है कि प्राचीन सत्य संस्कृत ग्रन्थों को छोड़ कर इधर उधर कस्तूरिये हिरन के समान भूलते और भटकते हैं। डाक्टर एम॰ [हाग] साहब वा सी॰ एच॰ टानी साहब वा आर॰ ग्रिफिथ साहब आदि कुछ ईश्वर नहीं कि जो कुछ वे लिख चुके, वह विना परीक्षा वा विचार के मान लेने योग्य ठहरे। क्या डाक्टर एम॰ हाग साहब हमारे आर्य्य ऋषि मुनियों से बढ़कर हैं, कि जिन को हम सर्वोपरि मान निश्चय कर लें, और प्राचीन सत्य ग्रन्थों को छोड़ देवें, जैसा कि पंडितजी ने किया है। जो उन्होंने ऐसा किया तो किया करो, मेरी दृष्टि में तो वे जो कुछ हैं सो ही हैं।

तथा इस कण्डिका में भी ‘यज्ञस्यान्ते’ वचन में आदि में अग्निमन्त्र और अन्त में विष्णुमन्त्र का प्रयोग किया जाता है, फिर इन दोनों के बीच में व्यवहार के सब मन्त्र देवते गिने हैं, अग्नि को प्रथम [इस कारण माना है कि] जिन जिन द्रव्यों का वायु और वृष्टि जल की शुद्धि के लिये अग्नि में होम किया जाता है, वे सब परमाणुरूप होकर विष्णु अर्थात् सूर्य्य के आकर्षण से वायु द्वारा आकाश में चढ़ जाते हैं। फिर मेघमण्डल में जलवृष्टि के साथ उतर कर बाकी जो बीच में ३० देव गिना दिये हैं, उन सभों को लाभ पहुँचाते हैं। इस अभिप्राय को पंडितजी नहीं समझते हैं।

पं॰ महेश॰—अब ऊपर के वचन से साफ जाना जा सकता है कि वेद में एक परमेश्वर की पूजा नहीं, किन्तु निस्सन्देह देवता विधान पाया जाता है। और उन देवताओं को बलिदान आदि पदार्थों का भेंट करना लिखा हुआ है। इस वाक्य में यह बात सिद्ध नहीं हो सकती कि अग्नि शब्द का अर्थ ईश्वर है, किन्तु उस में ईश्वर का जिकर भी नहीं है। इस बात की साबूती में स्वामीजी एक प्रमाण देते हैं—‘यत्रोपास्यत्वेन॰’ अर्थात् जहाँ सब देवों का पूजन कहा है, वहाँ परमेश्वर को समझना चाहिए। फिर इस की पुष्टि में स्वामीजी मनु का प्रमाण देते हैं, ‘आत्मैव देवताः सर्वाः०’ अर्थात् आत्मा सब देव है, और आत्मा ही में संसार स्थित है। यह नहीं समझ सकते कि यह वचन स्वामीजी के मन प्रसन्न प्रमाण की पुष्टता कैसे कर सकता है।

स्वामीजी—ऊपर के वचनों से ईश्वर का नाम अग्नि सिद्ध कर दिया है। परन्तु पक्षपात छोड़ के विद्या की आँख से देखने को स्पष्ट मालूम होता है कि निस्सन्देह अग्नि ईश्वर का भी नाम है। वेदों में अनेक ईश्वर का विधान कहीं नहीं है। और जो देवता शब्द से सृष्टि के भी पदार्थों का विधान है, उस का उत्तर ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ के अङ्क ३ के ‘देवता विधान प्रकरण’ को देखने से अच्छे प्रकार जान लेना। अर्थात् जिस जिस गुण और अभिप्राय से सृष्टि के पदार्थों का नाम देवता रक्खा गया है, उस को देख लेना चाहिए। क्योंकि वहाँ यह बात अनेक प्रमाणों से सिद्ध कर दी है। परन्तु चारों वेदों में एक से दूसरा ईश्वर कहीं नहीं माना है। और न ईश्वर के तुल्य पूजना कहा है, किन्तु उन की दिव्यगुणों से व्यवहारमात्र में ‘देवता’ संज्ञा मानी है। चारों वेदों में एक से दूसरा ईश्वर कहीं प्रतिपादन नहीं किया है। तथा इन्द्र, अग्नि और प्रजापति आदि शब्दों से ईश्वर और भौतिक दोनों का प्रतिपादन किया है।

और जो पंडितजी लिखते हैं—‘अग्नि शब्द का अर्थ ईश्वर नहीं है, किन्तु उस स्थान में जिकर भी नहीं। इस का उत्तर यह है कि इस में वेद, वेदान्त, ब्राह्मण तथा मेरा दोष नहीं, किन्तु इसमें पंडितजी के शास्त्रों में न्यून अभ्यास का दोष है। क्योंकि जो मनुष्य वेदादि शास्त्रों का यथार्थ अर्थ न समझा होगा, उस के उलटे ज्ञान हो जाने का सम्भव है। वेदों में एक ईश्वर के प्रतिपादन में भूमिका अङ्क ४ में ८८ के पृष्ठ से ९२ तक ‘ब्रह्मविद्याप्रकरण’ की समाप्ति पर्य्यन्त देखना चाहिए।

‘आत्मैव देवताः सर्वाः०’ इस का अभिप्राय पंडितजी ने ठीक ठीक नहीं समझा है। क्योंकि इस का मतलब यह है कि आत्मा अर्थात् परमेश्वर ही अग्नि आदि सब व्यवहार के देवताओं का रचन, पालन और विनाश करने वाला है। तथा ‘अग्निर्देवताः०’ इत्यादि प्रकरण में व्यवहार के देवता और अग्नि आदि नामों से परमेश्वर का भी ग्रहण है। क्योंकि ‘सर्वमात्मन्यवस्थितम्’ इस वचन से सिद्ध होता है कि सब जगत् का आत्मा जो परमेश्वर है सो उसी में स्थिर है, और वही सब में व्यापक है। इस अभिप्राय से यह बात तो सिद्ध है ही कि अग्नि परमेश्वर का भी नाम है। इस से मेरा कहना यथार्थ पुष्टि रखता है।

पं॰ महेश॰—ऐतरेय ब्राह्मण के प्रमाण से अग्नि और विष्णु दो ही देव मुख्य करके पूजनीय माने हैं। क्योंकि वे ही यज्ञ में आदि अन्त के देव हैं, जिन के द्वारा सब बीच वालों को भाग पहुँचता है। इसलिये इन्हीं दोनों की सब देवों के तुल्य स्तुति की गई है। इस में स्वामीजी ऐतरेय ब्राह्मण का जो प्रमाण देते हैं, सो उन के कथन की पुष्टि तो नहीं करता किन्तु विरुद्ध पड़ता है।

स्वामीजी—अब जो पंडितजी ‘अग्निर्वै सर्वा देवताः’ इस में भ्रान्त हुए हैं, सो ठीक नहीं। और जो ‘अग्निर्वै देवानामवमो विष्णुः परमस्तदन्तरेण सर्वा अन्या देवताः॥’ इत्यादि ऐतरेय ब्राह्मण का प्रमाण धरा है, इस का अर्थ ठीक ठीक पंडितजी नहीं समझे हैं। इस का अभिप्राय यह है कि ‘अग्निर्वै सर्वा देवताः’ ‘विष्णुः सर्वा देवताः’ इस का भी मनु के प्रमाण समान अर्थ होने से मेरे अभिप्राय की पुष्टि करता है। और जहाँ भौतिक वा मन्त्र ही देवता लिये गये हैं, वहाँ पुरोडाश आदि करने की क्रिया द्रव्य-यज्ञ में संघटित यथावत् की गई हैं। क्योंकि जब प्रथम अग्नि में होम किया जाता है और उस से द्रव्यों के रस और जल आदि के परमाणु पृथक् पृथक् हो जाते हैं, तब वे हलके होके सूर्य्य के आकर्षण से वायु के साथ मेघमण्डल में जाके रहते हैं। फिर वे ही मेघाकार संयुक्त होकर वृष्टि द्वारा पृथ्वी आदि मध्यस्थ देवसंज्ञक व्यवहार के पदार्थों को पुष्ट करते हैं। इस का नाम ‘भाग’ और ‘बलिदान’ है। तथा इसी कारण अग्नि को प्रथम और सूर्य को अन्त में माना है। ऐसे ही अग्नि को सूक्ष्म और सूर्यलोक को अग्नि का बड़ा पुंज समझा है। इत्यादि अभिप्राय से यह पंक्ति ऐतरेय ब्राह्मण में लिखी है, जिस को पंडितजी ने न जान कर मेरे लेख पर विरुद्ध सम्मति दी है।

पं॰ महेश॰—निरुक्त भी कुछेक ही साक्षी देता है। स्वामीजी ‘अग्निः कस्मादग्रणीर्भवति॰’ इत्यादि निरुक्त का प्रमाण धरते हैं, कि जिस में अग्नि शब्द की साधना की गई है। कई धात्वर्थ केवल भौतिक अग्नि के वाची हैं। और स्वामीजी भी इस बात को मानते हैं, और कहते हैं कि सिवाय भौतिक के अग्नि शब्द से ईश्वर का भी ग्रहण होता है। और यह अर्थ ‘अग्रणीः’ शब्द से लेते हैं। जैसा कि निरुक्तकार समझता है कि अग्नि शब्द ‘अग्र-नी’ से मिल कर बना है। निरुक्तकार इस शब्द के कुछ विशेष अर्थ नहीं करता है। शतपथ ब्राह्मण जिस को स्वामीजी मानते हैं विशेष अर्थ बताता है परन्तु ईश्वर के नहीं। यद्यपि वे कुछ कहते हैं, लेकिन सिवाय भौतिक के दूसरा अर्थ नहीं हो सकता।

स्वामीजी—अब जो पंडितजी लिखते हैं कि निरुक्तकार भी कुछेक ही सम्मति देता है, सो नहीं। क्योंकि निरुक्त में ‘अग्नि’ शब्द से ‘परमेश्वर’ और भौतिक दोनों अर्थों का यथावत् ग्रहण किया है। तथा उस में अग्नि शब्द का साधुत्व तो कुछ भी नहीं लिखा है, किन्तु धात्वर्थ के निर्देश से अर्थप्रतीति कराई है। क्योंकि शब्दों का साधुत्व व्याकरण का ही विषय है, निरुक्त का नहीं। इसलिये उस में रूढ़ि, यौगिक और योगरूढ़ि शब्दों का निरूपण मुख्य करके किया गया। जैसे कि ‘इतात्, अक्तात्, दग्धात् वा नीतात्’ इन में ‘इण्’ धातु गत्यर्थक, ‘अञ्जू’ व्यक्ताद्यर्थ, ‘दह’ भस्मीकरणार्थ, ‘णीञ्’ प्रापणार्थ दिखाने से विद्वानों को ऐसा भ्रम कभी नहीं हो सकता है कि अग्नि शब्द से परमेश्वर और भौतिक दोनों का ग्रहण नहीं है। क्योंकि ‘इण्’ और ‘अञ्जू’ इन धातुओं के गत्यर्थ होने से ज्ञान, गमन, प्राप्ति, ये तीनों अर्थ लिये जाते हैं। इन में ज्ञान और प्राप्त्यर्थ से परमेश्वर तथा गमन और प्राप्त्यर्थ से भौतिक पदार्थ ये दोनों ही लिये जाते हैं।

और ‘अग्रणी’ शब्द तथा ‘अग्रं यज्ञेषु प्रणीयते, अङ्गं नयति।’ इसके अभिप्राय से अग्नि शब्द परमेश्वर और ‘न क्नोपयति न स्नेहयति’ इस से भौतिक पदार्थ में लिया जाता है। यह निरुक्त का अभिप्रायार्थ है, मन्त्रभाष्य के दूसरे पृष्ठ में ठीक ठीक लिख दिया गया है। जो उस को पंडितजी यथार्थ विचारते तो इस वेदभाष्य पर ऐसी विरुद्ध सम्मति कभी न देते। क्योंकि निरुक्तकार ने पूर्वोक्त प्रकार से दोनों अर्थ का विशेष अच्छी तरह दिखला रक्खा है। परन्तु जो कोई किसी के लेख का अर्थ यथावत् नहीं समझते, उन को उस के विशेष वा सामान्य अर्थ का ज्ञान कभी नहीं हो सकता।

पं॰ महेश॰—‘प्रजापतिर्ह वा इदमग्र॰’ हमारी मुराद यह नहीं है कि हम शतपथ ब्राह्मण में अग्नि शब्द का भौतिक का वाची ढूँढें, किन्तु मैं यह बताता हूँ कि पूर्वोक्त वाक्य से निश्चय होता है कि अग्नि सिवाय आग के दूसरा अर्थ नहीं देती है।

स्वामीजी—पंडितजी का कथन है कि हमारी मुराद यह नहीं है कि हम शतपथ ब्राह्मण में अग्नि भौतिक का वाची ढूँढें इत्यादि। इसका उत्तर यह है कि मैं पूर्वोक्त प्रकार से अग्नि शब्द से परमेश्वर और भौतिक दोनों अर्थों को लेता हूँ, सो वेदादि शास्त्रों के प्रमाण से निर्भ्रमता के साथ सिद्ध है। परन्तु पंडितजी का अभिप्राय जो अग्नि शब्द से परमेश्वर के ग्रहण में विरुद्ध है, उस का हेतु यह मालूम पड़ता है कि पंडितजी बाल्यावस्था से लेकर आज पर्य्यन्त अग्नि शब्द से भौतिक अर्थात् चूल्हे आदि में जलने वाली ही अग्नि को सुनते और देखते आये हैं, इसलिये वहीं तक उन की दौड़ है।

परन्तु मैं उन से मित्र भाव से कहता हूँ कि वेद, वेदाङ्ग और ब्राह्मण आदि सनातन आर्षग्रन्थों के अर्थ जानने में अधिक पुरुषार्थ करें कि जिस से ऐसी ऐसी तुच्छ शंका हृदय में उत्पन्न न हो। क्योंकि जो जो शतपथ के प्रमाण मैंने वेदभाष्य में अग्नि शब्द से परमेश्वर के ग्रहण विषय में धरे हैं, वे क्या शतपथ के नहीं हैं? जो शंका हो तो उक्त जगह पुस्तक में देख लेवें।

और जिस वाक्य की पंक्ति का प्रमाण पंडितजी ने धरा है उस में मुख्य पाठ उन्होंने पहले ही उड़ा दिया। इस चालाकी को देखना चाहिये कि—‘तद्यदेनं मुखादजनयत्तस्मादन्नादोऽग्निः स यो हैवमेतमग्निमन्नादं वेदान्नादो हैव भवति॥’ इस में ‘अन्नाद’ शब्द अग्नि का वाची है। ‘अहमन्नमहमन्नमहमन्नम्। अहमन्नादो अहमन्नादो अहमन्नादः॥’ यह तैत्तिरीय उपनिषद् का वचन परमेश्वर के विषय में है। अर्थात् वह उपदेश करता है कि मैं ही अन्नाद हूँ। और ‘अन्नाद’ अग्नि को कहते हैं, इस से यहाँ भी परमेश्वर का नाम अग्नि आता है।

और दूसरी चाल पंडितजी यह भी खेले हैं कि जिस आधी पंक्ति से शतपथ में अग्नि शब्द से परमेश्वर लिया है, उस पाठ को अपने पुस्तक में नहीं लिखा। देखिये कि—

“प्रजापतिः परमेश्वरः यत् यस्मात् मुख्यात् प्रकाशमयान्-मुख्यात्कारणात् एनं भौतिकमग्निजनयत्तस्मात्स परमेश्वरोन्नादोऽग्नि-रर्थादग्निसंज्ञो विज्ञेयः। यो मनुष्यो ह इति निश्चये नैवममुना प्रकारेणै-तमन्नादं परमेश्वरमग्निं वेद जानाति ह इति प्रसिद्धे स एवान्नादो भवत्यर्थाद् ब्रह्मविद्भवतीति॥”

इस प्रकार से यह बात निश्चय होती है कि पंडितजी उन ग्रन्थों का अर्थ ठीक ठीक नहीं जानते। और जितना जानते हैं उस में भी कपट और आग्रह से सत्य नहीं लिखते। पंडितजी को विदित हो कि यहाँ पाठशालाओं के लड़कों से प्रश्नोत्तर लेख वा उन की परीक्षा नहीं है। इस से जो कुछ वे लिखें सो विचारपूर्वक होना चाहिये कि उनको किसी की खुशामद वा आग्रह से लिखना उचित नहीं। जो जो शतपथ के प्रमाण मैंने वहाँ वहाँ लिखे हैं, उस का अर्थ भी संक्षेप से लिख दिया है, उन को ध्यान देकर देख लेवें।

पं॰ महेश॰—‘अग्निः पृथिवीस्थानस्तं प्रथमं व्याख्यास्यामः॥’ पृथिवी का अग्नि ईश्वर अर्थ में कभी नहीं लिया जा सकता है। इस बात को अच्छी तरह प्रकाश करने के लिये कि निरुक्तकार अग्नि शब्द के क्या अर्थ लेता है!

स्वामीजी—फिर जो पंडितजी ने ‘अग्निः पृथ्वीस्थानस्तं प्रथमं व्याख्यास्यामः’ इस में अपना अभिप्राय जाताया है कि क्या पृथिवी का अग्नि ईश्वर अर्थ में कभी लिया जा सकता है, इस में पंडितजी से मैं पूछता हूँ कि क्या आप अन्तरिक्ष और सूर्य्यादि लोकस्थ अग्नि ईश्वर अर्थ में ग्रहण करते हैं, तथा क्या परमेश्वर के व्यापक होने से पृथिवीस्थान नहीं हो सकता।

और उन को विचारना चाहिए कि ‘पृथिवीस्थानं यस्य सः परमेश्वरो ह्यग्निर्भौतिकश्चेत्यर्थद्वयं गृह्यताम्।’ इस वचन के अर्थ पर उन का अभिप्राय ठीक नहीं सिद्ध होता, क्योंकि इस बात को कौन सिद्ध कर सकता है कि पृथिवी से भिन्न अन्य पदार्थ में भौतिक अग्नि नहीं है, जब कि यहाँ पृथिवी अर्थात् सब सृष्टि भर ली जाती है। तथा कार्य्य और कारणरूप को भी पृथिवी शब्द से लेते हैं। फिर इन का अभिप्राय इस बात में शुद्ध कभी नहीं हो सकता। क्योंकि रूप गुण वाला पदार्थ अग्नि शब्द से गृहीत होता है, और न केवल चूल्हे वा वेदि में धरा हुआ।

तथा पृथिवी—स्थान शब्द के होने से अग्नि शब्द से ग्रहण परमेश्वर अर्थ में भी यथावत् होता है। जैसे—

“यः पृथिव्यां तिष्ठन् अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवीशरीरं पृथिवीमन्तरो यमयति स त आत्मा अन्तर्य्याम्यमृतः॥”

वह वचन शत॰ कां॰ १४ अ॰ ६ ब्रा॰ ५ कण्डिका ७ का है, कि जिस में पृथिवीस्थान शब्द से परमेश्वर का ग्रहण किया है। क्योंकि जहाँ कहीं अन्तर्यामी शब्द से परमेश्वर की विवक्षा होती है, वहाँ एक जीव के हृदय की अपेक्षा से भी परमेश्वर का ग्रहण होता है। जैसे—“स त आत्माऽन्तर्य्याम्यमृतः॥” अर्थात् गौतम ऋषि से याज्ञवल्क्य कहते हैं कि हे गोतमजी! जो पृथिवी में ठहर रहा है और उस से पृथक् भी है, तथा जिस को पृथिवी नहीं जानती, जिस के शरीर के समान पृथिवी है; जो पृथिवी में व्यापक होकर उस को नियम में रखता है, वही परमेश्वर अमृत अर्थात् नित्यस्वरूप तेरा जीवात्मा का अन्तर्य्यामी आत्मा है।

इतने ही से बुद्धिमान् समझ लेंगे कि पण्डितजी निरुक्त का अभिप्राय कैसा जानते हैं?

पं॰ महेश॰—तथा देवता विषय में उस का कैसा विचार था, आगे के प्रमाण अङ्गरेजी टीका सहित लिखते हैं—“यत्कामऋर्षिर्यस्यां॰” जिस मन्त्र से जिस देवता की स्तुति की जाती है, वही उस मन्त्र का देवता है। “माहाभाग्याद्देवतायाः०” अर्थात् देवता एक ही है परन्तु उस में बहुत-सी शक्ति होने के कारण अनेक रूपों में पूजा जाता है, उस के सिवाय और और देव उस के अङ्ग हैं। प्राचीन अनुक्रमणिकाकार भिन्न-भिन्न मन्त्रों के पृथक् पृथक् देवता विभाग करता है। और इस का प्रमाण स्वामीजी ने माना है। देखो पृष्ठ १ पं॰ २ तथा पृ॰ २३ पं॰ १४ इसी विषय की।

परन्तु बात काट के उस के असली अर्थ के विरुद्ध कहते हैं कि सब मन्त्रों का देवता परमेश्वर है, अग्नि वायु आदि नहीं। यह हिन्दुओं का बड़ा सत्यानुसार धर्म है कि अनेक देवते एक ईश्वर ही के प्रकाशरूप हैं। इस बात का प्रमाण मैत्र्युपनिषद् में लिखा है कि जिस को स्वामीजी भी मानते हैं। जैसेः—“निहितमस्माभिरेतद्यथावदुक्तं मनसीत्यथोत्तरप्रश्न-मनुब्रूहीति॰ इत्यादि॥ ४। ५॥”

स्वामीजी—“यत्काम ऋषिर्यस्यां देवतायामार्थपत्यमिच्छन् स्तुतिं प्रयुङ्क्ते तद्दैवतः स मन्त्रो भवति॥” इस का उत्तर भूमिका अङ्क ३ के देवता विषय में देख लेना। वहाँ अभिप्राय सहित लिख दिया है। अर्थात् प्रकारान्तर से व्यवहार के पदार्थों की भी देवसंज्ञा मानी है, पूज्योपास्य बुद्धि से नहीं।

अब प्राचीन अनुक्रमणिकाकार जो भिन्न भिन्न देवता मानता है, सो भी इस अभिप्राय से है कि इस मन्त्र का अग्निदेवता इत्यादि लेख से कुछ आपकी बात की पुष्टि नहीं होती। क्योंकि वहाँ केवल नाममात्र का प्रकाश है विशेष अर्थ का नहीं। वैसे ही अग्नि शब्द के पूर्वोक्त प्रकार से घटित दोनों अर्थ लिये जाते हैं। तथा सभी मन्त्रों का देवता परमेश्वर इस अभिप्राय से है कि सब देवों का देव पूजनीय और उपासना योग्य एक अद्वितीय ईश्वर ही है। सो यथावत् देवता प्रकरण में लिख दिया है, वहाँ देख लेना, कि व्यावहारिक अग्नि वायु को देवता किस लिये और परमेश्वर किस प्रकार माना जाता है।

ऐसे ही सब जगत् को ब्रह्म मानना तथा ब्रह्म को जगत्रूप समझना, यह हिन्दुओं की बात होगी, आर्यों की नहीं। हम लोग आर्य्यावर्त्तवासी ब्राह्मणादि वर्ण और ब्रह्मचर्य्यादि आश्रमस्थ ब्रह्मा से लेकर आज पर्य्यन्त अज अनादिस्वरूप को वेदरीति से ऐसा मानते चले आये हैं कि वह शुद्ध सनातन निर्विकार अज अनादिस्वरूप जगत् के कारण से कार्यरूप जगत् का रचन पालन और विनाश करने वाला है। और हिन्दू उस को कहते हैं कि जो वेदोक्त सत्य मार्ग के विरुद्ध चले। इस में पंडितजी ने जो मैत्र्युपनिषद् का प्रमाण धरा है सो भी विना अर्थ जाने हुए लिखा है। क्योंकि वहाँ ब्रह्म की उपासना का प्रकरण है। तद्यथा—

“यस्तपसाऽपहतपाप्मा ओं ब्रह्मणो महिमेत्येवैतदाह। यः सुयुक्तोऽजस्रं चिन्तयति तस्माद्विद्यया तपसा चिन्तया चोपलभ्यत ब्रह्म। स ब्रह्मणः पर एता अधिदैवत्वं देवेभ्यश्चेत्यपक्षय्यमपरिमितमनामयं सुखमश्नुते य एवं विद्वाननेन त्रिकेण ब्रह्मोपास्ते॥” (मैत्र्युपनिषद् ४.४)

जो पंडितजी इस प्रकरण का अर्थ ठीक ठीक समझ लेते, तो परमेश्वर का नाम अग्नि नहीं, ऐसा कभी न कह सकते। क्योंकि उसी ब्रह्म के अग्नि आदि नाम यहाँ भी हैं। और ब्रह्म की तनू अर्थात् व्याप्त स्थान “शतपथ ब्राह्मण” में अन्तर्यामी पृथिवी से लेकर जीवात्मा पर्य्यन्त २४ अर्थात् अन्वय और व्यतिरेकालङ्कार से शरीर-शरीरी अर्थात् व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध परमेश्वर का जगत् के साथ दिखलाया है सो देख लेना।

उसी शतपथ में पाँचवें ब्राह्मण की ३१ कण्डिका में—“अदृष्टो द्रष्टाऽश्रुतः श्रोताऽमतो मन्ताऽविज्ञातो विज्ञाता नान्योस्ति द्रष्टेत्यादि।” व्याप्यव्यापक सम्बन्ध पूर्वोंक्त अलङ्कार से यथावत् दिखला दिया है। इस से—

“ब्रह्म खल्विदं वाव सर्वम्” इस का अर्थ इस प्रकार से है कि ब्रह्म केवल एक चेतनामात्र तत्त्व है। जैसे किसी ने किसी से कहा कि ‘यह सुवर्ण खरा है’, तो इस वाक्य का अभिप्राय यह है कि इस सुवर्ण में दूसरे धातु का मेल नहीं। इसी प्रकार जैसे कार्य्यजगत् के संघातों में अनेक तत्त्वों का मेल है, वैसे ब्रह्म नहीं। किन्तु वह भिन्न वस्तु है। तथा तात्स्थ्योपाधि से यह सब जगत् ब्रह्म अर्थात् ब्रह्मस्थ है और ब्रह्म सर्व विश्वस्थ भी है। यह इस वचन का ठीक अर्थ है। क्योंकि फिर इसी के आगे यह पाठ है किः—

“या वास्याग्य्राास्तन्वस्ता अभिध्यायेदर्चयेन्निह्नुयाच्चातस्ताभिः स हैवोपर्य्युपरि लोकेषु चात्यथ कृत्स्नक्षय एकत्वमेति पुरुषस्य पुरुषस्य॥”

अर्थात् जो विद्वान् पुरुष अपने आत्मा में ब्रह्म की उपासना ध्यान और उस की अर्च्चा कर अपने हृदय के सब दोषों को अलग करता, इस के उपरान्त जब अपने अन्तःकरण से शुद्ध होकर मुक्ति पा चुकता है, तब वह उन्हीं पूर्वोक्त तनुओं के सहित उपरि सब लोकों के बीचों बीच रहता हुआ, अन्त में परमेश्वर की सत्तामात्र को प्राप्त हो जाता है। सब मुक्त पुरुषों के समीप रहता हुआ अकथनीय परम आनन्द में किलोल करता है।

इस के आगे भी ‘मैत्र्युपनिषद्’ के पञ्चम प्रपाठक के आरम्भ में कौत्सायिनी स्तुति के अनुसार भी “त्वं ब्रह्मा त्वं च वै विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वं प्रजापतिरग्निः” इत्यादि प्रमाण से अग्न्यादि परमेश्वर के नाम यथावत् हैं। इस से यह बात पाई गई कि यद्यपि पंडितजी प्रोफेसर ग्रिफिथ, टानी साहब के वकील भी हुए, तथापि मुकद्दमा में खारिज होने के योग्य हैं। तथा यह भी जान पड़ा कि वेदभाष्य पर विरुद्ध सम्मति देने वाले वेदादि शास्त्रों का ज्ञान कम रखते हैं।

पं॰ महेश॰—“तिस्र एव देवता इति नैरुक्ताः॥” जो लोग निरुक्त के समझने वाले हैं, वे कहते हैं कि देवता तीन ही हैं। अग्नि, वायु और सूर्य। इन देवताओं का बल बहुत और काम पृथक् पृथक् होने से उन को कई नामों से बोलते हैं।

“अथाकारचिन्तनं देवतानां पुरुषविधाः स्युरित्येके चेतनावद्व- वद्धि स्तुतयो भवन्ति तथाभिधानानि। अथापि पौरुषविधिकैरङ्गैः संस्तूयन्ते॥”

कितने ही देवते मनुष्यों के समान हैं। अर्थात् वे मनुष्यों के तुल्य घोड़े आदि की सवारी और खाना पीना सुनना बोलना आदि काम करते हैं। कुछ देवते ऐसे हैं कि मनुष्यों के तुल्य नहीं, परन्तु दृष्टि में आते हैं जैसे अग्नि, वायु, आदित्य, पृथिवी और चन्द्रमा। तथा कितने ही चेतन नहीं हैं जैसे र्सिां॑, वनस्पति आदि।

हम कह चुके हैं कि देवता तीन हैं—अग्नि, वायु और सूर्य, जिन के गुणों की व्याख्या कर दी है। अब अग्नि के गुण बताते हैं, अर्थात् वह देवताओं के पास चढ़ावा पहुँचाता है। तथा उन को यज्ञ में बुलाता है, ये अग्नि के प्रत्यक्ष काम हैं।

“अग्निः पृथिवीस्थानस्तं प्रथमं व्याख्यास्यामः॥”

जो अग्नि पृथिवी पर रहता है, प्रथम हम उसी का वर्णन करते हैं। इस का अग्नि नाम क्यों हुआ, क्योंकि वह प्रथम ही आता है, देखो ‘अग्निमीळे’ इत्यादि।

इन प्रमाणों से सिद्ध होता है कि निरुक्तकार अग्नि शब्द से सिवाय भौतिक के दूसरी चीज नहीं समझा है। यह ब्राह्मण और निरुक्त से स्वामीजी का कथन ठीक नहीं। श्रौत सूत्र जो वेद की प्राचीन व्याख्या है, यद्यपि स्वामीजी ने उस का कोई प्रमाण नहीं दिया, परन्तु मैं कुछ साक्षी के तौर पर प्रमाण देता हूँ—सू॰ २६। कण्डिका १। अ॰ तथा सू॰ ७। कं॰ १३। अ॰ ४ में देखने से साफ मालूम होता है कि ‘अग्निमीळे॰’ यह मन्त्र भौतिक अग्नि की पूजा विधान में लिखा गया है।

स्वामीजी—इसके आगे पण्डितजी “तिस्र एव देवता॰” इत्यादि निरुक्त का अभिप्राय लिखते हैं। सो उन्होंने इस का भी अर्थ ठीक ठीक नहीं जाना। क्योंकि इस प्रकरण में भी पूर्वोक्त प्रकार से दोनों व्यवस्था जानी जाती हैं। अर्थात् अग्नि आदि नामों से व्यवहारोपयुक्त पदार्थ और पारमार्थिक उपास्य परमेश्वर दोनों ही का यथावत् ग्रहण होता है। इस निरुक्त का अर्थ भूमिका के अङ्क ३ पृष्ठ ६० पंक्ति ८ वीं से अङ्क ४ पृष्ठ ७८ तक देखने से ठीक ठीक उत्तर मिल जायगा।

और इस के आकार चिन्तन से यह अभिप्राय है कि—जिस जिस पदार्थ में जो जो गुण होते हैं, उन का यथावत् प्रकाश करना ‘स्तुति’ कहाती है। सो जड़ और चेतन दोनों में यथावत् घटती है। इसी प्रकरण में “एकस्य सतोऽपि वा पृथगेव स्युः पृथगिव स्तुतयो भवन्ति तथाऽभिधानानि॥” इस पंक्ति का अर्थ पंडितजी ने न विचारा होगा, नहीं तो इतने आडम्बर का लेख क्यों करते। क्योंकि देखो—

“तासां माहाभाग्यादेकैकस्यापि बहूनि नामधेयानि भवन्ति॥”

इसका अभिप्राय यह है कि अग्न्यादि संसारी पदार्थों में भी ईश्वर की रचना से अनेक दिव्य गुण हैं कि जिनके प्रकाश के लिये वेदों में उन पदार्थों के अग्न्यादि कई कई नाम लिखे हैं। तथा वे ही नाम गुणानुसार एक अद्वितीय परमेश्वर के भी हैं। उन्हीं पृथक् पृथक् गुणयुक्त नामों से परमेश्वर की स्तुति होती है। तथा उसी के वेदों में सर्व सुखदायक स्वयं- प्रकाश सत्य-ज्ञान-प्रकाशक नाना प्रकार के व्याख्यान लिखे हैं।

इस प्रकार सब सज्जन लोगों को जान लेना चाहिये कि अग्न्यादि ना