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महर्षि दयानन्द व्याख्या : ॥ ओ३म्॥
अथ वल्लभादिमतस्थान् प्रति प्रश्नाः खण्डनं च
१—(प्रश्नः) कोऽयं वल्लभो नाम कश्चास्यार्थः?
१—(प्रश्न) वल्लभनामक पुरुष कौन है और इस शब्द का अर्थ क्या है?
२—(उत्तरम्) वल्लभोऽस्मदाचार्यः, प्रियत्वगुणविशिष्टोऽस्यार्थः।
२—(उत्तर) वल्लभ हमारा आचार्य्य है, इस वल्लभ शब्द का अर्थ प्रीति गुणयुक्त प्यारा है।
३—(प्रश्नः) किमाचार्यत्वं नाम, भवन्तश्च के?
३—(उत्तर) आचार्यपन क्या है, और आप कौन हैं?
४—(प्र॰) गुरुराचार्यः वयं वर्णाश्रमस्थाः।
४—(उत्तर) गुरु को आचार्य कहते हैं, और हम लोग वर्णाश्रमधर्मस्थ हैं।
५—(प्रश्नः) किं गुरुत्वमस्ति?
५—(प्रश्न) गुरुपन क्या वस्तु है?
६—(उत्तरम्) उपदेष्टृत्वमिति वदामः।
६—(उत्तर) उपदेश करना, इसको हम गुरुपन कहते हैं।
७—(प्रश्नः) स वल्लभो धर्मात्मनां विदुषां प्रियः, उताधर्मात्मनां मूर्खाणां च?
७—(प्रश्न) वह वल्लभनामी पुरुष धर्मात्मा विद्वानों को प्रिय है अथवा अधर्मी और मूर्खों को प्रिय है?
८—(उत्तरम्) नाद्यः, कुतो भवतां सर्वेषान्तु धर्माचरणविद्या-वत्त्वाभावात्, किन्तु कश्चित्तादृशोऽस्ति। न चरमोऽधर्मात्मनां मूर्खाणां तत्र प्रीत्या स एवाश्रेष्ठः स्यात्, स्वजातिपरत्वप्रवाहस्य विद्यमानत्वात्। अन्यच्च, सजीवान्प्रति सर्वेषां प्रीतेः सत्त्वान्मृतांश्च प्रति प्रीतेरभावान्नै-ष्फल्याच्च तत्र वल्लभवत्वमेव दुर्घटम्। मृतस्याचार्यत्वकरणासम्भवात्। “समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठङ्गुरुं समुपगच्छेद्” इति श्रुतेर्वर्त्तमाना-भिप्रायत्वात्।
उपनीय तु यश्शिष्यं वेदमध्यापयेद् द्विजः।
सकल्पं सरहस्यं च तमाचार्य्यम्प्रचक्षते॥ [मनु २.१४०]
इति मनुमतविरोधात्। मरणानन्तरमध्ययनाऽध्यापनयोरशक्यत्वात् शरीरमात्रसम्बन्धाभावाच्चेति युक्त्या तस्मिन्नाचार्य्यत्वमेवासङ्गतम्। तथा च मृतम्प्रति प्रीतिरशक्या निष्फला च। तत्र प्रियत्वगुणविशिष्टवचनत्व-मप्यसङ्गतं तस्य भ्रान्तिनिष्ठत्वात्।
८—(उत्तर) आद्यपक्ष अर्थात् धर्मात्मा विद्वानों को वह प्रिय नहीं हो सकता क्योंकि आप सब लोगों का धर्माचरण और विद्यावान् होना सम्भव नहीं, किन्तु कोई वैसा है। द्वितीयपक्ष इसलिये ठीक नहीं, कि वल्लभ मूर्खों को प्रिय हो तो उसमें मूर्खों की प्रीति होने से वह ही अश्रेष्ठ समझा जावे क्योंकि अपने-अपने सजातीय में प्रीति होने का प्रवाह प्रसिद्ध है, अर्थात् विद्वानों की विद्वानों में और मूर्खों की मूर्खों में प्रीति विशेष होती है। और भी देखो कि जीवतों में सबकी प्रीति होने, मरे हुओं में न होने, और मरों में प्रीति करना भी निष्फल होने उस पुरुष में ‘वल्लभत्व’ अर्थात् प्रियपन होना ही नहीं घट सकता, और मरे हुए को गुरु करना भी असम्भव है। श्रुति में लिखा है कि—“वेदवेत्ता ब्रह्मज्ञानी गुरु के पास हाथ में समिध लेके जावे।” इससे सिद्ध है कि मरे हुए के पास में समिध लेके जाना असम्भव है। और—“जो यज्ञोपवीत कराके कल्पसूत्र और वेदान्त सहित शिष्य को वेद पढ़ावे, उसको आचार्य कहते हैं”, इस मानवधर्मशास्त्र की सम्मति से भी वल्लभ का आचार्यत्व होना विरुद्ध है। मरने पश्चात् पढ़ना-पढ़ाना आदि जो आत्मधर्म हैं, वे नहीं हो सकते क्योंकि इन धर्मों का शरीरमात्र से सम्बन्ध नहीं है। इस प्रकार की युक्तियों से वल्लभ को आचार्य मानना ही असङ्गत है। इसी कारण मरे से प्रीति करना अशक्य और निष्फल है। और वल्लभ के भ्रान्तिग्रस्त होने से उसको प्रियत्व गुणयुक्त कहना भी असङ्गत है।
९—(प्रश्नः) किङ्गुरुत्वं, सत्योपदेष्टृत्वमाहोस्विदसत्योपदेष्टृत्वञ्च?
९—(प्रश्न) गुरुपन क्या वस्तु है? क्या सत्योपदेश करना वा असत्य उपदेश करना ही गुरुपन कहाता है?
१०—(उत्तरम्) नादिमः, कुतो भवत्सु श्रोत्रियब्रह्मनिष्ठत्वासत्त्वा-दस्ति चेन्न सङ्गच्छते, विषयसेवायां प्रीतेर्दर्शनात्। “अर्थकामेष्वसक्तानां धर्मज्ञानं विधीयते” [२.१३] इति मनुसाक्ष्यविरोधाद् भवतामर्थ-कामेष्वेवासक्तेः प्रत्यक्षत्वात्स्त्रीषु धनेषु चात्यन्तप्रीतेर्विद्यमानत्वात्, मरणसमयेऽपि स्वशिष्याणां वक्षःस्थलस्योपरि पादं स्थापयित्वा धनादीनां पदार्थानां संग्राहकत्वाद्यथा मृतकस्य शरीरस्य वस्त्राऽऽ-भूषणादीन् पदार्थान् कश्चिद् गृह्णाति भवतां तेन तुल्यत्वाच्च।
नान्त्यः, असत्योपदेशस्यानभिधानाद् द्वयोर्दुःखफलस्य प्रापक-त्वाच्च। स्वपुत्रादीन्प्रति पितुर्गुरुत्वाऽधिकारादन्यान्प्रति गुरुत्वाभिमाना-नभिधानाद् भवत्सु गुरुत्वस्य विरह एवेत्यवगन्तव्यम्।
निषेकादीनि कर्माणि यः करोति यथाविधि।
सम्भावयति चान्नेन स विप्रो गुरुरुच्यते॥ [२.१४२]
इति मनुसाक्ष्यविरोधादविवाहितस्त्रियां वीर्यनिषेकस्य पापफलत्वाच्चेति। भवन्तो वर्णाश्रमस्थाश्चेत्तर्हि वेदोक्तानि वर्णाश्रमस्थ-कर्त्तव्यानि कर्मार्र्णि कुतो न क्रियन्ते, क्रियन्ते चेन्मूर्तिपूजनं कण्ठी-धारणन्तिलकं समर्पणं वेदानुक्तमन्त्रोपदेशञ्च त्यजन्तु, नोचेद्वेदोक्त-धर्माचरणविरोधाद्भवन्तो वर्णाश्रमस्था एव नेति मन्तव्यम्।
१०—(उत्तर) प्रथम पक्ष अर्थात् सत्योपदेश करना रूप गुरुत्व नहीं घटता क्योंकि सत्योपदेष्टा गुरु तुम में इससे नहीं हो सकते कि आप लोगों में वेदवेत्ता और ब्रह्मज्ञानी जन नहीं हैं। यदि कहो कि हैं, तो तुम्हारा कहना असङ्गत है क्योंकि तुम लोगों की प्रीति विषयों की सेवा में प्रसिद्ध दीखती है। धर्मशास्त्र में कहा है कि—“अर्थ और काम में, जो आसक्त नहीं, उनके लिये धर्मज्ञान का विधान है।” इससे विरुद्ध आप लोगों की आसक्ति द्रव्य और कामचेष्टा ही में प्रसिद्ध है। स्त्रियों और धनों में तुम्हारी अत्यन्त प्रीति प्रत्यक्ष विद्यमान है, और मरण समय में भी अपने शिष्यों की छाती पर पैर रखकर धनादि पदार्थों का संग्रह करते हो और महाब्राह्मण वा चाण्डालादि के तुल्य मृतक के वस्त्र, आभूषणादि पदार्थों को लेते हो, इससे महाब्राह्मण के तुल्य हुए।
और द्वितीय पक्ष, असत्योपदेश करने से भी वल्लभ गुरु नहीं हो सकते, क्योंकि असत्योपदेश से गुरु मानना शास्त्रविरुद्ध, और दोनों गुरु शिष्य दुःखफलभागी होते हैं। अपने पुत्रों के प्रति गुरु होने का मुख्य अधिकार पिता को है। अन्य किसी का स्वयमेव गुरु बन बैठने का धर्मशास्त्र में विधान न होने से आप लोगों में गुरुत्व कदापि संघटित नहीं हो सकता। धर्मशास्त्र में कहा भी है—“जो विधिपूर्वक गर्भाधानादि कर्मों को करता और अन्नादि से पालन करता है, वह ब्राह्मण गुरु कहाता है”। इससे अन्य को गुरु मानना विरुद्ध है। और अविवाहित स्त्री में गर्भाधान करना पाप है, इससे मुख्य कर पिता ही गुरु हो सकता है। यदि आप लोग वर्णाश्रमधर्मस्थ अपने को मानते हैं तो वर्णाश्रम के कर्त्तव्य वेदोक्त कर्म क्यों नहीं करते? यदि करते हो तो पाषाणादि मूर्त्तिपूजन, कण्ठी बाँधना, तिलक लगाना, समर्पण करना और वेद में न कहे हुए मन्त्रों का उपदेश करना छोड़ देओ। यदि ऐसा नहीं करते तो वेदोक्त वर्णाश्रमधर्म के आचरण से विरुद्ध होने से आप लोग वर्णाश्रमधर्मस्थ नहीं हो सकते, यह निश्चय जानना चाहिये।
११—(प्रश्नः) भवन्तो गुरवः शिष्या मध्यस्था वा?
११—(प्रश्न) आप लोग गुरु, शिष्य वा मध्यस्थ हो?
१२—(उत्तरम्) गुरवश्चेदर्थज्ञानपूर्वकान् वेदान् पाठशालाङ्कृत्वा कुतो नाध्यापयन्ति? शिष्याश्चेत्कथं न पठन्ति? मध्यस्थाश्चेद् ब्राह्मणाचार्याभिमानो भवत्सु व्यर्थोऽस्तीत्यवगन्तव्यम्।
१२—(उत्तर) यदि गुरु हो, तो पाठशाला कर अर्थज्ञानपूर्वक वेदों को क्यों नहीं पढ़ाते? यदि शिष्य हो तो क्यों नहीं पढ़ते? यदि मध्यस्थ हो तो आप में ब्राह्मण और आचार्य होने का अभिमान व्यर्थ है, यह निश्चय जानना चाहिये।
१३—(प्रश्नः) भवन्तो वेदमतानुयायिनस्तद्विरोधिनो वा?
१३—(प्रश्न) आप लोग वेदमतानुयायी हो, वा वेदमत के विरोधी हो?
१४—(उत्तरम्) यदि वेदमतानुयायिनस्तर्हि वेदोक्तविरुद्धं स्व-कपोलकल्पितं वल्लभसम्प्रदायमन्यं वा किमर्थं मन्यते?, वेदविरोधि-नश्चेन्नास्तिकत्वं शूद्रत्वञ्च किमर्थं न स्वीक्रियते—“नास्तिको वेदनिन्दकः”।
योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम्।
स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वयः॥ [२.१६८]
इति मनुसाक्ष्यविरोधात्। पुनर्हि जन्ममरणवतो देहधारिणः कृष्णादीञ्जीवानीश्वरत्वेन किमर्थं व्यवहरन्ति? नो चेन्मन्दिरे जडमूर्ति-स्थापनङ्कृत्वा घण्टादिनादञ्चाज्ञानिनां मिथ्योपदेशव्याजेन धनादीन् पदार्थान् किमर्थमाहरन्ति?
१४४—(उत्तर) यदि वेदमतानुयायी हो, तो वेदविरुद्ध अपने कपोलकल्पित वल्लभ वा अन्य सम्प्रदाय को क्यों मानते हो? यदि वेदविरोधी हो, तो अपने को नास्तिक और शूद्रकक्षा में क्यों नहीं मानते? यही धर्मशास्त्र में लिखा है कि—“वेदनिन्दक ही नास्तिक होता है। और जो वेद को न पढ़के अन्य ग्रन्थों में परिश्रम करता है, वह अपने कुटुम्बसहित जीवते ही शूद्र हो जाता है”। इससे नास्तिक और शूद्रकक्षा के योग्य हो। फिर जन्मने-मरनेवाले श्रीकृष्णजी आदि देहधारी जीवों में ईश्वर के भाव का व्यवहार क्यों करते हो? कहो कि हम श्री कृष्णादि को ईश्वर नहीं मानते तो मन्दिरों में उनकी जडमूर्ति स्थापन और घण्टादि बजाकर उपदेश के छल से अज्ञानियों के धनादि पदार्थ क्यों हरते हो?
१५—(प्रश्नः) भवन्तः स्वस्मिन् कृष्णत्वं मन्यन्त उत मनुष्यत्वम्?
१५—(प्रश्न) आप लोग अपने में कृष्णपन की भावना करते हैं, वा मनुष्यपन की?
१६—(उत्तरम्) कृष्णत्वं मन्यन्ते चेद्यादवक्षत्रियाभिमानित्वं कुतो न स्वीक्रियते?, तादृशः पराक्रमो भवत्सु कुतो न दृश्यते? कृष्णस्तु परमपदं प्राप्तो भवन्तः कथञ्जीवनवन्तश्च?, मनुष्यत्वं चेत्तर्हि स्वोत्त-माभिमानस्त्यज्यताम्।
१६—(उत्तर) यदि अपने को कृष्ण मानते हो तो यादव क्षत्रियों के युद्धादि सब कामों को क्यों नहीं ग्रहण करते?, श्रीकृष्ण के सदृश पराक्रम आप लोगों में क्यों नहीं दीख पड़ता? श्रीकृष्णजी तो परमपद को प्राप्त हो गये आप लोग कैसे जीवते बने हो? और यदि अपने को मनुष्य मानते हो तो अपने को उत्तम मानने का अभिमान छोड़ देओ।
१७—(प्रश्नः) भवन्तो वैष्णवा उतान्ये, वैष्णवाश्चेत् कीदृगर्थो वैष्णवशब्दस्य स्वीक्रियते?
१७—(प्रश्न) आप लोग वैष्णव हो वा अन्य? यदि वैष्णव हो तो वैष्णव शब्द का अर्थ कैसा स्वीकार करते हो?
१८—(उत्तरम्) विष्णोरयं भक्तो वैष्णव इति वदाम इति चेन्नैवं शक्यं, तस्येदम्-इति सूत्रस्य सामान्यार्थे वर्त्तमानत्वाद्विष्णोरयमित्येता-वानर्थो ग्रहीतुं शक्यो विशेषार्थग्रहणस्य नियमाभावात्। यथा भवद्-भिर्भक्तशब्दो गृहीतस्तथा विष्णोरयं शत्रुः पुत्रः पिता प्रभावश्शिष्यो गुरुश्चेत्यादयोऽर्था अन्येनापि ग्रहीतुं शक्या अतो भवत्कृतोऽर्थोनुचितः।
१८—(उत्तर) यदि कहते हो कि विष्णु का भक्त वैष्णव है तो ठीक नहीं क्योंकि व्याकरण के ‘तस्येदम्’ [अष्टाध्यायी ४.३.११९] इस सूत्र से विष्णु का सम्बन्धीरूप सामान्य अर्थ ग्रहण होता है, भक्ति विशेष रूप अर्थ लेने में कोई नियम नहीं। जैसे आप लोगों ने विष्णु का सम्बन्धी भक्तरूप अर्थ का ग्रहण किया, वैसे कोई विष्णु शब्द के शत्रु, पुत्र, पिता, प्रभाव, शिष्य, गुरु आदि अर्थों का ग्रहण कर शत्रु आदि को भी वैष्णव कह सकता है। इसलिये आप लोगों का कल्पित अर्थ ठीक नहीं हो सकता।
१९—(प्रश्नः) भवद्भिर्विष्णुः कीदृशो गृहीतः?
१९—(प्रश्न) आप लोगों ने विष्णु को किस प्रकर का समझा है?
२०—(उत्तरम्) गोलोकवैकुण्ठवासी चतुर्भुजो द्विभुजो लक्ष्मी-पतिर्देहधारीत्यादिर्वेति वदाम इति चेद् व्यापकत्वं त्यज्यताम्। चतुर्भुजा-दिकं मन्यते चेत् सावयवत्वमनित्यत्वञ्च स्वीक्रियतामीश्वरत्वञ्च त्यज्यताम्। कुतः, संयोगमन्तरा सावयवत्वमेव न सिद्ध्यति। संयोग-श्चानित्यस्तस्माद्भिन्न एवेश्वर इति स्वीकारे मङ्गलं नान्यथा। ईश्वरस्य सावयवत्वग्रहणं वेदविरुद्धमेव—“स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रण-मस्नाविरꣳ शुद्धमपापविद्धम्” [यजु॰ ४०.८] इत्यादिश्रुतिविरोधात्।
२०—(उत्तर) यदि गोलोक वैकुण्ठ का निवासी, चतुर्भुज, द्विभुज, लक्ष्मी का पति, देहधारी कहते हो, तो व्यापक होना छोड़ो। यदि चतुर्भुजादि आकृतिवाला मानते हो तो सावयव, उत्पत्ति धर्मवाला, अनित्य मानो और उसमें ईश्वरत्व छोड़ो। क्योंकि संयोग के विना सावयव होना नहीं सिद्ध होता। और संयोग अनित्य है, इससे संयोग-वियोग वाले से भिन्न को ईश्वर मानने में ही कल्याण है, अन्यथा नहीं। और ईश्वर को सावयव मानना वेदविरुद्ध ही है। वेद में कहा है कि—“ईश्वर शरीर, छेदन और नाड़ी आदि के बन्धन से रहित, शुद्ध, निष्पाप, सर्वत्र व्यापक है।” इससे तुम्हारा कहना विरुद्ध है।
२१—(प्रश्नः) कण्ठीतिलकधारणे मूर्तिपूजने च पुण्यं भवत्युतापुण्यम्?
२१—(प्रश्न) कण्ठी तथा तिलक धारण और मूर्ति के पूजने में पुण्य होता है, वा अपुण्य?
२२—(उत्तरम्) पुण्यं भवति, न च पापमिति ब्रूमः। स्वल्प-कण्ठीतिलकधारणे मूर्तिपूजने च पुण्यं भवति चेत्तर्हि कण्ठीभारधारणे सर्वमुखशरीरलेपने पृथिवीपर्वतपूजने च महत्पुण्यं भवतीति मन्यतां क्रियताञ्च। तत्र वेदविधिप्रतिष्ठाया अभावान्न क्रियत, इति जल्पामः। वेदेषु तु खलु कण्ठीतिलकधारणस्य पाषाणमूर्तिपूजनस्य च लेश-मात्रोऽपि विधिः प्रतिष्ठा च न दृश्यते। अतो भवत्कथनं व्यर्थमेव।
२२—(उत्तर) पुण्य होता है पाप नहीं, ऐसा कहते हो तो ठीक नहीं, क्योंकि यदि थोड़े कण्ठी तथा तिलक के धारण और मूर्तिपूजन में पुण्य होता है तो बहुत कंठियों का भार लादने, चन्दन से सब मुख और शरीर के लेपन करने तथा सम्पूर्ण पृथिवी और पर्वतों के पूजने में बड़ा पुण्य होता है, ऐसा मानो और करो। यदि कहो कि पृथिवी और पहाड़ के पूजने के लिये वेद में प्रतिष्ठा का विधान न होने से नहीं करते तो वेदों में कंठी, तिलकधारण और पाषाणमूर्त्तिपूजन का लेशमात्र भी विधान नहीं और न प्रतिष्ठा का कहीं नाम है, इसलिये आपका कथन व्यर्थ है।
२३—(प्रश्नः) किं प्रतिष्ठात्वन्नाम?
२३—(प्रश्न) प्रतिष्ठा करना क्या वस्तु है?
२४—(उत्तरम्) पाषाणादिमूर्तिषु प्राणादीनाहूय तत्र स्थापनामिति ब्रूम इति।
नैवं शक्यं वक्तुम्। कथं, प्राणादीनां तत्कर्मणां तत्रादर्शनात्। यदि तत्र प्राणादयो वसेयुस्तर्हि गमनभाषणभोजनमलविसर्जनादि-कर्माणि कुतो न दृश्यन्ते? ताश्च कथं न कुर्वन्ति?, यदि प्राणादीनां यत्र-कुत्र स्थापने शक्तिरस्ति चेत्तर्हि मृतकशरीराणां मध्ये प्राणादीन् स्थापयित्वा कुतो न जीवयन्ति?, भवतामनेनैव महान् धनलाभः प्रतिष्ठा च भविष्यति। किञ्च, पाषाणादिमूर्तीनाम्मध्ये प्राणादीनाङ्गमनागमन-योरवकाश एव नास्ति, न नाड्यश्छिद्राणि च। मृतकशरीराणां मध्ये तु यथावत्सामग्री वर्त्तत एव, प्राणादिभिर्विना दाहादिकाः क्रिया जनैः क्रियन्ते। यदा भवन्तः प्राणादीनान्तत्र स्थापनं कुर्युस्तदा कस्यापि मरणमेव न भवेदनेन महत्पुण्यम्भविष्यति, तस्मात्छीघ्रमेवेदङ्कर्म कर्त्तव्य-मिति निश्चेतव्यम्।
यदि कश्चिन्मृतं शरीरञ्जीवयेत्तादृशो मनुष्यो न भूतो न भविष्य-तीति वयं जानीमः। कुतः? ईश्वरस्य नियमस्यान्यथाकरणे कस्यापि सामर्थ्यन्न जातन्न भविष्यतीत्यवगन्तव्यम्। तद्यथा जिह्वयैव रस-ज्ञानम्भवति नान्यथेतीश्वरनियमोऽस्ति। एतस्यान्यथाकरणे कस्यापि यथा सामर्थ्यन्नास्ति तथा सर्वेष्वीश्वरकृतेषु नियमेष्विति बोध्यम्। ईश्वरेण ये जडाः पदार्था रचितास्ते कदाचिच्चेतना न भवन्ति, तथा चेतना जडाः कदाचिन्नैव भवन्तीति निश्चयः।
ईश्वरः सर्वव्याप्यस्त्यतः पाषाणादिमूर्तिमध्येऽप्यस्ति, पुनस्तत्पूजने को दोषः, खण्डनञ्च किमर्थं क्रियते! एवञ्जानन्ति चेत्तर्हि पुष्पत्रो-टनञ्चन्दनघर्षणन्नमस्कारञ्च किमर्थं कुर्वन्ति? कुतः, सर्वत्रेश्वरस्य व्यापकत्वात्। नो चेदन्यघृणितपदार्थानाञ्च पूजनङ्किमर्थं न कुर्वन्ति? सर्वव्यापिनीश्वरे सिद्धे खल्वेकस्मिन्वस्तुनि स्वीकृते महत्पापं भवति। तद्यथा चक्रवर्तिनं राजानम्प्रति कश्चिद् ब्रूयाद्भवान्दशहस्तप्रमिताया भूमे राजास्तीति, तम्प्रति राज्ञो महान्कोपो यथा भवति, तथेश्वरस्यैवं स्वीकारे चेति वेदितव्यम्।
२४—(उत्तर) यदि कहते हो कि पाषाण आदि की मूर्त्तियों में वेदमन्त्रद्वारा प्राण आदि का आह्वान कर स्थापना करना प्रतिष्ठा है, तो यह कहना ठीक नहीं क्योंकि प्राण आदि और उनकी क्रिया मूर्त्तियों में नहीं दीख पड़ती। जो उन मूर्त्तियों में प्राण वा इन्द्रिय रहते तो चलना, बोलना, खाना, मलमूत्र त्याग करना आदि कर्म क्यों नहीं दीख पड़ते? और वे मूर्त्तियाँ उन कामों को क्यों नहीं करती? यदि प्राणादिकों को जहाँ कहीं स्थापन करने की शक्ति तुम लोगों में है, तो मृतक शरीरों के बीच प्राणादि को स्थापन कर क्यों नहीं जिला देते? केवल इसी एक कर्म से तुमको बहुत धन की प्राप्ति और प्रतिष्ठा होगी। और यह भी विचारो कि पाषाणादि मूर्त्तियों में तो प्राणादि के जाने-आने का अवकाश ही नहीं, न नाड़ी और इन्द्रियछिद्र हैं, और मृतक शरीरों में तो सब अवकाश, नाड़ी और इन्द्रियों के छिद्र आदि सामग्री विद्यमान ही रहती है। केवल प्राणादि के न रहने से वे शरीर जला दिये जाते हैं। सो जब आप लोग उन शरीरों में आह्वान कर प्राणादि को स्थिर कर देओ, तब तो किसी का मरण ही न होवे, इससे बड़ा पुण्य होगा। इसलिये शीघ्र ही निश्चय कर यह कर्म करना चाहिये।
हम जानते हैं कि यदि कोई मरे हुए को जिला देवे, ऐसा मनुष्य न हुआ, न होगा, क्योंकि ईश्वर के नियम के अन्यथा करने में किसी का सामर्थ्य न हुआ, न होगा, यह निश्चय जानना चाहिये। जैसे जीभ से ही रस का ज्ञान हो सकता है, अन्य इन्द्रिय से नहीं, यह ईश्वरकृत नियम है, इसके अन्यथा करने में जैसे किसी का सामर्थ्य नहीं है, वैसे ही ईश्वर के किये सब नियमों में जानना चाहिये। ईश्वर ने जो पदार्थ जड़ बनाये हैं, वे कभी चेतन नहीं होते। वैसे चेतन कभी जड़ नहीं हो जाते, यह निश्चय है।
यदि कहो कि ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है, इससे पाषाणादि मूर्त्तियों में भी है तो पाषाणादि मूर्त्तियों के पूजने में क्या दोष है और क्यों खण्डन करते हो तो उत्तर यह है कि यदि ऐसी भावना रख पूजा करते हो तो पुष्प तोड़ना, चंदन घिसना और हाथ जोड़ कर नमस्कार आदि कर्म क्यों करते हो? क्योंकि ईश्वर पुष्प, चन्दन, हाथ और मुख आदि में भी व्यापक है। जैसे पाषाणादि में व्यापक होने से ईश्वर पूजित होगा, वैसे पुष्पादि के साथ टूटना घिस जाना भी सम्भव है। यदि नहीं मानते हो तो अन्य घृणित पदार्थों का पूजन क्यों नहीं करते?, जब ईश्वर सर्वव्यापक सिद्ध है तो एक छोटी सी मूर्त्ति आदि वस्तु में उसको मानना बड़ा पाप है। तद्यथा—जैसे चक्रवर्त्ती राजा से कोई कहे कि आप दश हाथ भूमि के राजा हैं, उसके प्रति जैसे राजा का बड़ा कोप होता है, वैसे ईश्वर के इस प्रकार स्वीकार करने में ईश्वर बड़ा कोप करेगा, यह जानना चाहिये।
२५—(प्रश्नः) किञ्चिन्मात्राणाम्पाषाणपित्तलादिमूर्त्तीनां पूजने पुण्यं भवत्युत पापम्?
२५—(प्रश्न) छोटी-छोटी बनी हुई पाषाण पित्तलादि की मूर्त्तियों के पूजन में पुण्य होता है वा पाप?
२६—(उत्तरम्) नाद्यः, कुतः? किञ्चिन्मात्रस्य पित्तलादेर्मूर्त्ति-पूजने पुण्यम्भवति चेत्तर्हि महत्याः पित्तलादिमूर्तेर्दण्डप्रहारेण महत्पापं भवतीति बुध्यताम्। अन्यच्च, वेदानभिहितपाषाणादिमूर्त्तिपूजने महत्पापमेव भवतीति स्वीक्रियातान्नो चेन्नास्तिकत्वं स्वीकार्यम्। न चरमः, कुतः? पापाचरणस्य वेदेऽनभिधानात्। मनुष्यजन्मानेन व्यर्थमेव गच्छतीत्यतः। तत्पूजनम्मुक्तिसाधनञ्चेन्न तस्या मूर्त्तेरपि शिल्पिना पूजारिणा वैकत्र बद्धत्वात्स्वयञ्जडत्वाच्चेति।
२६—(उत्तर) पहिला पक्ष पुण्य होना ठीक नहीं, क्योंकि यदि छोटी-छोटी पीतल आदि की मूर्त्तियों के पूजने में पुण्य होता है, तो बड़ी-बड़ी पीतल आदि की घण्टादिरूप मूर्त्तियों में दण्डा मारने से बड़ा पाप होता है, ऐसा जानो। और भी देखो कि वेद में नहीं कहे पाषाणादि मूर्त्ति के पूजन में महापाप ही होता है ऐसा मानो, यदि न मानो तो वेदविरोधी होने से नास्तिक बनो। और पाप होना रूप द्वितीय पक्ष भी ठीक नहीं, क्योंकि पाप करना भी वेद में नहीं कहा, तो मनुष्यजन्म इससे व्यर्थ जाता है। यदि कहो कि मूर्त्तियों का पूजना मुक्ति का साधन है, तो ठीक नहीं, क्योंकि उस मूर्त्ति को कारीगर वा पूजारी ने एक स्थान में स्थिरबद्ध किया और स्वयं जड़ है, तो अन्य को क्या मुक्ति दे सकेगी।
२७—(प्रश्नः) ईदृक्कण्ठीतिलकधारणे किं मानं का वा युक्तिः?
२७—(प्रश्न) ऐसे विशेष चिह्नरूप कण्ठी और तिलक के धारण में क्या प्रमाण वा युक्ति है?
२८—(उत्तरम्) हरिपदाकृतित्वम्। कृष्णललाटे राधया कुङ्- कुमयुक्तेन चरणेन कृतं ताडनं, ललाटस्य शोभार्थञ्चेति ब्रूमः। हरिशब्देन कस्य ग्रहणम्? विष्णोरेवेति वदामः। नैतदेकान्ततः शक्यं ग्रहीतुम्। अश्वसिंहसूर्यवानरमनुष्यादीनामपि ग्रहणाद्वेदानुक्तत्वादत एव पापजनकन्तिलकमिति वेद्यम्। किञ्च तिलकत्वमिति?, त्रिपुण्ड्रोर्ध्वपुण्ड्ररचनत्वमिति वदामः।
नैवं वक्तुमुचितम्। तिलस्य प्रतिकृतिस्तिलकमल्पस्तिलस्तिलकं वेत्यर्थस्य जागरूकत्वादेतावतो दीर्घस्य ललाटे लिप्तस्य तिलकसंज्ञायां मतायां भवत्सु प्रमत्तत्वापत्तिर्भवतीति वेद्यम्।
२८—(उत्तर) श्रीकृष्ण के पग के आकार-तिलक इसलिये धारण करते हैं कि कृष्ण के मस्तक पर राधाजी ने लालचन्दन युक्त लात मार थी और वैसी लात मारने से शोभा भी समझते हैं।
हरि शब्द से किसको लेते हो?
हरि शब्द से विष्णु का ग्रहण करते हैं।
यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि घोड़ा, सह, सूर्य, वानर और मनुष्यादि का नाम भी हरि है, उनका ग्रहण क्यों नहीं होता? वेदोक्त न होने से तिलक लगाना अयुक्त है, इसी से पापकारी है, यह जानना चाहिये। तिलक क्या वस्तु है? यदि त्रिपुण्ड्र और ऊर्ध्वपुण्ड्र रचना को तिलक कहते हो तो यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि व्याकरण रीति से तिल के प्रतिबिम्ब को तिलक वा छोटे तिल को तिलक कहना चाहिये, यह सिद्ध है, तो इस प्रकार के लम्बीभूतचन्दनादि ललाट पर के लेपन की तिलक संज्ञा मानने में आप लोगों में प्रमाद प्राप्त होता है, यह निश्चय जानना चाहिये।
२९—(प्रश्नः) मूर्त्तिपूजनादिषु पुण्यं भवत्युत पापम्?
२९—(प्रश्न) मूर्त्तिपूजनादि में पुण्य होता है वा पाप?
३०—(उत्तरम्) मूर्त्तिपूजने कण्ठीतिलकधारणे च दोषो नास्ति, कुतः, ‘यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी’ इत्यतः।
३०—(उत्तर) मूर्तिपूजन और कण्ठी तिलक धारण करने में कुछ दोष नहीं है, क्योंकि ‘जिसकी भावना जैसी होती है, उसकी वैसी ही सिद्धि हो जाती है’।
३१—(प्रश्नः) भावना सत्यास्त्युत मिथ्या?
३१—(प्रश्न) भावना सत्य है वा मिथ्या?
३१—(उत्तरम्) न प्रथमः, कुतो दुःखस्य भावनां कोपि न करोति सदैव सुखस्यैव च, पुनः सुखं न भवति दुःखञ्च भवत्यतो भावना न सत्या। न द्वितीयः, कथं विद्याधर्मार्थकाममोक्षाणां भावनया विना सिद्धिरेव न भवतीत्यतः। यदि भावना सत्यास्ति चेत्तर्हि भवच्छरीरे रेलाख्ययानभावनाङ्कृत्वोपर्य्यासीमहि, यावता कालेन यावद्देशान्तरं तद्यानङ्गच्छति तावता कालेनैव भवच्छरीरं तावद्देशान्तरमस्मान् गम-येच्चेत्तदा तु भावना सत्या नान्यथा।
पुनः पाषाणादिषु हीरकादिरत्नभावनां जले दधिघृतदुग्धभावनां धूल्यां गोधूमपिष्टशर्कराभावनां शर्करायां तण्डुलभावनां तथा जडे चेतनभावनां चेतने जडभावनां दरिद्रः स्वस्मश्चक्रवर्तिभावनाञ्चक्रवर्त्ती स्वस्मिन्दरिद्रभावनाञ्च कुर्यात्सा तथैव सिद्धा भवेच्चेत्तदा तु सत्या-ऽन्यथा मिथ्येति बोद्धव्यम्।
तर्हि भावना का नाम?
भावना तु पाषाणे पाषाणभावना रोटिकायां रोटिकाभावनेति यथार्थं ज्ञानमिति ब्रूमस्तस्मस्तद्बुद्धिरिति। तथा रोटिकायां पाषाण-भावना पाषाणे रोटिकाभावनाऽयथार्थज्ञानमतस्मतद्बुद्धिर्भ्रमो ह्यभावना चेति।
३२—(उत्तर) पहिला पक्ष—भावना का सत्य मानना ठीक नहीं क्योंकि दुःख की भावना कोई नहीं करता किन्तु सदैव सुख की भावना करते हैं, फिर भी सबको सुख नहीं मिलता किन्तु दुःख होता ही है, इससे भावना सत्य नहीं। दूसरा पक्ष—भावना का मिथ्या मानना भी ठीक नहीं क्योंकि भावना के विना विद्या, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि ही नहीं हो सकती। इससे यथायोग्य भावना करना ठीक है। यदि अन्य में अन्य की भावना करना सत्य है तो आपके शरीर में रेल की भावना करके हम बैठें तो जितने समय में जितनी दूर रेल पहुँचती है, उतने समय में उतनी दूर आपका शरीर हमको पहुँचा देवे, तब तो भावना ठीक, नहीं तो मिथ्या।
फिर पत्थर आदि में हीरे आदि रत्नों की भावना, जल में दूध, दही, घी की भावना, धूलि में आटा और शक्कर की, शक्कर में तण्डुल की, जड़ में चेतन, चेतन में जड़, निर्धनी-दरिद्र अपने में चक्रवर्त्ती राजा की और चक्रवर्त्ती राजा अपने में दरिद्र की भावना करे और वह वैसी ही ठीक-ठीक सिद्ध हो जावे तब तो सत्य, अन्यथा मिथ्या जाननी चाहिए।
तो फिर भावना किसका नाम है?
पत्थर में पत्थर, रोटी में रोटी की भावना करना यथार्थ ज्ञान कहाता है। अर्थात् जैसे को वैसा जानना भावना है। रोटी में पत्थर और पत्थर में रोटी की भावना करना मिथ्या ज्ञान, अन्य में अन्य बुद्धि, भ्रमरूप अभावना कहाती है।
३३—(प्रश्नः) प्रतिमाशब्देन किङ्गृह्यते?
३३—(प्रश्न) प्रतिमा शब्द से क्या लेते हो?
३४—(उत्तरम्) पूजनार्था चतुर्भुजादिमूर्त्तिरिति वदामः।
३४—(उत्तर) पूजने योग्य चतुर्भुज आदि की मूर्ति को लेते हैं।
३५—(प्रश्नः) प्रतिमाशब्दस्य कोऽर्थः क्रियते?
३५—(प्रश्न) प्रतिमा शब्द का क्या अर्थ करते हो?
३६—(उत्तरम्) प्रतिमीयते यया सा प्रतिमा। किञ्चाऽनया प्रति-मीयते?, ईश्वरशिवनारायणादयश्चेति वदामः। किञ्च भोरनया पाषाणादिमूर्त्येश्वरस्य शिवादिशरीराणाञ्च प्रत्यक्षतया भवद्भिस्तोलङ्-कृतं किमतोऽयमर्थः क्रियते?
तुलामानं प्रतीमानं सर्वञ्च स्यात्सुलक्षितम्।
षट्सु षट्सु च मासेषु पुनरेव परीक्षयेद्। [८.४०३]
इति मनुसाक्ष्यं बोध्यम्। प्रतिमाशब्देन गुडघृतादीनान्तोलनसाधना-नां पलसेटकादीनां च ग्रहणमिति निश्चयः। “न तस्य प्रतिमाऽस्ति यस्य नाम महद्यशः” इति यजुस्संहिताया द्वात्रशेऽध्याये [मन्त्र ३]। ईश्वरस्य प्रतिमातोलनसाधनमेव न भवति तस्याऽतुलत्वात्। अत एव भवत्कृतोऽर्थो व्यर्थ एवेति बोध्यम्।
३६—(उत्तर) जिससे पदार्थ का स्वरूप वा अवधि जानी जावे वह प्रतिमा है, ऐसा अर्थ करते हो तो किसका स्वरूप इससे जाना जाता है? यदि कहो कि ईश्वर, शिव और नारायण आदि का बोध प्रतिमा से होता है, तो हम पूछते हैं कि क्या इस पाषाणादि मूर्ति से ईश्वर और शिवादि के शरीरों को आपने प्रत्यक्ष तोल लिया है कि जिससे ऐसा अर्थ करते हैं? धर्मशास्त्रस्थ राजधर्म में लिखा है कि—“तराजू और प्रतिमान-बाट सब ठीक-ठीक रखने चाहियें, और छः-छः महीने में इनकी परीक्षा राजा करावे।” इस प्रमाण के अनुकूल प्रतिमा शब्द से गुड़, घृत आदि के तोलने के साधन सेर आदि वा मासा आदि बटखरों का ग्रहण होना निश्चय है। और यजुर्वेद के बत्तीसवें अध्याय के तीसरे मन्त्र में ईश्वर की प्रतिमा अर्थात् तोल साधन का निषेध किया है क्योंकि ईश्वर अतुल है। इसी से आपका किया अर्थ व्यर्थ ही जानना चाहिये।
३७—(प्रश्नः) पुराणशब्देन किङ्गृह्यते?
३७—(प्रश्न) पुराण शब्द से क्या लेते हो?
३८—(उत्तरम्) ब्रह्मवैवर्त्तादीन्यष्टादशपुराणोपपुराणानि चेति ब्रूमः। नैवं शक्यम्, पुराणशब्दस्य विशेषणवाचकत्वेन व्यावर्त्तकार्थ-त्वात्। यथा पुरातनप्राचीनादयश्शब्दा नवीनार्वाचीनादीञ्छब्दार्थान् व्यावर्त्तयन्ति तथा पुराणादयश्शब्दा नवीनाद्यर्थांश्चेति। तद्यथा—केनचिदुक्तम्पुराणं घृतं, पुराणो गुडः, पुराणी शाटी चेत्यर्थान्नवीनं घृतञ्चेत्यादि व्यावर्त्तते, तस्मात्पुराणशब्देन वेदानान्तद्व्याख्यानब्राह्मणा-दीनाञ्च ग्रहणं भवति, न ब्रह्मवैवर्त्तादीनाञ्चेति।
“ब्राह्मणानीतिहासः पुराणानीति” [आश्वलायनगृह्य॰ ३.३.१], “दशमेऽहनि किञ्चित्पुराणमाचक्षीत” [शत॰ १३.४.३.१३], “पुराणविद्यावेदो दशमेऽहनि श्रोतव्यः”।
इत्याद्यश्वमेधस्य पूर्त्यनन्तरं नवदिनपर्यन्तमृग्वेदादिकं श्रुत्वाऽऽ-ख्याय च दशमेऽहनि ब्रह्मज्ञानप्रतिपादकमुपनिषत्पुराणं शास्त्रं यज-मानादय आचक्षीरञ्छृणुयुश्चेति ब्राह्मणवेदानामेव ग्रहणं नान्यस्येति साक्ष्यात्सर्वेभ्यो वेदानामेव पुरातनत्वाच्चेति। परन्तु मतमस्माकं खलु वेदा नान्यदिति सिद्धान्तः। ब्रह्मवैवर्त्तादीनि व्यासनामव्याजेन सम्प्रदाय-स्थैर्जीविकार्थिभिर्मनुष्याणां भ्रान्तिकरणार्थानि रचितानीति जानीमः। यथा शिवादिनामव्याजेन तन्त्राणि याज्ञवल्क्यादिनामव्याजेन च याज्ञवल्क्यादिस्मृतयश्च रचितास्तथैव ब्रह्मवैवर्त्तादीनीति विज्ञायताम्।
३८—(उत्तर) ब्रह्मवैवर्त्तादि अठारह पुराण और उपपुराण लेते हो, सो ठीक नहीं, क्योंकि पुराण शब्द विशेषणवाचक होने से व्यावर्तक अर्थवाची होता है। जैसे पुराने प्राचीन आदि शब्द नवीन और अर्वाचीन आदि से निवृत्त करते, वैसे पुराणादि शब्द नवीन आदि के वाच्य अर्थों को निवृत्त करते हैं। जैसे किसी ने कहा कि पुराना घृत, पुराना गुड़, पुरानी साड़ी, इससे घृत आदि में नवीनपन की निवृत्ति हो गई। इस कारण पुराण शब्द से वेद और वेद के व्याख्यान ब्राह्मण ग्रन्थों का ग्रहण होता है किन्तु ब्र्रह्मवैवर्त्तादि का नहीं।
कल्पसूत्रकारों ने लिखा है कि—“ब्राह्मण ग्रन्थ ही इतिहास पुराण नामक हैं।” “अश्वमेध यज्ञ में दशमें दिन कुछ थोड़ी पुराण की कथा कहे सुने” “पुराणविद्यावेद का व्याख्यान दशमें दिन सुने”, अर्थात् नव दिन तक यज्ञ में ऋग्वेदादि कह के दशमे दिन ब्रह्मज्ञान का प्रतिपादक ब्राह्मणान्तर्गत उपनिषद्भाग यजमान आदि कहें और सुनें, इस प्रकरण में पुराण शब्द से ब्राह्मण और वेद का ही ग्रहण करना अन्य का नहीं, ऐसी साक्षी है। और वेद ही सबसे पुराने हैं। परन्तु हमारा मत वेद है अन्य नहीं, यही सिद्धान्त है। ब्रह्मवैवर्त्तादि पुराण व्यासजी के नाम के छल से मतवादी जीविकार्थी लोगों ने मनुष्यों को भ्रान्ति करानेवाले बनाये हैं। जैसे शिव आदि के नाम के छल से तन्त्र और याज्ञवल्क्यादि के नाम के छल से याज्ञवल्क्यादि स्मृति रची हैं, वैसे ही ब्रह्मवैवर्त्तादि पुराण जानो।
३९—(प्रश्नः) देवालयशब्देन भवद्भिः किं गृह्यते?
३९—(प्रश्न) देवालय शब्द से आप क्या लेते हो?
४०—(उत्तरम्) मूर्तिस्थापनपूजनस्थानानि घण्टादिनादकरणार्थानि मन्दिराणीति प्रतिजानीमः। नैवं शक्यम्, कुतः? अत्र वेदविधेरभावाद् भ्रान्तियुक्तत्वाच्चेति। यत्र होमः क्रियते तदेव देवालयशब्देनोच्यते। कथं, होमस्य देवपूजा-शब्देन गृहीतत्वात्—
अध्यापनम्ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तु तर्पणम्।
होमो दैवो बलिर्भौतो नृयज्ञोऽतिथिपूजनम्॥ १॥ [३.७०]
स्वाध्यायेनार्चयेतर्षीन् होमैर्देवान्यथाविधि।
पितृञ्छ्राद्धैर्नृनन्नैश्च भूतानि बलिकर्मणा॥ २॥” [३.८१]
होमेनैव देवपूजनं भवतीति मनुनोक्तत्वाद् भवत्कृतोऽर्थोऽसंगत एवेति निश्चयः। अतो होमस्थानं यज्ञशालैव देवालयशब्देन ग्राह्येति निश्चयः।
४०—(उत्तर) मूर्ति को स्थापन करने, पूजने के स्थान, जिनमें कि घण्टानाद, आरती आदि करते हैं, उनको देवालय कहते हो, तो ठीक नहीं क्योंकि यह कर्त्तव्य वेद से विरुद्ध और भ्रान्तियुक्त होने से। इससे जिसमें होम किया जाता, वही स्थान ‘देवालय’ शब्दवाच्य हो सकता है क्योंकि ‘देवपूजा’ शब्द से होम का ग्रहण है।
धर्मशास्त्र में लिखा है कि — “पढ़ाना-ब्रह्मयज्ञ, तर्पण-पितृयज्ञ, होम-देवयज्ञ, वैश्वदेव-भूतयज्ञ और अतिथिपूजन से मनुष्ययज्ञ कहाता, तथा स्वाध्याय से ऋषिपूजन, यथाविधि होम से देवपूजन, श्राद्धों से पितृपूजन, अन्नों से मनुष्यपूजन और वैश्वदेव से प्राणिमात्र का सत्कार करना चाहिये।” इससे सिद्ध हो गया कि होम से देवपूजा होती है। यह मनु की साक्षी है। इससे आपका किया अर्थ असंगत है, यही निश्चय जानो। इसलिये होम का स्थान यज्ञशाला ही देवालय शब्द से लेनी चाहिये।
४१—(प्रश्नः) देवशब्देन किं गृह्यते?
४१—(प्रश्न) देवशब्द से क्या लेते हो?
४२—(उत्तरम्) ब्रह्माविष्णुमहादेवादीनत्र पूजनार्थांस्तन्मूर्त्तींश्चेति गृह्णीमः।
नैवं योग्यम्—
“यत्र देवतोच्यते तत्र तल्लिङ्गो मन्त्र” इति निरुक्ते।
“मन्त्रमयी देवतेति” पूर्वमीमांसायाम्।
तथा ‘मन्त्रमयी देवतेति’ ब्राह्मणे।
“आत्मैव देवतास्सर्वास्सर्वमात्मन्यवस्थितमिति” मनुस्मृतौ।
“मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव, अतिथिदेवो भव” इति तैत्तिरीयोपनिषदि। [१.११.२]
इत्यादिसाक्ष्यविरोधात्कर्मकाण्डमन्त्राणां मात्रादीनां विदुषाञ्च देवदेवताशब्दाभ्यां संग्रहादुपासनाज्ञानकाण्डयोरीश्वरस्यैव देवताशब्देन सर्वत्र स्वीकाराद्भवत्कृतोऽर्थो मिथ्यैवेति निश्चयः।
एवं सति पाषाणादिमूर्त्तीन् देवताशब्देन यो गृह्णाति स न मनुष्योऽस्ति किन्तु पशुरेव च—
“योऽन्यां देवतामुपासते स पशुरेव देवानाम्”॥ “उत्तिष्ठत जाग्रत [कठ॰ १.३.१४] तज्जानथ अन्या वाचो विमुञ्चथ”॥ [मुण्डक॰ २.५]
चेत्याद्युक्तत्वान्मूर्त्तयस्तु कदाचिद्देवता न भवन्तीति निश्चीयताम्।
४२—(उत्तर) पूजने के लिये ब्रह्मा, विष्णु और महादेवादि देवताओं को और उनकी मूर्त्तियों को देव शब्द से लेते हो, सो ठीक नहीं क्योंकि—
“वेद में जहाँ-जहाँ देवता कहा है, वहाँ-वहाँ उस देवता नामवाचक शब्दयुक्त मन्त्र का ही नाम देवता है,” यह निरुक्तकार का सिद्धान्त है, और पूर्वमीमांसा और ब्राह्मणभाग में—“मन्त्रस्वरूप ही देवता माना है।” मनुस्मृति में—“आत्मा के बीच सब जगत् अवस्थित है, इसलिये आत्मा ही सब देवता है।” तैत्तिरीय आरण्यक में—“माता, पिता, आचार्य, अतिथि को ही देवता माना है”। इत्यादि प्रमाणों से तुम्हारा कथन विरुद्ध होने से कर्मकाण्ड में मन्त्रस्वरूप, माता आदि और विद्वानों का देव और देवता शब्द से ग्रहण तथा उपासना और ज्ञानकाण्ड में सर्वत्र देवता शब्द से ईश्वर का ही स्वीकार है, इससे आपका किया अर्थ मिथ्या ही निश्चित होता है।
जब ऐसा है तो जो देवता शब्द से पाषाणादि मूर्त्तियों का ग्रहण करता है, वह मनुष्य नहीं किन्तु पशु ही है। और उपनिषद् में यही कहा है कि—“जो एक ईश्वर को छोड़ के अन्य देवता की उपासना करता है, वह देवताओं में पशु ही है।” “इसलिये हे मनुष्यो! उठो जागो,”—“उस आत्मा को जानो, अन्य की उपासनारूप वाणियों को छोड़ो।” इत्यादि प्रमाण से मूर्त्तियाँ कदापि देवता नहीं हो सकतीं, यह निश्चय जानो।
४३—(प्रश्नः) देवलदेवलक शब्दाभ्यां किं गृह्यते?
४३—(प्रश्नः) मूर्तिपूजारींस्तदधीनजीविकावतश्चेति ब्रूमः। नैवमुचितं वक्तुम्। कथं—
“यद्वित्तं यज्ञशीलानान्देवस्वन्तद्विदुर्बुधाः।
अयज्वनान्तु यद्वित्तमासुरं तत्प्रचक्षते॥” [११.२०]
इति मनुसाक्ष्यविरोधात्। यज्ञशीलानां यज्ञार्थं यद्वित्तं तद्देवशब्दे-नोच्यते, तल्लाति गृह्णाति स्वभोजनाद्यर्थं सोऽयं देवलो निन्द्यः। यो यज्ञार्थं यद्धनं तच्चोरयति स देवलकः। कुत्सितो देवलो देवलकः, ‘कुत्सिते’ इति सूत्रेण कप्रत्ययविधानाद्भवत्कृतोऽर्थोऽन्यथेति वेदितव्यम्।
४४—(उत्तर) यदि कहते हो कि मूर्ति पूजने और मूर्तिपूजा से जीविका करने वाले देवल और देवलक कहाते हैं, तो ठीक नहीं क्योंकि धर्मशास्त्र में लिखा है कि—“जो यज्ञ करनेवालों का धन है वह देवस्व, और यज्ञ न करनेवालों का धन आसुर कहाता है।” देव नाम यज्ञ के धन को अपने भोजनादि के लिये लेनेवाला देवल निन्दित कहाता है। यहाँ व्याकरण रीति से मध्यम पद स्वशब्द का लोप हो जाता है। और जो यज्ञ के धन की चोरी करता है, वह देवलक अतिनिन्दित कहाता है क्योंकि व्याकरण के ‘कुत्सिते’ [अष्टाध्यायी ५.३.७४] सूत्र से निन्दित अर्थ में ‘क’ प्रत्यय होता है, इससे आपका किया अर्थ मिथ्या है, यह जानना चाहिये।
४५—(प्रश्नः) ईश्वरस्य जन्ममरणे भवत आहोस्विन्न?
४५—(प्रश्न) ईश्वर के जन्म-मरण होते हैं वा नहीं?
४६—(उत्तरम्) अप्राकृते दिव्ये जन्ममरणे भवतो, नान्यथेति स्वीक्रियते। भक्तानामुद्धारार्थं दुष्टानां विनाशार्थन्तथा धर्म्मस्थापनार्थम-धर्म्मनिर्मूलनार्थञ्च।
नैव न्याय्यङ्कस्मात्सर्वशक्तिमत्त्वात्सर्वान्तर्यामित्वादखण्डत्वात्सर्वव्यापकत्वादनन्तत्वान्निष्कम्पत्वा-च्चेश्वरस्येति। सर्वशक्तिमान् हीश्वरोऽस्ति, स सर्वं न्याय्यङ्कार्यङ्कर्त्तुं समर्थोऽस्त्यसहायेन। यश्च शरीर-धारणादिसहायेन कार्य्यङ्कर्त्तुं समर्थो भवेन्न चान्यथेति नेत्थं चेत्तर्हि सर्वशक्तिमत्त्वमेव तस्य नश्येत्। यथा खल्वसहायेन सर्वमिदञ्जगद्रचयित्वा धारयति तथैव हिरण्याक्षरावणकंसादीनां क्षणमात्रेण हननङ्कर्त्तुं समर्थोऽसहायेनोपदेशम्भक्तोद्धारं धर्मस्थानपनमधर्मदुष्टविनाशञ्च। यथा सर्वशक्तिमत्वमीश्वरे स्वीक्रियते तथा न्यायकारित्वादयोऽपि स्वभावा ईश्वरे स्वीकार्याः। अन्यथा स्वनाशाद्यधर्ममपि कर्त्तुं समर्थो भवेदत ईश्वरोऽजोऽविकारी च।
प्रकृत्याकाशादिकं सर्वञ्जगदीश्वरस्याऽपेक्षया स्वल्पं तुच्छं सान्तञ्चास्ति, पुनस्तस्य का शरीरसामग्री, यतो निवासार्थमधिकरणम्भवेत्त-स्माद् बृहत्किमपि न विद्यत इति सर्ववेदसिद्धान्तः—
“स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरꣳ शुद्धमपापविद्धम्”। [यजु॰ ४०.८]
“तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः”। [यजु॰ ४०.५]
“सत्यं ज्ञानमनन्तम्ब्रह्म”। [तैत्तिरीयोपनिषद् ब्रह्मानन्दवल्ली १]
“दिव्यो ह्यमूर्त्तः पुरुषस्स बाह्याभ्यन्तरो ह्यजः”। [मुण्डक॰ २.१.२]
“अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययन्तथाऽरसन्नित्यमगन्धवच्च यत्।
अनाद्यनन्तं महतः परन्ध्रुवन्निचाय्य तं मृत्युमुखात्प्रमुच्यते”॥ [कठ॰ १.३.१५]
“अणोरणीयान्महतो महीयानात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्”। [कठ॰ १.२.२०]
“वेदाहमेतम्पुरुषं महान्तमादित्यवर्णन्तमसः परस्तात्।
तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥” [यजु॰ ३१.१८]
इति यजुर्वेदादिश्रुतिभ्यः। ईश्वरस्याऽवतारोऽर्थाज्जन्ममरणे नैव भवत इति सर्वेषां वेदानां सिद्धान्तो वेदितव्यः।
४६—(उत्तर) यदि यह कहते हो कि मनुष्यादि के जन्म-मरण से विलक्षण अप्राकृत दिव्य जन्म-मरण होते हैं अन्यथा नहीं, यह स्वीकार है। क्योंकि भक्तों के उद्धार, दुष्टों के विनाश, धर्म की स्थापना और अधर्म को निर्मूल करने के लिये अस्वाभाविक जन्म ईश्वर धारण करता है, तो ठीक नहीं क्योंकि ईश्वर सर्वशक्तिमान्, सर्वान्तर्यामी, अखण्ड, सर्वव्यापक, अनन्त और निश्चल, निष्कम्प है। जैसे ईश्वर सर्वशक्तिमान् है तो वह सब न्याययुक्त कार्य विना सहाय के करने को समर्थ है, फिर जो शरीरधारणादि सहाय से कार्य कर सके, अन्यथा न कर सके, तो ऐसा मानने में वह सर्वशक्तिमान् ही नहीं ठहर सकता। जैसे विना सहायता के इस सर्व जगत् को रच के धारण करता है, वैसे ही हिरण्याक्ष, रावण और कंसादि को मारने को विना शरीरादि सहाय के समर्थ है। तथा स्वतन्त्र असहाय ही उपदेश, भक्तों का उद्धार, धर्म का स्थापन, अधर्म तथा दुष्टों का विनाश कर सकता है। जैसे ईश्वर में सब शक्तियों का होना मानते हो, वैसे न्यायकारीपन आदि स्वभाव भी ईश्वर में स्वीकार करने योग्य है। यदि ऐसा न मानोगे तो सर्वशक्तिमान् होने से ही अपना नाश, अन्याय, अधर्म करने को भी समर्थ हो जावे, तो ईश्वरता ही न रहे, इससे ईश्वर अनन्त, अजन्मा और अविकारी है।
प्रकृति और आकाशादि सब जगत् ईश्वर की अपेक्षा छोटा, तुच्छ और अन्तवाला है। फिर उसके शरीर बनने को कौन सामग्री है, जिसमें वह समाय जावे। उससे बड़ा कोई भी नहीं, यह सब वेद-शास्त्र से सिद्ध है तो कैसे एक शरीर में समाय सकता है?
वेद और उपनिषदों के प्रमाण—“वह सब में व्याप्त, प्रकाशमय, सब प्रकार के शरीर से रहित, अच्छेद्य, अभेद्य, नाड़ी आदि के बन्धन से रहित, शुद्ध, निर्मल, निष्पाप है।” “वह सब के भीतर और बाहर परिपूर्ण है।” “वह सत्यस्वरूप ज्ञानस्वरूप और सबसे बड़ा अनन्तहै।” “वह पुरुष पूर्ण परमात्मा दिव्यरूप, सब प्रकार की मूर्त्ति से रहित, सबके बाहर-भीतर वर्त्तमान और अजन्मा है।” “वह शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध और नाश रहित, नित्य, अनादि, अनन्त, महत्तत्त्व से परे निश्चल है। उसी को ठीक-ठीक जान के मृत्युरूप ग्राह के मुख से छूटता है”। “वह सूक्ष्म से सूक्ष्म और बड़े से बड़ा है। इस जीव के अन्तःकरण में व्याप्त उपलब्ध होनेवाला है।” मनुष्य को ऐसा विचार रखना उचित है कि मैं उस परमात्मा को जानूँ कि जो सब से बड़ा, पूर्ण सत्य के तुल्य प्रकाशवाला, अन्धकार से परे है। क्योंकि उसी को जानकर मनुष्य मृत्यु से बच सकता है, अन्य कोई मार्ग मुक्ति के लिये नहीं है।” इत्यादि मन्त्रों के प्रमाण से ईश्वर का अवतार अर्थात् जन्म-मरण नहीं होते, यही सब वेदों का सिद्धान्त जानना चाहिये।
४७—(प्रश्नः) ईश्वरस्साकार उत निराकारः?
४७—(प्रश्न) ईश्वर साकार है, वा निराकार?
४८—(उत्तरम्) निराकारश्चेति वदामः। निरकारश्चेत्तर्हि तस्मात्साकारं तत्कथञ्जायेत, तथा हस