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महर्षि दयानन्द व्याख्या : सहजानन्दादि मतों के प्रति प्रश्न और
उन मतों का खण्डन
प्रश्न—सहजानन्द नामक पुरुष कौन है?
उत्तर—सहजानन्द नारायण का अवतार और स्वामिनारायण नामक पन्थ का आचार्य्य है।
प्रश्न—नारायण कौन है?
उत्तर—गोलोक और वैकुण्ठ में रहनेवाला, चतुर्भुज, द्विभुज और लक्ष्मीपति ईश्वर है।
प्रश्न—वह अब भी (अभी)है कि नहीं?
उत्तर—ईश्वर नित्य है, इससे वह अब भी है।
खण्डन—ऐसा होना अशक्य है, क्योंकि वेद में कहा है कि—
“ईश्वर सर्वव्यापक, वीर्य्यरूप, शरीर, छिद्र और नाड़ी से रहित, शुद्ध और पाप रहित है।”
सर्वान्तर्यामी और सर्वव्यापक ईश्वर का जन्म-मरण और देहधारण है ही नहीं, जिसका जन्म-मरण और शरीर धारण हो उसको ईश्वर कभी कह ही नहीं सकते। फिर आजकल के सहजानन्द का तो क्या कहना है?
प्रथम तो मुरदा के वास्ते आचार्य का नाम बिलकुल नहीं घटता, क्योंकि सहजानन्द मर गया और इसी से वह अभ्यास कराने को असमर्थ है। ब्राह्मण भाग में कहा है कि—
“अपना गुरु जो कि वेद पढ़ा हुआ और केवल ईश्वर की ही भक्ति करता हो, उसके पास शिष्य को अपने हाथ में समिध् नामक लकड़ियों को लेकर जाना चाहिये।”
और वही मनु भी साक्षी देता है कि—
“जो ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य गुरु, अपने शिष्य को यज्ञोपवीत आदि धर्म्मक्रिया कराने के बाद वेद को अर्थ और कल्पसहित पढ़ावे तो ही उसको ‘आचार्य’ कहना चाहिये।”
सहजानन्द की बनाई हुई शिक्षा-पत्री, जिससे सिद्ध होता है कि सहजानन्द ने उस पुस्तक में बहुत कुछ पाखण्ड वर्णन किया है। सहजानन्द की शिक्षापत्री के प्रथम श्लोक का अर्थ निम्नलिखित है—
“श्रीकृष्ण जिनकी बाईं ओर राधाजी खड़ी हैं और जिनकी छाती पर लक्ष्मीजी बैठी हैं और जो वृन्दावन में क्रीड़ा करते हैं, उनका मैं हृदय से ध्यान धरता हूँ”॥ १॥
राधा वाम और दक्षिण, पश्चिम, आसपास और ऊपर नीचे कहाँ खड़ी हैं, सो प्रत्यक्ष अनुमान और शब्द द्वारा किसी को भी निश्चय होता नहीं। इसलिये सहजानन्द ने जो कल्पना करी सो व्यर्थ है। जबकि छाती के ऊपर लक्ष्मी बैठी है तो कृष्ण के मुख में दरिद्रता बैठी है, ऐसा मानना पड़ेगा। महाभारत में कहा है कि “कृष्ण द्वारिका की पड़ोस में मर गये”। अब कौन जाने कि कृष्ण का जीव इस समय कहाँ है? कृष्ण तो वृन्दावन में क्रीड़ा करते हुए किसी को नहीं दीख पड़ते, किन्तु वृन्दावन में बहुपाखण्ड पाषाणादि की मूर्त्तियाँ दीखती हैं। निराकार, जन्म-मरण-रहित ईश्वर को छोड़ के कृष्ण का मैं हृदय में ध्यान धरता हूँ, ऐसा कहना मिथ्या है॥ १॥
“मुकुन्दानन्द आदि नैष्ठिक ब्रह्मचारी और भट्ट मायाराम आदि गृहस्थ मेरे आश्रित हैं”॥ ४॥
मुकुन्दानन्द आदिकों ने वेद और ईश्वर पर आस्था रक्खी नहीं, इससे उनका नैष्ठिक ब्रह्मचारी नाम घटता ही नहीं है॥ ४।
इसी प्रकार से इनके बहुत से आगे के श्लोक भी भ्रष्ट और अशुद्ध हैं।
“रास्ता चलते हुए शिवालय आदि जो देवमन्दिर आवें, उनको नमना और प्रेम से उनका दर्शन करना चाहिये”॥ १३॥
पाषाण आदि मूर्त्ति के घर को देवालय नाम दिया इससे और उनका दर्शन करना इस प्रकार अनर्थ वचन कहने से मालूम पड़ता है कि सहजानन्द पदार्थविद्या बिलकुल नहीं जानता था॥ १३॥
“अपने वर्ण आश्रम का जो धर्म उसका कोई पुरुष त्याग न करे, उसी प्रकार पाखण्डकल्पित परधर्म का आचरण भी नहीं करना चाहिये”॥ १४॥
प्रथम सहजानन्द ने वेदोक्त अपने वर्णाश्रम धर्म का त्याग किसलिये किया? जो कहो कि त्याग नहीं किया तो वेदविरुद्ध मूर्त्तिपूजन, कण्ठी, तिलकधारणादि पाखण्डों का आचरण क्यों किया-कराया? यह तो ऊपर से सिद्ध होता है कि सहजानन्द ने अपने पैर में अपने आप ही कुठार मारा है, यहाँ तक अपने कथन को अपने आप ही धो डाला है॥ १४॥
“जिसके कहने से कृष्ण-भक्ति में भंग पड़े, उस पुरुष के मुख से कभी भगवान् की कथा-वार्ता सुननी नहीं चाहिये”॥ १५॥
‘केवल कृष्ण की ही भक्ति करने में अपना धर्म रहता है’। इस प्रकार सहजानन्द का कहना व्यर्थ है। क्योंकि वेद में जहाँ वर्णाश्रम धर्म प्रतिपादन प्रकरण चला है, वहाँ पर ‘कृष्ण की भक्ति करनी यही स्वधर्म है,’ ऐसा नहीं कहा। यह ऊपर से समझना चाहिये कि सहजानन्द और उसके सम्प्रदायवालों के मुख से कभी किसी को कथा-वार्ता नहीं सुननी चाहिये। कृष्ण को (मुरदा को)प्रभु नाम देना नहीं बन सकता, क्योंकि इनके जन्म-मरण आदि दोष हुए हैं॥ १५॥
“स्त्री से श्रुति अथवा ज्ञानवार्ता मनुष्यों को सुननी नहीं चाहिये, इसी प्रकार स्त्री, राजा और राजपुरुषों के साथ वाद-विवाद नहीं करना चाहिये”॥ ३४॥
याज्ञवल्क्यादि महान् ऋषियों ने गार्गी आदि स्त्रियों के साथ धर्म विषय पर विचार किया था, इससे सहजानन्द की कल्पना मान्य करने योग्य नहीं॥ ३४॥
“कृष्णदीक्षा की प्राप्ति के लिये तुलसी की बनी हुई माला पहरनी और ललाट आदि भागों पर ऊर्ध्वत्रिपुण्ड्र करना चाहिये”॥ ४१॥
कृष्णदीक्षा, तुलसी-माला-धारण और ऊर्ध्वपुण्ड्र आदि जो कहा, सो सहजानन्द का कहना मिथ्या है, क्योंकि ऐसा करना वेदविरुद्ध और युक्तिरहित है। जो कण्ठी, थोड़ा सा तिलक धारण करने से पुण्य होता है तो कण्ठी का भार बांधने से और समस्त मुख तथा शरीर लीप देने से अत्यन्त पुण्य होता है, ऐसा मानना पड़ेगा, और जो ऐसा मानते हो तो यह काम जल्दी करो॥ ४१॥
सहजानन्द के ऐसे-ऐसे कितने ही श्लोक भ्रष्ट हैं।
“वंशपरम्परा से जो ब्राह्मण रुद्राक्ष धारण करता हो तो उसको मेरा आश्रित होने पर उसका त्याग नहीं करना चाहिए। नारायण और केशव की एकात्मता (अभिन्नता)ही है, क्योंकि वेद में इन दोनों को ब्रह्मरूप गिना है”॥ ४६-४७॥
त्रिपुण्ड्र, रुद्राक्ष का धारण करना, ऐसा जो सहजानन्द ने माना, सो प्रथम सहजानन्द ने अपनी ही रुद्राक्ष किसलिये त्यागी और अपने सम्प्रदाय-वालों की किसलिये छुड़ाई? “मेरे आश्रितों को” ऐसा वचन सहजानन्द ने वार-वार लिखा है, सो मिथ्या है। क्योंकि जिसको जन्म-मरणादि दोष प्राप्त हुए, ऐसे अविद्वान् जीव का आश्रय निष्फल है।
नारायण और शिव दोनों एक ही हैं, ऐसा सहजानन्द ने ऊपर कहा है, सो मिथ्या है, क्योंकि वेद में शिव और नारायण को ब्रह्मरूप माना नहीं॥ ४६-४७॥
“इस प्रकार करने के बाद राधाकृष्ण की छवि अथवा मूर्त्ति का प्रेम से दर्शन करके यथाशक्ति उनका मन्त्र जप करना, उसके पीछे संसार का व्यवहार चलाना चाहिये”॥ ५४॥
राधाकृष्ण को सहजानन्द ने या दूसरे किसी ने प्रत्यक्ष देखा नहीं, फिर उनकी छवि अथवा मूर्त्ति कैसे हो? यह ऊपर से सिद्ध होता है कि सहजानन्द जो कुछ कहता है, वह बिलकुल असत्य है॥ ५४॥
“पाषाण अथवा धातु आदि की बनाई हुई मूर्त्ति की यथाशक्ति फल-फूल आदि पदार्थों से पूजा करनी और पीछे कृष्ण का अष्टाक्षर मन्त्र जपना”॥ ५६॥
इस श्लोक से सिद्ध होता है कि सहजानन्द की बुद्धि जड़ थी, क्योंकि वेदविरुद्ध पाषाणादि मूर्त्तिपूजन का इसने प्रतिपादन किया है। वेदविरुद्ध कृष्ण मन्त्र जपने से सहजानन्द को नास्तिक नाम दिया जा सकता है॥ ५६॥
“हरि को नैवेद्य दिये पीछे बाकी बची प्रसादी आप खानी चाहिये और कृष्ण सेवा में जिस प्रकार बन सके, उसी प्रकार तत्पर रहना”॥ ५८॥
हरि प्रत्यक्ष दीखता नहीं और मूर्त्तियों में भोजन करने की शक्ति नहीं, इस कारण से मूर्त्ति को नैवेद्य धरना व्यर्थ है। यह बिलकुल छल-कपट है, क्योंकि जब ऐसा होता है, तभी अपने अंगूठे के दर्शन और टन् टन् पुँ पुँ करके भोजन करने में थोड़ा श्रम होता है॥ ५८॥
“अपने आचार्य ने जो कृष्णरूप दिया हो और जिस में प्राणप्रतिष्ठा कर दी हो उस ही की सिर्फ सेवा करनी और की सेवा नहीं करनी। हर रोज शाम को भगवत्-मन्दिर में जाना और वहाँ राधापति कृष्ण का ऊँची आवाज से कीर्त्तन करना”॥ ६२-६३॥
पाषाण आदि मूर्त्तिस्वरूप, जिसकी प्रतिष्ठा होती है, वह कृष्णस्वरूप नहीं हो सकता, क्योंकि वह तो केवल पत्थर ही है। ऐसा पत्थर किसी को कभी सेवनीय नहीं। इसी प्रकार उसको नमना भी नहीं। जो सर्वशक्तिमान्, अवताररहित, न्यायकारी, दयालु, सर्वान्तर्यामी, सर्वव्यापक, निराकार और श्रेष्ठ परमात्मा है, उसकी सब मनुष्यों को पूजा करनी और उसी को नमना चाहिये।
शाम को सब मनुष्यों को भगवद्मन्दिर में जाकर पाषाणादि मूर्त्तियों की, और जिसका जन्म-मरण हुआ, ऐसे राधापति कृष्ण नाम मुर्दा की पूजा करनी और उसका ऊँची आवाज से कीर्त्तन करना, ऐसा जो ऊपर कहा, सो सब मिथ्या उपदेश है। यह ऊपर से जान पड़ता है कि सहजानन्द कुत्ते की तरह भौंका है। वह वेदविद्या बिलकुल नहीं जानता था। असत्य उपदेश से सहजानन्द की सद्गति भी नहीं हुई होगी, ऐसा अनुमान किया जा सकता है।
इस मिथ्या उपदेश को जो स्वीकार करता और जो दूसरों को कराता है, उसकी सद्गति न तो हुई और न होती है और न होगी भी। जो मनुष्य वेदादि सद्विद्या, पक्षपातरहित न्याय और वैरबुद्धित्यागादि स्वरूप धर्म का बोध कराता है, उसको और जो मनुष्य यथावत् ऐसे बोध को स्वीकार करता, और न्यायकारी दयालु, निराकार परमेश्वर की प्रार्थना, उपासना तथा स्तुति बराबर करेगा, केवल उसी को सद्गति प्राप्त होगी॥ ६२-६३॥ इसी प्रकार आगे के श्लोक अशुद्ध हैं।
“एकादशी आदि सम्पूर्ण व्रतों को रखना और कृष्ण के जन्म-दिवस और शिव-रात्रि को बड़ा उत्सव करना चाहिये”॥ ७९॥
एकादशी आदि व्रत वेद में कहीं लिखे नहीं, किन्तु वेद में ब्रह्मचर्य, सत्यभाषण आदि व्रत करना लिखा है। अतः सिद्ध हुआ कि एकादशी आदि व्रतों का रखना व्यर्थ है॥ ७९॥
“सम्पूर्ण वैष्णवों के अधिपति जो वल्लभाचार्य उनके पुत्र विट्ठल ने जो-जो उत्सव निर्माण किये हैं, उन सब उत्सवों को विट्ठल के अनुसार करना चाहिये। जिस प्रकार विट्ठल ने कृष्ण की सेवा करी है, उसी प्रकार ग्रहण करनी। द्वारिका आदि मुख्य यात्रायें शक्तिपूर्वक यथाविधि करनी, और कंगाल मनुष्यों पर दया रखनी। मेरे आश्रितों को विष्णु, शिव, गणपति, पार्वती और सूर्य इन पाँच देवताओं को पूज्य मानना चाहिये। भूत-प्रेत उपद्रव करें तो नारायण कवच अथवा हनुमान् मन्त्र का जप करना। परन्तु किसी शूद्र देव का जप करना नहीं”॥ ८१-८५॥
सर्व वैष्णवराज वल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठल ने परधनहरण, धर्मनाश, परस्त्रीगमनादि व्यभिचारों को स्वतः करके उपदेश किया है। इस प्रकार कर्म करनेवाले पुरुष के मत विषय में सहजानन्द ने अपनी सम्मति देकर उपदेश किया है, इससे सहजानन्द भी दुष्ट था, यह सिद्ध हुआ।
द्वारिका आदि तीर्थयात्रायें करनी, ऐसा जो सहजानन्द ने उपदेश किया, वह केवल भ्रान्ति से ही किया है, यह निश्चय कर जानना। जड़, पत्थर, पानी आदि पदार्थों में तीर्थोपदेश का सम्भव दीखता नहीं। इसलिये यह उपदेश अत्यन्त दुःखदायक है। छान्दोग्य उपनिषद् में तीर्थ शब्द का अर्थ वेद अथवा ईश्वर का ज्ञान होता है, जिससे अविद्या, जन्ममरण, हर्ष-शोकादि दुःखों से तरे, उसी का नाम तीर्थ होता है।
शिव, विष्णु, गणपति, पार्वती आदि देहधारी मुर्दाओं की पूजा और सूर्य स्वतः जड़ है, इससे उसकी पूजा विषय में वेद में कहा नहीं। इसलिये एक परब्रह्म की पूजा करनी चाहिये, और इन पाँचों की पूजा करनी, यह जो सहजानन्द ने कहा है, वह मिथ्या है। भूत-प्रेतों के निवारण के लिये नारायण कवच अथवा हनुमान् मन्त्र का जप करना, ऐसा उपदेश करने से मालूम पड़ता है कि सहजानन्द को भ्रम उत्पन्न हुआ होगा॥ ८१-८५॥
“वेद, व्याससूत्र, भागवत, भारत में कहा हुआ विष्णुसहस्रनाम, भगवद्गीता, विदुरनीति, स्कन्दपुराण और वैष्णवखण्ड में कहा हुआ वासुदेव माहात्म्य और याज्ञवल्क्यस्मृति आदि आठ सच्छास्त्रों का प्रमाण मुझे इष्ट है। ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य को जो कल्याण के इच्छुक और मेरे शिष्य हैं, उनको इन आठ शास्त्रों को सुनना और पाठ करना और कराना चाहिये। इन आठ शास्त्रों में आचार, व्यवहार और प्रायश्चित्त के निर्णय के लिये याज्ञवल्क्य स्मृति की मिताक्षरा नामक टीका का भी मैं ग्रहण करता हूँ। भागवत के पाँचवें और दशमस्कन्ध में कृष्णलीला लिखी है, इससे वे दो स्कन्ध अवश्य जानना। भागवत के दशमस्कन्ध में भक्तिशास्त्र, पाँचवें में योगशास्त्र और याज्ञवल्क्यस्मृति में हमारा धर्मशास्त्र वर्णन किया है। शारीरक और भगवद्गीता का भाष्य जो रामानुज आचार्य ने बनाया है, वह हमारा अध्यात्मशास्त्र है। इन शास्त्रों के जिन-जिन वाक्यों में कृष्ण, धर्म, भक्ति और वैराग्य का वर्णन किया होय उन वाक्यों को दूसरे वाक्यों की अपेक्षा श्रेष्ठ मानना, और कृष्णभक्ति धर्म के साथ ही रखनी चाहिये”॥ ९३-१०२॥
ऊपर के सब श्लोक (प्रायः)अशुद्ध हैं। भागवत आदि पुराण और भारत में विष्णुसहस्रनाम, भगवद्गीता आदि का ही केवल स्वीकार, दूसरे ग्रन्थों का त्याग, याज्ञवल्क्यस्मृति की मिताक्षरा टीका का ग्रहण, पूर्वमीमांसा तथा मनुस्मृति का त्याग करने से और वासुदेव के माहात्म्य गिनने से सिद्ध होता है कि सहजानन्द अविद्वान् था। सहजानन्द भागवत के भ्रष्ट, मिथ्या, भूत-प्रेत अधर्म्म कथा प्रतिपादक दशमस्कन्ध को सर्वशास्त्रों की अपेक्षा श्रेष्ठ मानता है। अतएव जान पड़ता है कि सहजानन्द वेदनिन्दक (नास्तिक)था।
दशमस्कन्ध में भक्ति लेशमात्र नहीं है, किन्तु व्यभिचार आदि अधर्म का प्रतिपादन प्रसिद्ध है। पाँचवें स्कन्ध में योगशास्त्र का प्रतिपादन तो किया नहीं किन्तु योगाभास का प्रतिपादन किया है। श्रौतसूत्र और मीमांसा आदि धर्मशास्त्रों का तिरस्कार करने से और दले हुए पदार्थ को फिर से दलने के समान ‘याज्ञवल्क्य स्मृति’ का स्वीकार करने से ऐसा मालूम पड़ता है कि सहजानन्द वेद के कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड और ज्ञानकाण्ड विषय में कुछ नहीं जानता था। शारीरक-सूत्र का रामानुज से किया हुआ अति अशुद्ध भाष्य का प्रमाण मानने से सहजानन्द अविवेकी था, यह सिद्ध होता है।
श्रीकृष्ण ने खुद ही वेदवाक्यों को सर्वोत्कृष्ट माना है, फिर सहजानन्द ने ऊपर जो दशमस्कन्ध आदि को श्रेष्ठ गिना है, सो सहजानन्द को भ्रम हुआ होगा, ऐसा जान पड़ता है। वेदवाक्य सर्वोत्तम हैं, यह ब्रह्मादि विद्वानों का सिद्धान्त है। परन्तु सहजानन्द भौंकता है कि कृष्ण के वाक्य वेद की अपेक्षा श्रेष्ठ हैं, यह सहजानन्द का शरमा के डूब मरना जैसा है॥ ९३-१०२॥
जिस प्रकार हृदय में जीव रहता है, उसी प्रकार ईश्वर अन्तर्यामीपने से जीव में रहता है, व स्वतन्त्र और सबको उन-उन के कर्मों का फलदाता है, वह पूर्ण पुरुषोत्तम परब्रह्म श्रीकृष्ण भगवान् उपासना करने योग्य इष्ट देव सर्व पदार्थों के आविर्भाव का कारण (प्रसिद्ध करता)है, जब वह राधा के साथ हो तब वह राधाकृष्ण, रुकमिणी के साथ हो तब लक्ष्मीनारायण, अर्जुन के साथ होय तो तब नरनारायण, और जब बलभद्रादिकों से युक्त होय तब उनको वही नाम देना चाहिए॥ १०७-११०॥
जीव के सृदश कभी ईश्वर बनता नहीं, क्योंकि सर्वशक्ति, सर्वज्ञता, निर्विकारत्व आदि गुणयुक्त स्वभाव ईश्वर का ही है। जन्म, मरण, हर्ष, शोक आदि गुणयुक्त कृष्ण को परब्रह्म, भगवान्, पूर्ण पुरुषोत्तम आदि नाम देना बिलकुल सम्भव नहीं। एक सर्वशक्तिमान्, न्यायकारी, दयालु, सर्वान्तर्यामी, सच्चिदानन्द-स्वरूप, निर्दोष, निराकार, अवताररहित और वेदयुक्तिसिद्ध परमात्मा को छोड़ के जन्ममरणयुक्त कृष्ण की उपासना करनी—यह जो सहजानन्द ने कहा है, इससे मालूम पड़ता है कि सहजानन्द को पदार्थज्ञान बिलकुल नहीं था। राधा तो ‘अनय’ नामक ग्वाले की स्त्री थी। कृष्ण का उससे कोई सम्बन्ध नहीं था। कृष्ण की स्त्री का नाम रुक्मिणी था, इससे उसको लक्ष्मीनारायण नाम देना अयोग्य है। इस प्रकार कथनकर सहजानन्द ने अपनी मूर्खता बतलाई है, क्योंकि सर्वज्ञता के विना सहजानन्द का कथन युक्तिरहित दिखाई पड़ता है॥ १०७-११०॥
“उन्हीं की ही (सिर्फ कृष्ण की ही)सब मनुष्यों को भक्ति करनी चाहिये, उनकी भक्ति करने के विना सुख का दूसरा साधन कुछ भी नहीं”॥ ११३॥
कृष्ण का खुद का ही कल्याण हुआ कि नहीं, इस विषय में विद्वानों को संशय उत्पन्न होता है। कृष्ण ने स्वयं ही एक ईश्वर की भक्ति की है और वैसा ही करने का उपदेश किया है। फिर सहजानन्द ने जो ऊपर कहा है कि सब मनुष्यों को केवल कृष्ण की ही भक्ति करनी चाहिये, उनकी भक्ति करने के विना सुख का दूसरा साधन कुछ भी नहीं है, यह कहकर उसने अपनी अविद्या बताई है॥ ११३॥
“गुणवान् पुरुषों को विद्यादि गुणों का उत्तम फल तो यही है कि कृष्ण की भक्ति और सत्सङ्ग करना। उसको छोड़ के जो कोई दूसरा कुछ करेगा, वह विद्वान् होकर भी अधोगति अर्थात् नरक पावेगा”॥ ११४॥
इस श्लोक में छन्दोभङ्ग दोष होने से मालूम पड़ता है कि सहजानन्द की छन्दोज्ञान विषय में कुछ भी समझ नहीं थी। कृष्ण मर गया, इसलिये अब उसकी भक्ति करनी अयोग्य और निष्फल है। विद्वान् लोग अपनी विद्या के प्रकाश से सर्वदा सद्गति पाते हैं, किन्तु अविद्या, अधर्माचरण और अज्ञान से सहजानन्द जैसे अविद्वान् पुरुषों को असद्गति प्राप्त होती है, ऐसा दीख पड़ता है॥ ११४॥
“तीन प्रकार के शरीरों से विलक्षण जीव उन में ब्रह्मरूप की भावना करके श्रीकृष्ण की ही भक्ति सर्वदा करनी”॥ ११५॥
जो जीव ब्रह्मरूप हो तो ब्रह्म की तुल्यता जीव में क्यों नहीं दीखती? जो जीव ब्रह्मतुल्य हो तो जिस प्रकार ब्रह्म ने यह सब जगत् रचा, इसी प्रकार जीव थोड़ासा ही नवीन जगत् क्योंकर नहीं रच लेता? जो जीव ब्रह्म एक हो तो अविद्या जन्म मरण, हर्ष, शोक, ठंडी, ताप, सुख, दुःख, ताप [=ज्वर], पीड़ा और बन्ध आदि दोष ब्रह्म में मानने पड़ेंगे। जो जीव से ब्रह्म भिन्न हो तो एक ब्रह्म की ही भक्ति करनी और कृष्णादि जीवों की भक्ति नहीं करनी चाहिये। एक कृष्ण की ही भक्ति करनी—यह जो सहजानन्द ने ऊपर कहा, उससे सिद्ध होता है कि इस प्रकार कहने में इसने महान् पाप किया है॥ ११५॥
“मेरा मत विशिष्टाद्वैत और मेरा प्रिय स्थान गोलोक है, वहाँ ब्रह्मरूप कृष्ण की सेवा करनी, यह मेरी मुक्ति जाननी”॥ १२१॥
सहजानन्द का मत चक्राङ्कित के समान है, ऐसा दीख पड़ता है। विशिष्टाद्वैत शब्द का अर्थ सब मनुष्य इसी प्रकार करते हैं कि—अविद्यायुक्त जीव और मायायुक्त ईश्वर है। कुछ मनुष्य ईश्वर की माया एक मानते हैं। इस प्रकार तीन-चार पदार्थों से अद्वैत सिद्ध नहीं होता। दूसरे पदार्थ के विना विशिष्ट शब्द बन ही नहीं सकता। दो पदार्थ अद्वैत नहीं हो सकते। किन्तु ब्रह्म तो अवश्य अद्वैत है। सजातीय, विजातीय दूसरा ब्रह्म है ही नहीं। इसलिये यह भेद ब्रह्म में संयोग के विना सिद्ध नहीं हो सकता। वेद और युक्तिसिद्ध एकरसमात्र एक ही ब्रह्म है, यह अद्वैत शब्द का अर्थ जानना है अतः दीख पड़ता है कि रामानुज और सहजानन्द के मत भ्रष्ट हैं। गौ आदि पशुओं का लोक मेरा स्थान है, इस प्रकार जो सहजानन्द ने कहा सो अपनी जाति के नियम से सहजानन्द खुद ही पशु बनता है। गोलोक में निवास करने से और एक कृष्णसेवा से ही मुक्ति प्राप्त होती है, ऐसा जो सहजानन्द ने बका है, सो मिथ्या है॥ १२१॥
“मैंने बड़े-बड़े मन्दिरों में लक्ष्मीनारायणादि मूर्त्तियों की प्राणप्रतिष्ठा करी है, उनकी यथाविधि सेवा करनी”॥ १३०॥
सहजानन्द अथवा और कोई भी बिलकुल विद्याधर्मविरुद्ध और द्रव्यनाशक बड़े मन्दिरों में रहनेवाली पाषाणादिमूर्त्तियों को लक्ष्मीनारायण का नाम नहीं दे सकता, क्योंकि वेद में मूर्त्तिपूजाविषय में कुछ कहा नहीं इसलिये, और मूर्त्ति स्वतः जड़ है इस कारण से, तथा लक्ष्मीनारयण आदि तो चेतन थे, इस हेतु से मूर्त्ति का यथाविधि खण्डन करना चाहिये, न कि पूजन करना॥ १३०॥
“दो अमुक पुरुषों की स्त्रियों को अपने-अपने पति की आज्ञा लेकर केवल स्त्रियों को ही कृष्णमन्त्र का उपदेश करना चाहिये”॥ १३३॥
सहजानन्द ने जाना कि उपदेश के सिवाय स्त्रियों से धनप्राप्ति कभी होय नहीं। अतः स्पष्ट रीति से दीख पड़ता है कि सहजानन्द ने एकदम छल-कपट फैला दिया है। परब्रह्म का मन्त्र छोड़कर कृष्ण का अर्थात् मुर्दामन्त्र का उपदेश करने से सहजानन्द लोभी और अज्ञानी ठहरता है॥ १३३॥
“अपने कमाये हुए धन-धान्य का दशमा भाग कृष्ण के अर्पण करें, और जो मनुष्य दुर्बल होवें बीसवाँ भाग कृष्ण को देवें”॥ १४७॥
परधन हरने में और अपने को सुख देने में सहजानन्द का छल-भेद खुल्लमखुल्ले दीखता है। इस प्रकार करने में सहजानन्द का अभिप्राय यह था कि यत्किञ्चित् मेहनत कार्य के विना ही दसवाँ, बीसवाँ भाग लेकर अपने संसार का विषयसुख खूब भोगेंगे। ऊपर कहा है कि कृष्ण को अर्पण करना, तो कृष्ण खुद तो दसवाँ अथवा बीसवाँ भाग लेने को आ ही नहीं सकता, और कृष्ण कुछ ऐसा दरिद्री नहीं था। अतः सिद्ध होता है कि सहजानन्द ने गोकुल के वल्लभ सम्प्रदायवालों की तरह खूब धूर्त्तता चलाई है।
ऐसे-ऐसे धूर्त्त सम्प्रदायों के फैल जाने से अपने आर्य्यावर्त्त देश को बहुत हानि उठानी पड़ी। इसलिये सब सज्जनों को श्रम उठाकर इन सम्प्रदायों को जड़-मूल से उखाड़ डालना चाहिये। जो कभी उखाड़ डालने में न आवे तो अपने देश का कल्याण कभी होने का ही नहीं॥ १४७॥
“एकादशी आदि व्रतों का यथाशक्ति और शास्त्र प्रमाण से उद्यापन करना। उद्यापन मन की इच्छा को पूर्ण करता है। श्रावण मास मेें बिल्व आदि के पत्रों से महादेव की पूजा करें-करावें”॥ १४८-१४९॥
इससे भी सहजानन्द की धूर्त्तता दीखती है। जो कभी एकादशी आदि व्रतों को नहीं करें तो शिष्यों से उद्यापन विना धनलाभ नहीं होय, श्रावण महीने में महादेव पूजन अर्थात् पाषाण आदि मूर्त्तिपूजा विना, अपने को शिष्यों से धन-प्रतिष्ठा मिलेगी नहीं, ऐसे-ऐसे विचारों से सहजानन्द ने अपना कपट दिखाया है॥ १४८-१४९॥
“देव की मूर्त्ति के सिवाय लिखी [बनी] हुई अथवा लकड़ी आदि की स्त्रियों की मूर्त्तियों का कभी स्पर्श न करें और उनकी तरफ बुद्धिपूर्वक दृष्टि से देखें भी नहीं”॥ १७७॥
प्रथम तो सहजानन्द ने अपने मन्दिर में राधा की मूर्त्ति की स्थापना क्यों करी? और ‘जिनकी बाईं तरफ राधा है’ इत्यादि वाक्यों का सहजानन्द ने किसलिये मनुष्यों को उपदेश किया? सहजानन्द के शिष्य बुद्धिपूर्वक राधा का दर्शन किसलिये करते हैं? इस प्रकार के प्रमत्त गीत और बकवाद से सहजानन्द पर अनेक प्रकार के दोष लगते हैं॥ १७७॥
“सब इन्द्रियों को जीत लेना, उनमें से विशेष करके रसना इन्द्रिय को जीतना, किसी को द्रव्य का संग्रह करना नहीं, उसी प्रकार किसी को करने भी नहीं देना। किसी की स्थापना करनी नहीं, धैर्य का त्याग करना नहीं और अपने रहने की जगह में परस्त्री को आने देना नहीं चाहिये”॥ १८८, १९०॥
सिर्फ साधु ही जितेन्द्रिय होवे, ऐसा जो तुम उपदेश देते हो, तो तुम क्या असाधु हो? तुम्हारे विचार से क्या गृहस्थ जितेन्द्रिय न होवें? ऊपर कहा कि किसी को स्थापन न करें, तो क्या विद्या, धर्म, ईश्वर, प्रार्थना, स्तुति और उपासना का स्थापन नहीं करना चाहिये? वेद, धर्म, ईश्वर, प्रार्थना, स्तुति और उपासना का स्थापन नहीं करना चाहिये? वेद, धर्म, युक्तिविरुद्ध सम्प्रदायों का स्थापन किसलिये करना चाहिये? और सहजानन्द ने इस प्रकार के सम्प्रदायों का किसलिये स्थापन किया? सब मनुष्यों को इस प्रकार के पाखण्डों का खण्डन और सत्यधर्म का मण्डन अवश्य करना चाहिये॥ १८८-२०४॥
“इस प्रकार सब मनुष्यों का धर्म संक्षेप से लिखा है, और इन धर्म्मों का विस्तारपूर्वक वर्णन सम्प्रदाय के ग्रन्थों में से समझ लेना। मैंने सब सत्यशास्त्रों का सार निकाल के मनुष्यों को इष्ट फल की देनेवाली यह शिक्षापत्री लिखी है”॥ २०३-२०४॥
धर्म का तो लेशमात्र प्रतिपादन किया नहीं, किन्तु अपनी कपोलकल्पना से अपनी भ्रान्ति का प्रकाश किया दीखता है। वेदादि शास्त्रों में जो यथावत् धर्म्म लिखा है, उसका ज्ञान सहजानन्द को बिलकुल नहीं था। लिखे हुए धर्म का फिर से लिखना व्यर्थ है, क्योंकि ऐसा करने से दले हुए को दलने के समान है। मनुष्यमात्र का सनातन साम्प्रदायिक ग्रन्थ वेद ही है, और शिक्षापत्री आदि ग्रन्थ सब मिथ्या हैं। “विस्तर” शब्द व्याकरण नियम से अशुद्ध है। “विस्तर” की जगह “विस्तार” शब्द लिखना चाहिये। कथन, श्रवण, आदि अर्थों में ही विस्तर शब्द प्रयोग होता है।
सहजानन्द को सत्यशास्त्र का बोध तो था ही नहीं, तथा इसने कुछ अध्ययन भी नहीं किया था, क्योंकि इसने वेद और युक्तिविरुद्ध पाषाण आदि मूर्तिपूजन, कण्ठी, तिलक, धारण आदि भ्रष्ट कर्मों का प्रतिपादन किया है। शिक्षापत्री में सार की जगह असार वर्णन किया है। शिक्षापत्री लोभ विषय में तो इष्ट फलदायक है, परन्तु शिक्षापत्री का पाठ करने से सर्वदा सुखप्राप्ति होती है, यह अनुभवरहित बात है। सहजानन्द के ऐसे-ऐसे वचनों से सहजानन्द लोभी ठहरता है। लोभ के विना सम्प्रदाय की वृद्धि होती नहीं, और वृद्धि न हो तो प्रतिष्ठा और धनप्राप्ति भी न हो, और जो उसकी प्राप्ति न हो तो इष्ट विषय-सुख नहीं मिले। अतः समझना कि सहजानन्द की बुद्धि कपटरूप थी॥ २०३-२०४॥
“जो पुरुष अथवा स्त्री इस शिक्षापत्री में कहे धर्मपूर्वक वर्ताव करेंगे, उनको अवश्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त होंगे”॥ २०५॥
जो मनुष्य पाषाण आदि मूर्त्तिपूजन आदि पाखण्डों का आचरण करेगा, उसको धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष तो प्राप्त नहीं होगा, बल्कि अधर्म, अनर्थ, दुष्ट इच्छा, बन्ध, नरक आदि दोष अवश्य प्राप्त होंगे॥ २०६॥
“शिक्षापत्री के अनुकूल जो मनुष्य आचरण नहीं करें, वे अपने सम्प्रदाय से बाहर हैं, इस प्रकार मेरे साम्प्रदायिक स्त्री-पुरुषों को समझना चाहिये”॥ २०७॥
पाषाण आदि मूर्त्तिपूजन, कण्ठी, तिलक आदि पाखण्डरूप चिह्न कभी कोई न करें और जो पुरुष इन चिह्नों को नहीं करें सिर्फ उन्हीं पुरुषों को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होगी। वेदादि सत्यशास्त्रोक्त सनातन, सत्य, पक्षपातरहित, न्याय धर्म का त्याग करके सहजानन्द आदिकों के बनाये हुए शिक्षा की पत्री आदि भ्रष्ट और वेद-युक्तिविरुद्ध ग्रन्थों का जिन मनुष्यों ने स्वीकार किया, करते हैं और करेंगे, श्रेष्ठ पुरुष उन सबको सद्धर्मरहित और नास्तिक नाम देवें॥ २०७॥
“मेरे आश्रित पुरुष शिक्षापत्री का हर रोज पाठ करें, और जो विद्याहीन हों, वे प्रीति से उसका श्रवण करें, और जो श्रवण करना भी न बने तो इस शिक्षापत्री की अत्यन्त प्रीति से पूजा करें और इसको मेरी वाणी तथा मेरा रूप जानें। इस पत्री को दैवी मार्गी पुरुष को देवें किन्तु असुर को न देवें”॥ २०८-२१०॥
वेद का पढ़ना-सुनना छोड़कर सहजानन्द आदि के बनाये हुए शिक्षापत्री आदि कपोलकल्पित पुस्तकों को पढ़ने और सुनने से अधिक पाप लगता है। इस जड़, व्यर्थ पुस्तक की पूजा करने का उपदेश देने में योग्यता मालूम पड़ती है। वाणी कभी जीवरूप बनती नहीं। परम प्रीति से शिक्षापत्री का सत्कार करें, ऐसा जो सहजानन्द ने कहा, सो सत्कार करने के बदले परम प्रयत्न से इस अशुद्ध पत्रिका का खण्डन करें। इस प्रकार कथन में सहजानन्द का मूल मतलब अज्ञानी और बालकों को भ्रमा कर उनसे धनादि पदार्थों का छीन लेना है।
जो दैवी मार्गी होगा, वह तो शिक्षापत्री को हाथ में पकड़ेगा भी नहीं। जो मनुष्य विद्यारहित असुर सम्प्रदाय का है, वह स्वीकार करता है। उन मनुष्यों के सम्प्रदाय को ‘सम्प्रदाह’ नाम देना चाहिये, क्योंकि सम्प्रदाय अन्धकाररूप है। जिसमें विद्या और विज्ञान का सत्यानाश हो जाय उसका नाम ‘सम्प्रदाह’ पड़ता है। वर्त्तमान में जितने वेद-विरुद्ध सम्प्रदाय हैं, उन सबको ‘सम्प्रदाह’ नाम देना चाहिये॥ २०८-२१०॥
प्रश्न—मरण समय में सहजानन्द अपने शिष्यों का हाथ पकड़ विमान पर चढ़ा के वैकुण्ठ ले जाता है, और परम सुख देता है, इत्यादि गपोड़ा सहजानन्द के शिष्यों के द्वारा सुना जाता है, वह सत्य है कि मिथ्या?
उत्तर—बिलकुल मिथ्या दीखता है, क्योंकि जो पुरुष मर गया, वह फिर से आकर प्रथम शरीर धारण कर ही नहीं सकता। जो कभी वैसे करने में समर्थ हो तो सम्प्रदायवालों ने छल-कपट से जो पुष्कल द्रव्य इकट्ठा किया है, उसको भोगने के लिये भी अवश्य आना चाहिये। अतः समझना चाहिये कि सहजानन्द आदि धूर्त्त; अज्ञानी मनुष्यों को मोह में डालने के अर्थ ऐसे-ऐसे कथन करते हैं।
अपने शिष्यों के हाथ पर लोह का खण्ड दाग कर चक्र आदि चिह्नों के करने से सहजानन्द के सम्प्रदायवालों को अत्यन्त पाप लगेगा। जो बगुलाभगत हैं, वे स्त्री-दर्शन और धातुस्पर्श नहीं करते, गृहस्थ आचार्य लोभ के हेतु से मन्दिर बाँध, कपट से द्रव्य आदि पदार्थों को छीन लेते हैं। दो-दो विवाह करना आदि धर्म जिस सम्प्रदाय में होते हों, उसमें कल्याण की आशा किसी सज्जन पुरुष को कभी नहीं रखनी चाहिये।
॥ समाप्त॥