Donation Appeal Download Our App
Choose Sutra

In Hindi:

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : भूमिका

महर्षि दयानन्द व्याख्या : ओ३म्

अथार्याभिविनयोपक्रमणिकाविचारः

सर्वात्मा सच्चिदानन्दोऽनन्तो यो न्यायकृच्छुचिः।

भूयात्तमां सहायो नो दयालुः सर्वशक्तिमान्॥ १॥

चक्षूरामाङ्कचन्द्रेऽब्दे चैत्रे मासि सिते दले।

दशम्यां गुरुवारेऽयं ग्रन्थारम्भः कृतो मया॥ २॥

[दयाया आनन्दो विलसति परः स्वात्मविदितः,

सरस्वत्यस्याग्रे निवसति मुद्रा सत्यनिलया।

इयं ख्यातिर्यस्य प्रलसितगुणा वेदशरणा-

स्त्यनेनायं ग्रन्थो रचित इति बोद्धव्यमनघाः॥ ३॥]

बहुभिः प्रार्थितः सम्यग् ग्रन्थारम्भः कृतोऽधुना।

हिताय सर्वलोकानां ज्ञानाय परमात्मनः॥४॥

वेदस्य मूलमन्त्राणां व्याख्यानं लोकभाषया।

क्रियते सुखबोधाय ब्रह्मज्ञानाय सम्प्रति॥ ५॥

स्तुत्युपासनयोः सम्यक् प्रार्थनायाश्च वर्णितः।

विषयो वेदमन्त्रैश्च सर्वेषां सुखवर्द्धनः॥६॥

विमलं सुखदं सततं सुहितं जगति प्रततं तदु वेदगतम्।

मनसि प्रकटं यदि यस्य सुखी स नरोऽस्ति सदेश्वरभागधिकः॥७॥

विशेषभागीह वृणोति यो हितं नरः परात्मानमतीव मानतः।

अशेषदुःखात्तु विमुच्य विद्यया स मोक्षमाप्नोति न कामकामुकः॥८॥

व्याख्यान—जो परमात्मा, सबका आत्मा, सत्-चित्-आनन्दस्वरूप, अनन्त, अज, न्याय करने वाला, निर्मल, सदा पवित्र, दयालु, सब सामर्थ्यवाला हमारा इष्टदेव है, वह हमको सहाय नित्य देवे, जिससे महाकठिन काम भी हम लोग सहज से करने को समर्थ हों। हे कृपानिधे! यह काम हमारा आप ही सिद्ध करनेवाले हो, हम आशा करते हैं कि आप अवश्य हमारी कामना सिद्ध करेंगे॥ १॥

संवत् १९३२ मिती चैत्र सुदी १०, गुरुवार के दिन इस ग्रन्थ का आरम्भ हमने किया॥ २॥

दयानन्द सरस्वती स्वामी का नाम इस श्लोक से निकलता है॥ ३॥

बहुत सज्जन लोग, सबके हितकारक, धर्मात्मा, विद्वान्, विचारशील जनों ने मुझसे प्रीति से कहा तब सब लोगों के हित और यथार्थ परमेश्वर का ज्ञान तथा प्रेमभक्ति यथावत् हो, इसलिए इस ग्रन्थ का आरम्भ किया है॥४॥

इस ग्रन्थ में केवल चार वेदों के और ब्राह्मणग्रन्थों के मूलमन्त्रों का प्राकृतभाषा में व्याख्यान किया है, जिससे सब लोगों को सुख से बोध हो और ब्रह्म का ज्ञान यथार्थ हो॥४॥

इस ग्रन्थ में परमेश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना तथा धर्मादि विषय वर्णन किया है परन्तु मूलसंहिता मन्त्र और ब्राह्मण प्रमाण से ही, सब को सुख बढ़ाने वाला यह विषय है॥५॥

जो ब्रह्म विमल, सुखकारक, पूर्णकाम, तृप्त, जगत् में व्याप्त, वही सब वेदों से प्राप्य है, जिसके मन में इस ब्रह्म की प्रकटता (यथार्थ विज्ञान)है, वही मनुष्य ईश्वर के आनन्द का भागी है और वही सबसे सदैव अधिक सुखी है। ऐसे मनुष्य को धन्य है॥७॥

जो नर इस संसार में अत्यन्त प्रेम, धर्मात्मता, विद्या, सत्सङ्ग, सुविचारता, निर्वैरता, जितेन्द्रियता, प्रत्यक्षादि प्रमाणों से परमात्मा का स्वीकार (आश्रय)करता है, वही जन अतीव भाग्यशाली है, क्योंकि वह मनुष्य यथार्थ सत्यविद्या से सम्पूर्ण दुःख से छूटके परमानन्द परमात्मा का नित्य संगरूप जो मोक्ष उसको प्राप्त होता है, फिर कभी जन्म मरण आदि दुःख सागर को प्राप्त नहीं होता, परन्तु जो विषयलम्पट, विचाररहित, विद्या, धर्म, जितेन्द्रियता, सत्सङ्गरहित, छल, कपट, अभिमान, दुराग्रहादि दुष्टतायुक्त है, सो वह मोक्ष-सुख को प्राप्त नहीं होता, क्योंकि वह ईश्वरभक्ति से विमुख है॥ ८॥

और वह मनुष्य जन्म-मरण, ज्वरादि पीड़ाओं से पीड़ित होके सदा दुःखसागर में ही पड़ा रहता है।

इससे सब मनुष्यों को उचित है कि परमेश्वर और उसकी आज्ञा से विरुद्ध कभी नहीं हों, किन्तु ईश्वर तथा उसकी आज्ञा में तत्पर होके इस लोक (संसार-व्यवहार)और परलोक (जो पूर्वोक्त मोक्ष)इनकी सिद्धि यथावत् करें, यही सब मनुष्यों की कृतकृत्यता है।

इस आर्याभिविनय ग्रन्थ में मुख्यता से वेदमन्त्रों का परमेश्वर-सम्बन्धी एक ही अर्थ संक्षेप से किया है। दोनों अर्थ करने से ग्रन्थ बढ़ जाता, इससे व्यवहार-विद्यासम्बन्धी अर्थ नहीं किया गया, परन्तु वेदों के भाष्य में यथावत् विस्तारपूर्वक परमार्थ और व्यवहारार्थ—ये दोनों अर्थ सप्रमाण किये जायेंगे—जैसे (तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुरित्यादि१ य॰ संहिता प्रमाण, इन्द्रं मित्रं वरुणमित्यादि२० ऋ॰ सं॰ प्र॰, बृहस्पतिर्वै ब्रह्म३, गणपतिर्वै ब्रह्म, प्राणो वै ब्रह्म४, आपो वै ब्रह्म, ब्रह्म ह्यग्निरित्यादि५, शतपथ, ऐतरेय ब्राह्मणादि प्रमाण और महान्तमेवात्मानमित्यादि६)निरुक्तादि प्रमाणों से परब्रह्म ही अर्थ लिया जाता है तथा मुखादग्निरजायतेत्यादि७, य॰ सं॰ प्र॰, वायोरग्निरित्यादि८ ब्राह्मण प्र॰ तथा अग्निरग्रणीर्भवती-त्यादि९ निरुक्त प्रमाणों से यह प्रत्यक्ष जो रूपगुणवाला दाह-प्रकाशयुक्त भौतिक अग्नि, वह लिया जाता है, इत्यादि दृढ़ प्रमाण, युक्ति और प्रत्यक्ष व्यवहार से दोनों अर्थ वेदभाष्य में लिखे जायेंगे, जिससे सायणादिकृत भाष्य-दोष और उनके अनुसार अंग्रेजी कृतार्थदोषरूप वेदों के कलङ्क निवृत्त हो जाएँगे और वेदों के सत्यार्थ का प्रकाश होने से, वेदों का महत्त्व तथा वेदों का अनन्तार्थ जानने से मनुष्यों को महालाभ और वेदों में यथावत् सबकी प्रीति होगी।

इस ग्रन्थ से तो मनुष्यों को केवल ईश्वर का स्वरूपज्ञान और भक्ति, धर्मनिष्ठा, व्यवहारशुद्धि इत्यादि प्रयोजन सिद्ध होंगे, जिससे नास्तिक और पाखण्डमतादि अधर्म में मनुष्य लोग न फँसें। किञ्च सब प्रकार से मनुष्य अत्युत्तम हों और सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर की कृपा सब मनुष्यों पर हो, जिससे सब मनुष्य दुष्टता को छोड़के श्रेष्ठता को स्वीकार करें, यह मेरी परमात्मा से प्रार्थना है, सो परमेश्वर अवश्य पूरी करेगा।

॥ इत्युपक्रमणिका संक्षेपतः सम्पूर्णा॥