उ॒शिग॑सि क॒विरङ्घा॑रिरसि॒ बम्भा॑रिः। अव॒स्यूर॑सि॒ दुव॑स्वान्। शुन्ध्यूर॑सि मार्जा॒लीयः॑। स॒म्राड॑सि कृ॒शानुः॑। परि॒षद्यो॑ऽसि॒ पव॑मानः। नभो॑ऽसि प्र॒तक्वा॑। मृ॒ष्टो᳖ऽसि हव्य॒सूद॑नः। ऋ॒तधा॑मासि॒ स्व᳖र्ज्योतिः॥ १७॥ यजु॰ ५। ३२॥
In Hindi:
संस्कृत में सूत्र की भूमिका : मूल स्तुति
महर्षि दयानन्द व्याख्या : हे सर्वप्रिय! आप “उशिक्” कमनीयस्वरूप, अर्थात् सब लोग जिसको चाहते हैं, क्योंकि आप “कविः” पूर्ण विद्वान् हो तथा आप “अङ्घारिः” हो अर्थात् स्वभक्तों का जो अघ (पाप)उसके अरि (शत्रु)हो, अर्थात् सर्वपापनाशक हो तथा “बम्भारिः” स्वभक्तों और सर्वजगत् के पालन तथा धारण करनेवाले हो, “अवस्यूरसि दुवस्वान्” अन्नादि पदार्थ स्वभक्त धर्मात्माओं को देने की इच्छा सदा करते हो तथा परिचरणीय विद्वानों से सेवनीयतम हो। “शुन्ध्यूरसि, मार्जालीयः” शुद्धस्वरूप और सब जगत् के शोधक तथा पापों को मार्जन (निवारण)करनेवाले आप ही हो, अन्य कोई नहीं। “सम्राडसि कृशानुः” सब राजाओं के महाराज तथा कृश=दीनजनों के प्राण के सुखदाता आप ही हो, “परिषद्योसि पवमानः” हे न्यायकारिन्! पवित्र सभास्वरूप, सभा के आज्ञापक, सभ्य, सभापति, सभाप्रिय, सभारक्षक सभा से ही सुखदायक आप ही हो तथा पवित्रस्वरूप, पवित्रकारक, पवित्रप्रिय आप ही हो। “नभोऽसि प्रतक्वा” हे निर्विकार! आकाशवत् आप क्षोभरहित, अतिसूक्ष्म होने से आपका नाम नभ है तथा “प्रतक्वा” सबके ज्ञाता, सत्यासत्यकारी जनों के कर्मों की साक्ष्य रखनेवाले कि जिसने जैसा पाप वा पुण्य किया हो, उसको वैसा फल मिले, अन्य का पुण्य वा पाप अन्य को कभी न मिले। “मृष्टोसि हव्यसूदनः” मृष्ट= शुद्धस्वरूप, सब पापों के मार्जक, शोधक तथा “हव्यसूदनः” मिष्ट, सुगन्ध, रोगनाशक, पुष्टिकारक इन द्रव्यों से वायु-वृष्टि की शुद्धि करने-करानेवाले हो, अतएव सब द्रव्यों के विभागकर्त्ता आप ही हो, इससे आपका नाम “हव्यसूदन” है। “ऋतधामासि स्वर्ज्योतिः” हे भगवन्! आपका ही धाम, स्थान सर्वगत सत्य और यथार्थ स्वरूप है, यथार्थ (सत्य)व्यवहार में ही आप निवास करते हो, मिथ्या में नहीं। “स्वः” आप सुखस्वरूप और सुखकारक हो तथा ‘ज्योतिः’ स्वप्रकाश और सबके प्रकाशक आप ही हो॥१७॥