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व्यवहारभानु

In Hindi:

महर्षि दयानन्द व्याख्या : भूमिका

मैंने परीक्षा करके निश्चय किया है कि जो धर्मयुक्त व्यवहार में ठीक ठीक वर्त्तता है उसको सर्वत्र सुखलाभ और जो विपरीत वर्त्तता है वह सदा दुःखी होकर अपनी हानि कर लेता है। देखिये जब कोई सभ्य मनुष्य विद्वानों की सभा में वा किसी के पास जाकर अपनी योग्यता के अनुसार नम्रतापूर्वक ‘नमस्ते’ आदि करके बैठ के दूसरे की बात ध्यान दे सुन, उसका सिद्धान्त जान निरभिमानी होकर युक्त प्रत्युत्तर करता है, तब सज्जन लोग प्रसन्न होकर उसका सत्कार और जो अण्डबण्ड बकता है उसका तिरस्कार करते हैं।

जब मनुष्य धार्मिक होता है तब उसका विश्वास और मान्य शत्रु भी करते हैं और जब अधर्मी होता है तब उसका विश्वास और मान्य मित्र भी नहीं करते। इससे जो थोड़ी विद्या वाला भी मनुष्य श्रेष्ठ शिक्षा पाकर सुशील होता है उसका कोई भी कार्य्य नहीं बिगड़ता।

इसलिये मैं मनुष्यों की उत्तम शिक्षा के अर्थ सब वेदादिशास्त्र और सत्याचारी विद्वानों की रीतियुक्त इस ‘व्यवहारभानु’ ग्रन्थ को बनाकर प्रसिद्ध करता हूं कि जिसको देख दिखा, पढ़ पढ़ाकर मनुष्य अपने और अपने अपने संतान तथा विद्यार्थियों का आचार अत्युत्तम करें कि जिससे आप और वे सब दिन सुखी रहें।

इस ग्रन्थ में कहीं कहीं प्रमाण के लिए संस्कृत और सुगम भाषा लिखी और अनेक उपयुक्त दृष्टान्त देकर सुधार का अभिप्राय प्रकाशित किया है कि जिसको सब कोई सुख से समझ के अपना अपना स्वभाव सुधार के सब उत्तम व्यवहारों को सिद्ध किया करें॥

सं॰ १९३६ दयानन्द सरस्वती

फाल्गुन शुक्ला १५ काशी

ओ३म्

सर्वान्तर्यामिणेऽखिलगुरवे विश्वम्भराय नमः

अथ व्यवहारभानुः

ऐसा किस मनुष्य का आत्मा होगा कि जो सुखों को सिद्ध करनेवाले व्यवहारों को छोड़कर उलटा आचरण करने में प्रसन्न होता हो। क्या यथायोग्य व्यवहार किये विना किसी को सर्वसुख हो सकता है? क्या कोई मनुष्य अपनी और पुत्रादि सम्बन्धियों की उन्नति न चाहता हो? क्या कोई मनुष्य अच्छी शिक्षा से धर्मार्थ, काम और मोक्ष फलों को सिद्ध नहीं कर सकता? और इसके विना पशु के समान होकर दुःखी नहीं रहता है? इसलिये सब मनुष्यों को उचित है कि श्रेष्ठ शिक्षा और धर्मयुक्त व्यवहारों से वर्त्तकर सुखी होके दुःखों का विनाश करे। इसलिये सब मनुष्यों को सुशिक्षा से युक्त होना अवश्य है, इसलिये यह बालक से लेके वृद्धपर्य्यन्त मनुष्यों के सुधार के अर्थ व्यवहार-सम्बन्धी शिक्षा का विधान किया जाता है। इसलिये यहां वेदादि शास्त्रों के प्रमाण भी कहीं-कहीं दीखेंगे। क्योंकि उनके अर्थों को समझने का ठीक-ठीक सामर्थ्य बालक आदि का नहीं रहता। जो विद्वान् प्रमाण देखना चाहे तो वेदादि अथवा मेरे बनाये ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका आदि ग्रन्थों में देख लेवे।

प्रश्न—कैसे पुरुष पढ़ाने और शिक्षा करनेहारे होने चाहियें?

उत्तर—पढ़ानेवालों के लक्षण—

आत्मज्ञानं समारम्भस्तितिक्षा धर्मनित्यता।

यमर्था नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते॥ १॥

जिसको परमात्मा और जीवात्मा का यथार्थ ज्ञान, जो आलस्य को छोड़कर सदा उद्योगी, सुखदुःखादि का सहन, धर्म का नित्य सेवन करने वाला, जिसको कोई पदार्थ धर्म से छुड़ा कर अधर्म की ओर न खेंच सके, वह ‘पण्डित’ कहाता है॥ १॥

निषेवते प्रशस्तानि निन्दितानि न सेवते।

अनास्तिकः श्रद्दधान एतत् पण्डितलक्षणम्॥ २॥

जो सदा प्रशस्त धर्मयुक्त कर्मों का करने और निन्दित अधर्मयुक्त कर्मों को कभी न सेवनेहारा; जो न कदापि ईश्वर, वेद और धर्म का विरोधी और परमात्मा, सत्यविद्या और धर्म में दृढ़ विश्वासी है, वही मनुष्य ‘पण्डित’ के लक्षणयुक्त होता है॥ २॥

क्षिप्रं विजानाति चिरं शृणोति, विज्ञाय चार्थं भजते न कामात्।

नासंपृष्टो ह्युपयुङ्क्ते परार्थे, तत् प्रज्ञानं प्रथमं पण्डितस्य॥ ३॥

जो वेदादि शास्त्र और दूसरे के कहे अभिप्राय को शीघ्र ही जानने, दीर्घकाल पर्य्यन्त वेदादि शास्त्र और धार्मिक विद्वानों के वचनों को ध्यान देकर सुनके, ठीक-ठीक समझ, निरभिमानी शान्त होकर, दूसरों से प्रत्युत्तर करने; परमेश्वर से लेके पृथिवी पर्य्यन्त पदार्थों को जान के उनसे उपकार लेने में तन, मन, धन से प्रवृत्त होकर काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, शोकादि दुष्टगुणों से पृथक् वर्तमान; किसी के पूछने वा दोनों के संवाद में विना प्रसङ्ग के अयुक्त भाषणादि व्यवहार न करने वाला मनुष्य है, यही पण्डित का प्रथम बुद्धिमत्ता का लक्षण है॥ ३॥

नाप्राप्यमभिवाञ्छन्ति नष्टं नेच्छन्ति शोचितुम्।

आपत्सु च न मुह्यन्ति नराः पण्डितबुद्धयः॥ ४॥

जो मनुष्य प्राप्ति होने के अयोग्य पदार्थों की कभी इच्छा नहीं करते; अदृष्ट वा किसी पदार्थ के नष्ट-भ्रष्ट हो जाने पर शोक करने की अभिलाषा नहीं करते, और बड़े-बड़े दुःखों से युक्त व्यवहारों की प्राप्ति में भी मूढ़ होकर नहीं घबराते हैं, वे मनुष्य पण्डितों की बुद्धि से युक्त कहाते हैं॥ ४॥

प्रवृत्तवाक् चित्रकथ ऊहवान् प्रतिभानवान्।

आशु ग्रन्थस्य वक्ता च यः स पण्डित उच्यते॥ ५॥

जिसकी वाणी सब विद्याओं में चलने वाली, अत्यन्त अद्भुत विद्याओं की कथाओं को करने, विना जाने पदार्थों को तर्क से शीघ्र जानने-जनाने, सुनी-विचारी विद्याओं को सदा उपस्थित रखने और जो सब विद्याओं के ग्रन्थों को अन्य मनुष्यों को शीघ्र पढ़ाने वाला मनुष्य है, वही पण्डित कहाता है॥ ५॥

श्रुतं प्रज्ञानुगं यस्य प्रज्ञा चैव श्रुतानुगा।

असंभिन्नार्य्यमर्य्यादः पण्डिताख्यां लभेत सः॥ ६॥

जिसकी सुनी हुई, और पठित विद्या अपनी बुद्धि के सदा अनुकूल और बुद्धि और क्रिया सुनी पढ़ी हुई विद्याओं के अनुसार, जो धार्मिक श्रेष्ठ पुरुषों की मर्यादा का रक्षक, और दुष्ट डाकुओं की रीति को विदीर्ण करनेहारा मनुष्य है, वही पण्डित नाम धराने के योग्य होता है॥६॥

जहाँ ऐसे-ऐसे सत्पुरुष पढ़ाने और बुद्धिमान् पढ़नेवाले होते हैं वहां विद्या और धर्म की वृद्धि होकर सदा आनन्द ही बढ़ता जाता है और जहां निम्नलिखित मूढ़ पढ़ने-पढ़ानेहारे होते हैं, वहां अविद्या और अधर्म्म की उन्नति होकर दुःख ही बढ़ता जाता है।

प्रश्न—कैसे मनुष्य पढ़ाने और उपदेश करनेवाले न होने चाहियें?

मूर्ख के लक्षण

उत्तर— अश्रुतश्च समुन्नद्धो दरिद्रश्च महामनाः।

अर्थांश्चाकर्म्मणा प्रेप्सुर्मूढ इत्युच्यते बुधैः॥ १॥

जो किसी विद्या को न पढ़, और किसी विद्वान् का उपदेश न सुनकर बड़ा घमंडी, दरिद्र होकर बड़े-बड़े कामों की इच्छा करनेहारा और विना परिश्रम के पदार्थों की प्राप्ति में उत्साही होता है, उसी मनुष्य को विद्वान् लोग मूर्ख कहते हैं॥ १॥

दृष्टान्त

जैसे—एक कोई दरिद्र शेखसेली नामक किसी ग्राम में था। वहां किसी नगर का बनिया दश रुपैये उधार लेकर घी लेने आया था। वह घी लेकर, घड़ा में भर, किसी मजूर के खोज में था। वहां शेखसेली आ निकला। उससे पूछा कि इस घड़े को तीन कोस पर ले जाने की क्या मजूरी लेगा। उसने कहा कि आठ आना। बनिये ने कहा कि चार आना लेना हो तो ले। उसने कहा—अच्छा। शेखसेली घड़ा उठा आगे चला और बनिया पीछे-पीछे चलता हुआ मन में मनोरथ करने लगा कि दश रुपैयों के इस घी के ग्यारह रुपैये आवेंगे। दश रुपैये सेठ को दूँगा, और एक रुपैया घर की पूंजी रहेगी। वैसे ही दश फेरे में दश रुपैये हो जायंगे। इसी प्रकार दश से सौ, सौ से सहस्र, सहस्र से लक्ष, लक्ष से करोड़। फिर करोड़ से सब जगह कोठियां करूंगा, और सब राजा लोग मेरे कर्जदार हो जायंगे। इत्यादि बड़े-बड़े मनोरथ करने लगा।

और शेखसेली ने विचारा कि चार आने की रुई ले सूत कात कर बेचूंगा, आठ आना मिलेगा। फिर आठ आना से एक रुपैया हो जायगा, फिर वैसे ही एक से दो रुपैये होंगे। उनसे एक बकरी लूँगा। जब उसके कच्चे-बच्चे होंगे तब उनको बेच एक गाय लूँगा। उसके कच्चे-बच्चे बेच, एक भैंस लूँगा। उसके कच्चे-बच्चे बेच एक घोड़ी लूँगा। उसके कच्चे-बच्चे बेच एक हथिनी लूँगा और उसके कच्चे-बच्चे बेच दो बीबियां ब्याहूँगा। एक का नाम प्यारी और दूसरी का नाम बेप्यारी रक्खूंगा। जब प्यारी के लड़के गोद में बैठने आवेंगे तब कहूँगा—बच्चे! आओ बैठो, और जब बेप्यारी के लड़के आकर कहेंगे कि हम भी बैठें, तब कहूँगा—ऊँ हूं ऊँ हूं ऊँ हूं, नहीं, नहीं। ऐसा कहकर शिर हिला दिया। घड़ा गिर पड़ा, फूट गया और घी भूमि पर फैल के धूर में मिल गया। बनिया रोने लगा, और शेखसेली भी रोने लगा। बनिया ने शेखसेली को धमकाया कि घी क्यों गिरा दिया, और रोता क्यों है? तेरा क्या नुकसान हुआ?

(शेखसेली) तेरा क्या बिगाड़ हुआ? तू क्यों रोता है?

(बनिया) मैंने दश रुपैये उधार लेकर प्रथम ही घी खरीदा था, उस पर बड़े-बड़े लाभ का विचार किया था। वह मेरा सब बिगड़ गया। मैं क्यों न रोऊं !

(शेखसेली) तेरी तो दश रुपये आदि की ही हानि हुई, मेरा तो घर ही बना बनाया बिगड़ गया। मैं क्यों न रोऊं ?

(बनिया) क्या तेरे रोने से मेरा घी आ जायगा?

(शेखसेली) अच्छा तो तेरे रोने से मेरा घर भी न बन जायेगा। तू बड़ा मूर्ख है।

(बनिया) तू मूर्ख, तेरा बाप।

दोनों आपस में एक दूसरे को मारने लगे। फिर मारपीट कर शेखसेली अपने घर की ओर भाग गया, और उस बनिये ने धूर मिले हुए घी को ठीकरे में उठाकर, अपने घर की राह ली। ऐसे ही स्वसामर्थ्य के विना अशक्य मनोरथ किया करना मूर्खों का काम है और जो विना परिश्रम के पदार्थों की प्राप्ति में उत्साही होता है, उसी मनुष्य को विद्वान् लोग मूर्ख कहते हैं॥ १॥

अनाहूतः प्रविशति अपृष्टो बहु भाषते।

अविश्वस्ते विश्वसिति मूढचेता नराधमः॥ २॥ (महाभारत, उद्योगपर्व, विदुरप्रजागर, अ॰ ३२)

जो विना बुलाये जहां-तहां सभादि स्थानों में प्रवेश कर सत्कार और उच्चासन को चाहे, वा ऐसे रीति से बैठे, कि सब सत्पुरुषों को उसका आचरण अप्रिय विदित हो, विना पूछे बहुत अण्डबण्ड बके और अविश्वासियों में विश्वासी होकर सुखों की हानि कर लेवे, वही मनुष्य मूढ़बुद्धि और मनुष्यों में नीच कहाता है॥ २॥

जहाँ ऐसे-ऐसे मूढ़ मनुष्य पठन-पाठन आदि व्यवहारों को करनेहारे होते हैं, वहाँ सुखों का तो दर्शन कहां? किन्तु दुःखों की भरमार तो हुआ ही करती है। इसलिये बुद्धिमान् लोग ऐसे-ऐसे मूढ़ों का प्रसंग वा इनके साथ पठन-पाठनक्रिया को व्यर्थ समझकर, पूर्वोक्त धार्मिक विद्वानों का प्रसङ्ग, और उन ही से विद्या का अभ्यास किया करें और सुशील बुद्धिमान् विद्यार्थियों ही को पढ़ाया करें।

ये विद्वान् और मूर्ख के लक्षण-विधायक श्लोक विदुरप्रजागर के अध्याय ३२ में एक ही ठिकाने लिखे हैं।

जो विद्या पढ़ें और पढ़ावें वे निम्नलिखित दोषयुक्त न हों—

आलस्यं मदमोहौ च चापल्यं गोष्ठिरेव च।

स्तब्धता चाभिमानित्वं तथाऽत्यागित्वमेव च।

एते वै सप्त दोषाः स्युः सदा विद्यार्थिनां मताः॥

सुखार्थिनः कुतो विद्या नास्ति विद्यार्थिनः सुखम्।

सुखार्थी वा त्यजेद्विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत्सुखम्॥

आलस्य, नशा करना—मूढ़ता, चपलता, व्यर्थ इधर-उधर की अण्डबण्ड बातें करना, जड़ता—कभी पढ़ना कभी न पढ़ना, अभिमान और लोभ-लालच ये सात (७)विद्यार्थियों के लिये विद्या के विरोधी दोष हैं। क्योंकि जिसको सुख-चैन करने की इच्छा है, उसको विद्या कहां, और जिसका चित्त विद्या ग्रहण करने-कराने में लगा है उसको विषयसम्बन्धी सुख-चैन कहां? इसलिये विषयसुखार्थी विद्या को छोड़े, और विद्यार्थी विषयसुख से अवश्य अलग रहें। नहीं तो परमधर्म्म रूप विद्या का पढ़ना-पढ़ाना कभी नहीं हो सकेगा॥ ३-४॥

ये साढे तीन श्लोक भी महाभारत विदुरप्रजागर अध्याय ३९ में लिखे हैं।

प्रश्न—कैसे-कैसे मनुष्य सब विद्याओं की प्राप्ति कर और करा सकते हैं?

उत्तर— ब्रह्मचर्यस्य च गुणं शृणु त्वं वसुधाधिप।

आजन्ममरणाद्यस्तु ब्रह्मचारी भवेदिह॥ १॥

न तस्य किञ्चिदप्राप्यमिति विद्धि नराधिप।

बह्व्यः कोट्यस्त्वृषीणां च ब्रह्मलोके वसन्त्युत॥ २॥

सत्ये रतानां सततं दान्तानामूर्ध्वरेतसाम्।

ब्रह्मचर्यं दहेद्राजन् सर्वपापान्युपासितम्॥ ३॥

भीष्म जी युधिष्ठिर से कहते हैं कि—हे राजन्! तू ब्रह्मचर्य के गुण सुन। जो मनुष्य इस संसार में जन्म से लेके मरणपर्य्यन्त ब्रह्मचारी होता है॥ १॥

उसको कोई शुभगुण अप्राप्त नहीं रहता, ऐसा तू जान कि जिसके प्रताप से अनेक करोड़ों ऋषि और मनुष्य ब्रह्मलोक अर्थात् सर्वानन्दस्वरूप परमात्मा में वास करते और इस लोक में भी अनेक सुखों को प्राप्त होते हैं॥ २॥

जो निरन्तर सत्य में रमण, जितेन्द्रिय, शान्तात्मा, उत्कृष्ट, शुभगुण-स्वभावयुक्त और रोगरहित पराक्रमयुक्त शरीर, ब्रह्मचर्य्य अर्थात् वेदादि सत्यशास्त्र और परमात्मा की उपासना का अभ्यास कर्म्मादि हैं, वे सब बुरे काम और दुःखों को नष्ट कर सर्वोत्तम धर्म्मयुक्त कर्म और सब सुखों की प्राप्ति करानेहारे होते और इन्हीं के सेवन से मनुष्य उत्तम अध्यापक और उत्तम विद्यार्थी हो सकते हैं॥ ३॥

प्रश्न—विद्या पढ़ने और पढ़ाने वालों के विरोधी व्यवहार कौन-कौन हैं?

उत्तर—अशुश्रूषा त्वरा श्लाघा विद्यायाः शत्रवस्त्रयः॥ ४॥

जो विद्या और विद्वानों की सेवा न करना, अतिशीघ्रता और अपनी वा अन्य पुरुषों की प्रशंसा में प्रवृत्त होना है, ये तीन विद्या के शत्रु हैं? इनको पढ़ने और पढ़ानेहारे जो हैं, वे छोड़ दें।

प्रश्न—‘शूरवीर’ किनको कहते हैं?

(उ॰) वेदाऽध्ययनशूराश्च शूराश्चाऽध्ययने रताः।

गुरुशुश्रूषया शूराः पितृशुश्रूषयाऽपरे॥ १॥

मातृशुश्रूषया शूरा भैक्ष्यशूरास्तथाऽपरे।

अरण्ये गृहवासे च शूराश्चाऽतिथिपूजने॥ २॥

जो कोई मनुष्य वेदादि शास्त्रों के पढ़ने-पढ़ाने में शूरवीर, जो दुष्टों के दलन और श्रेष्ठों के पालन में शूरवीर अर्थात् दृढ़ोत्साही उद्योगी, जो निष्कपट, परोपकारक, अध्यापकों की सेवा करके शूरवीर, जो अपने जनक की सेवा करके शूरवीर॥ १॥

जो माता की परिचर्या से शूर, जो संन्यासाश्रम से युक्त अतिथिरूप होकर सर्वत्र भ्रमण करके परोपकार करने के लिये भिक्षावृत्ति में शूर, जो वानप्रस्थाश्रम के कर्म्म और जो गृहाश्रम के व्यवहारों में शूर होते हैं, वे ही सब सुखों के लाभ करने-कराने में अत्युत्तम होके धन्यवाद के पात्र होते हैं, कि जो अपना तन, मन, धन, विद्या और धर्मादि शुभ ग्रहण में सदा उपयुक्त करते हैं॥२॥

प्रश्न—शिक्षा किसको कहते हैं?

उत्तर—जिससे मनुष्य विद्या आदि शुभ गुणों की प्राप्ति और अविद्यादि दोषों को छोड़ के सदा आनन्दित हो सकें, वह शिक्षा कहाती है।

प्रश्न—विद्या और अविद्या किसको कहते हैं?

उत्तर—जिससे पदार्थ का स्वरूप यथावत् जानकर, उससे उपकार लेके, अपने और दूसरों के लिये सब सुखों को सिद्ध कर सकें वह विद्या; और जिससे पदार्थों के स्वरूप को अन्यथा (उलटा)जानकर अपना और पराया अनुपकार कर लेवे, वह अविद्या कहाती है

प्रश्न—मनुष्यों को विद्या की प्राप्ति और अविद्या के नाश के लिये क्या-क्या कर्म करना चाहिये?

उत्तर—वर्णोच्चारण से लेके वेदार्थज्ञान के लिये ब्रह्मचर्य आदि कर्म करना योग्य है।

प्रश्न—ब्रह्मचारी किसको कहते हैं?

उत्तर—जो जितेन्द्रिय होके ब्रह्म अर्थात् वेदविद्या के लिये आचार्य-कुल में जाकर विद्याग्रहण के लिये प्रयत्न करे। वह ब्रह्मचारी कहाता है।

प्रश्न—आचार्य किसको कहते हैं?

उत्तर—जो विद्यार्थियों को अत्यन्त प्रेम से विद्या और धर्मयुक्त व्यवहार की शिक्षा पूर्वक विद्या होने के लिये तन, मन और धन से प्रयत्न करे। उसको ‘आचार्य’ कहते हैं।

प्रश्न—अपने सन्तानों के लिये माता-पिता और आचार्य क्या-क्या शिक्षा करें?

उत्तर— मातृमान् पितृमानाचार्य्यवान् पुरुषो वेद। शतपथब्राह्मण॥

अहोभाग्य उस मनुष्य का है कि जिसका जन्म धार्मिक विद्वान् माता-पिता और आचार्य के सम्बन्ध में हो। क्योंकि इन तीनों ही की शिक्षा से मनुष्य उत्तम होता है। ये अपने सन्तान और विद्यार्थियों को अच्छी भाषा बोलने, खाने, पीने, बैठने, उठने, वस्त्रधारणे, माता-पिता आदि का मान्य करने, उनके सामने यथेष्टाचारी न होने, विरुद्ध चेष्टा न करने आदि के लिये प्रयत्न से नित्यप्रति उपदेश किया करें, और जैसा-जैसा उसका सामर्थ्य बढ़ता जाय, वैसी-वैसी उत्तम बातें सिखलाते जायं। इसी प्रकार लड़के और लड़कियों को पांच वा आठ वर्ष की अवस्था पर्यन्त माता-पिता की और इसके उपरान्त आचार्य की शिक्षा होनी चाहिये।

प्रश्न—क्या माता-पिता जैसी चाहें वैसी शिक्षा करें?

उत्तर—नहीं, जो अपने पुत्र-पुत्री और विद्यार्थियों को सुनावें कि सुन मेरे बेटे-बिटियां और विद्यार्थी! तेरा शीघ्र विवाह करेंगे, तू इसकी डाढ़ी-मूंछ पकड़ ले, इसकी जटा पकड़ ले, इसका जूड़ा पकड़ के ओढ़नी फेंक दे, धौल मार, गाली दे, इसका कपड़ा छीन ले, पगड़ी वा टोपी फेंक दे, खेल, कूद, हँस, रो, तुम्हारे विवाह में फुलवारी निकालेंगे इत्यादि कुशिक्षा करते हैं, उनको माता-पिता और आचार्य न समझने चाहियें, किन्तु सन्तान और शिष्यों के र्पें॑ शत्रु और दुःखदायक हैं। क्योंकि जो बुरी चेष्टा देखकर लड़कों को न घुड़कते और न दंड देते हैं, वे क्योंकर माता, पिता और आचार्य हो सकते हैं। और जो अपने सामने यथा-तथा बकने, निर्लज्ज होने, व्यर्थ चेष्टा करने आदि बुरे कर्मों से हटाकर, विद्या आदि शुभगुणों के लिए उपदेश कर तन, मन, धन लगा के उत्तम विद्या व्यवहार का सेवन कराकर अपने सन्तानों को सदा श्रेष्ठ करते जाते हैं, वे माता, पिता और आचार्य कहाकर धन्यवाद के पात्र हैं।

फिर वे अपने सन्तान और शिष्यों को ईश्वर की उपासना, धर्म, अधर्म, प्रमाण, प्रमेय, सत्य, मिथ्या, पाखण्ड, वेद, शास्त्र आदि के लक्षण, और उनके स्वरूप का यथावत् बोध करा, और सामर्थ्य के अनुकूल उनको वेदशास्त्रों के वचन भी कण्ठस्थ कराकर विद्या पढ़ने, आचार्य के अनुकूल रहने की रीति भी जना देवें कि जिससे विद्या प्राप्ति आदि प्रयोजन निर्विघ्न सिद्ध हों, वे ही माता, पिता और आचार्य कहाते हैं।

प्रश्न—विद्या किस-किस प्रकार और कर्मों से होती है?॥

उत्तर—

चतुर्भिः प्रकारैर्विद्योपयुक्ता भवति। आगमकालेन

स्वाध्यायकालेन प्रवचनकालेन व्यवहारकालेनेति॥ महा॰ अ॰ १। १। १। आ॰ १

विद्या चार प्रकार में काम आती है—आगम, स्वाध्याय, प्रवचन और व्यवहारकाल। आगमकाल उसको कहते हैं कि जिससे मनुष्य पढ़ाने वाले से सावधान होकर, ध्यान देके, विद्यादि पदार्थ ग्रहण कर सकें। स्वाध्याय-काल उसको कहते हैं कि जो पठन समय में आचार्य के मुख से शब्द, अर्थ और सम्बन्धों की बातें प्रकाशित हों, उनको एकान्त में स्वस्थचित्त होकर पूर्वापर विचार के ठीक-ठीक हृदय में दृढ़ कर सकें। प्रवचनकाल उसको कहते हैं कि जिससे दूसरे को प्रीति से विद्याओं को पढ़ा सकना। व्यवहारकाल उसको कहते हैं कि जब अपने आत्मा में सत्यविद्या होती है, तब यह करना, यह न करना है, वह ठीक-ठीक सिद्ध हो के वैसा ही आचरण करना हो सके। ये चार प्रयोजन हैं।

तथा अन्य भी चार कर्म विद्याप्राप्ति के लिये हैं—श्रवण, मनन, निदिध्यासन और साक्षात्कार।

‘श्रवण’ उसको कहते हैं कि आत्मा मन के, और मन श्रोत्र इन्द्रिय के साथ यथावत् युक्त करके अध्यापक के मुख से जो-जो अर्थ और सम्बन्ध के प्रकाश करनेहारे शब्द निकलें, उनको श्रोत्र से मन और मन से आत्मा में एकत्र करते जाना।

‘मनन’ उसको कहते हैं कि जो-जो शब्द, अर्थ और सम्बन्ध आत्मा में एकत्र हुए हैं उनका एकान्त में स्वस्थचित्त होकर विचार करना कि कौन शब्द किस अर्थ के साथ, कौन अर्थ किस शब्द के साथ और कौन सम्बन्ध किस-किस शब्द और अर्थ के साथ सम्बन्ध अर्थात् मेल रखता और इनके मेल में किस प्रयोजन की सिद्धि और उलटे होने में क्या-क्या हानि होती है इत्यादि।

और ‘निदिध्यासन’ उसको कहते हैं कि जो-जो शब्द, अर्थ और सम्बन्ध सुने, विचारे हैं वे ठीक-ठीक हैं वा नहीं? इस बात की विशेष परीक्षा करके दृढ़ निश्चय करना।

और ‘साक्षात्कार’ उसको कहते हैं कि जिन अर्थों के शब्द और सम्बन्ध सुने, विचारे और निश्चय किये हैं, उनको यथावत् ज्ञान और क्रिया से प्रत्यक्ष करके व्यवहारों की सिद्धि से अपना और पराया उपकार करना आदि विद्या की प्राप्ति के साधन हैं।

प्रश्न—आचार्य के साथ विद्यार्थी कैसा-कैसा वर्तमान करें, और कैसा-कैसा न करें?

उत्तर—सत्य बोलें, मिथ्या न बोलें, सरल रहें, अभिमान न करें, आज्ञापालन करें, आज्ञा भंग न करें, स्तुति करें, निन्दा न करें, नीचे आसन पर बैठें, ऊंचे न बैठें, शान्त रहे, चपलता न करें, आचार्य्य की ताड़ना पर प्रसन्न रहें, क्रोध कभी न करें, जब कुछ पूछे, हाथ जोड़ के नम्र होकर उत्तर देवें, घमण्ड से न बोलें, जब वे शिक्षा करें चित्त देकर सुनें, ठट्ठे में न उड़ावें।

शरीर और वस्त्र शुद्ध रक्खें, मैले न रक्खें। जो कुछ प्रतिज्ञा करें उसको पूरी करें। जितेन्द्रिय होवें, लम्पटपन व्यभिचार कभी न करें। उत्तमों का सदा मान्य करें, अपमान कभी न करें। उपकार मान के कृतज्ञ होवें, किसी के अनुपकारी होकर कृतघ्न न होवें। पुरुषार्थी रहें, आलसी कभी न हों, जिस-जिस कर्म से विद्याप्राप्ति हो उस-उस को करते जायं। जो-जो बुरे काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, शोक आदि विद्याविरोधी हों, उनको छोड़कर सदा उत्तम गुणों की कामना करें, बुरे कामों पर क्रोध, विद्याग्रहण में लोभ, सज्जनों में मोह, बुरे कामों से भय, अच्छे काम न होने में शोक सदा करके विद्यादि शुभगुणों से आत्मा और जितेन्द्रिय हो वीर्य आदि धातुओं की रक्षा से शरीर का बल सदा बढ़ाते जायं।

प्रश्न—आचार्य विद्यार्थियों के साथ कैसे वर्त्तें?

उत्तर—जिस प्रकार से विद्यार्थी विद्वान्, सुशील, निरभिमान, सत्यवादी, धर्मात्मा, आस्तिक, निरालस्य, उद्योगी, परोपकारी, वीर, धीर, गम्भीर, पवित्राचरण, शान्तियुक्त, दमनशील, जितेन्द्रिय, ऋजु, प्रसन्नवदन होकर माता, पिता, आचार्य, अतिथि, बन्धु, मित्र, राजा, प्रजा आदि के प्रियकारी हों। जब कभी किसी से बातचीत करें तब जो-जो उसके मुख से अक्षर, पद, वाक्य निकलें उनको शान्त होकर सुनके प्रत्युत्तर देवें। जब कभी कोई बुरी चेष्टा, मलीनता, मैले वस्त्रधारण, बैठने-उठने में विपरीताचरण, निन्दा, ईर्ष्या, द्रोह, विवाद, लड़ाई, बखेड़ा, चुगली, किसी पर मिथ्यादोष लगाना, चोरी, जारी, अनभ्यास, आलस्य, अतिनिद्रा, अतिभोजन, अतिजागरण, व्यर्थ खेलना, इधर-उधर अट्ट-सट्ट मारना, विषयसेवन वा बुरे व्यवहारों की कथा करना वा सुनना, दुष्टों के सङ्ग बैठना आदि दुष्ट व्यवहार करे तो उसको यथाऽपराध कठिन दण्ड देवें। इसमें प्रमाण—

सामृतैः पाणिभिर्घ्नन्ति गुरवो न विषोक्षितैः।

लालनाश्रयिणो दोषास्ताडनाश्रयिणो गुणाः॥ १॥ महाभाष्य अ॰ ८। पा॰ १। सू॰८। आ॰ १॥

आचार्य लोग अपने विद्यार्थियों को विद्या और सुशिक्षा होने के लिए प्रेमभाव से अपने हाथों से ताड़ना करते हैं, क्योंकि सन्तान और विद्यार्थियों का जितना लाड़न करना है उतना ही उनके लिए बिगाड़, और जितनी ताड़ना करनी है, उतना उनके लिये सुधार है, परन्तु ऐसी ताड़ना न करे कि जिससे अंगभंग वा मर्म में लगने से विद्यार्थी लोग व्यथा को प्राप्त हो जायं॥ १॥

प्रश्न—क्यों जी!

पठितव्यं तदपि मर्त्तव्यं, [न पठितव्यं तदपि मर्त्तव्यं], दन्तकटा-कटेति किं कर्त्तव्यम्?

हुड़दङ्गोवाच—हुड़दङ्गा कहता है कि जो पढ़ता है वह भी मरता है, और जो नहीं पढ़ता वह भी मरता है, फिर पढ़ने-पढ़ाने में दाँत कटाकट क्यों करना?

(उत्तर) न विद्यया विना सौख्यं नराणां जायते ध्रुवम्।

अतो धर्मार्थमोक्षेभ्यो विद्याभ्यासं समाचरेत्॥ १॥

सज्जन उवाच—सज्जन कहता है कि सुन भाई हुड़दंगे! जो तू जानता है सो विद्या का फल नहीं कि विद्या के पढ़ने से जन्म-मरण, आंख से देखना, कान से सुनना आदि ये ईश्वरीय नियम अन्यथा हो जायं, किन्तु विद्या से यथार्थज्ञान होकर यथायोग्य व्यवहार करने-कराने से आप और दूसरों को आनन्दयुक्त करना विद्या का फल है। क्योंकि विना विद्या के किसी मनुष्य को निश्चल सुख नहीं हो सकता। क्या भया कि किसी को क्षण भर सुख हुआ, न हुआ-सा है। किसी का सामर्थ्य नहीं है कि जो अविद्वान् होकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के स्वरूप को यथावत् जानकर सिद्ध कर सके। इसलिये सब को उचित है कि इनकी सिद्धि के लिये विद्या का अभ्यास तन, मन, धन से किया और कराया करें॥ १॥

हुड़दंगा—हम देखते हैं कि बहुत से मनुष्य विद्या पढ़े हुए दरिद्र और भीख मांगते तथा विना पढ़े हुए राज्य धन का आनन्द भोगते हैं।

सज्जन—सुनो प्रिय! सुख-दुःख का योग आत्मा में हुआ करता है। जहाँ विद्यारूप सूर्य्य का अभाव और अविद्यान्धकार का भाव है, वहाँ दुःखों की तो भरमार, सुख की क्या ही कथा कहना है! और जहाँ विद्यार्क प्रकाशित होकर अविद्यान्धकार को नष्ट कर देता है, उस आत्मा में सदा आनन्द का योग और दुःख को ठिकाना भी नहीं मिलता है।

हुड़दंगा शिर धुनकर चुप हो गया।

प्रश्न—आचार्य किस रीति से विद्या और सुशिक्षा का ग्रहण करावें और विद्यार्थी लोग करें?

उत्तर—आचार्य समाहित होकर ऐसी रीति से विद्या और सुशिक्षा करें कि जिससे उसके आत्मा के भीतर सुनिश्चित अर्थ होकर, उत्साह ही बढ़ता जाय। ऐसी चेष्टा वा कर्म कभी न करें कि जिसको देख वा करके विद्यार्थी अधर्मयुक्त हो जावें।

दृष्टान्त, हस्तक्रिया, यन्त्र, कलाकौशल विचार आदि से विद्यार्थियों के आत्मा में पदार्थ इस प्रकार साक्षात् करावें कि एक के जानने से हजारों पदार्थ यथावत् जानते जायं। अपने आत्मा में इस बात का ध्यान रक्खें कि जिस-जिस प्रकार से संसार में विद्या धर्माचरण की बढ़ती, और मेरे पढ़ाये मनुष्य अविद्वान् और कुशिक्षित होकर मेरी निन्दा का कारण न हो जायं, कि मैं ही विद्या के रोकने और अविद्या की वृद्धि का निमित्त गिना जाऊं। ऐसा न हो कि सर्वात्मा परमेश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव से मेरे गुण, कर्म, स्वभाव विरुद्ध होने से मुझ को महादुःख भोगना पड़े। धन्य वे मनुष्य हैं, कि जो अपने आत्मा के समान सुख में सुख और दुःख में दुःख अन्य मनुष्यों का जानकर धार्मिकता को कदापि नहीं छोड़ते, इत्यादि उत्तम व्यवहार आचार्य लोग नित्य करते जायं।

विद्यार्थी लोग भी जिन कर्मों से आचार्य की प्रसन्नता होती जाय, वैसे कर्म करें, जिससे उसका आत्मा सन्तुष्ट होकर चाहे कि ये लोग विद्या से युक्त होकर सदा प्रसन्न रहें। रात-दिन विद्या ही के विचार में लगकर एक-दूसरे के साथ प्रेम से परस्पर विद्या को बढ़ाते जावें। जहाँ विषय वा अधर्म की चर्चा भी होती हो, वहाँ कभी खडे़ भी न रहें। जहाँ-जहाँ विद्यादि व्यवहार और धर्म का व्याख्यान होता हो, वहाँ से अलग कभी न रहें। भोजन छादन ऐसी रीति से करें कि जिससे कभी रोग, वीर्यहानि वा प्रमाद न बढ़े। जो-जो बुद्धि के नाश करनेहारे नशा के पदार्थ हों उनको ग्रहण कभी न करें, किन्तु जो-जो ज्ञान बढ़ाने और रोग-नाश करनेहारे पदार्थ हों, उन का सेवन सदा किया करें। नित्यप्रति परमेश्वर का ध्यान, योगाभ्यास, बुद्धि का बढ़ाना, सत्य धर्म की निष्ठा और अधर्म का सर्वथा त्याग करते रहें। जो-जो पढ़ने में विघ्नरूप कर्म हों उनको छोड़कर पूर्ण विद्या की प्राप्ति करें, ये दोनों के गुण कर्म हैं।

प्रश्न—सत्य और असत्य का निश्चय किस प्रकार से होता है? क्योंकि जिसको एक सत्य कहता है, दूसरा उसी को मिथ्या बतलाता है, उसके निर्णय करने में क्या-क्या निश्चित साधन हैं?

उत्तर—पांच हैं—

उनमें से प्रथम—ईश्वर, उसके गुण, कर्म, स्वभाव और वेदविद्या।

दूसरा—सृष्टिक्रम।

तीसरा—प्रत्यक्षादि आठ प्रमाण।

चौथा—आप्तों का आचार, उपदेश, ग्रन्थ और सिद्धान्त।

और पांचवाँ—अपने आत्मा की साक्षी, अनुकूलता, जिज्ञासुता, पवित्रता और विज्ञान।

१ ईश्वरादि से परीक्षा करना उसको कहते हैं कि जो-जो ईश्वर, ईश्वर के न्याय आदि गुण पक्षपातरहित, सृष्टि बनाने का कर्म और सत्य, न्याय, दयालुता, परोपकारिता आदि स्वभाव और वेदोपदेश से सत्य और धर्म ठहरे वही सत्य और धर्म; और जो-जो असत्य और अधर्म ठहरे, वही असत्य और अधर्म है। जैसे कोई कहे कि विना कारण और कर्त्ता के कार्य होता है, सो सर्वथा मिथ्या जानना। इससे यह सिद्ध होता है कि जो सृष्टि की रचना करनेहारा पदार्थ है वही ईश्वर और उसके गुण कर्म स्वभाव वेद और सृष्टिक्रम से ही निश्चित जाने जाते हैं।

२ सृष्टिक्रम उसको कहते हैं कि जो-जो सृष्टिक्रम अर्थात् सृष्टि के गुण, कर्म और स्वभाव से विरुद्ध हो वह मिथ्या और अनुकूल हो वह सत्य कहाता है। जैसे कहे कि विना मा-बाप के लड़का, कान से देखना, आंख से बोलना आदि होता वा हुआ है। ऐसी-ऐसी बातें सृष्टिक्रम से विरुद्ध होने से मिथ्या और माता-पिता से सन्तान, कान से सुनना और आंख से देखना, आदि सृष्टिक्रम के अनुकूल होने से सत्य ही हैं।

३ प्रत्यक्ष आदि आठ प्रमाणों से परीक्षा करना उसको कहते हैं कि जो-जो प्रत्यक्षादि प्रमाणों से ठीक-ठीक ठहरे, वह सत्य और जो-जो विरुद्ध ठहरे वह मिथ्या समझना चाहिये। जैसे किसी ने किसी से कहा कि यह क्या है? दूसरे ने कहा कि पृथिवी, यह प्रत्यक्ष। इसको देखकर इसके कारण का निश्चय करना यह अनुमान। जैसे विना बनानेहारे के घर नहीं बन सकता, वैसा ही सृष्टि का बनानेहारा ईश्वर भी बड़ा कारीगर है, यह दृष्टान्त उपमान। सत्योपदेष्टाओं का उपदेश शब्द। भूतकालस्थ पुरुषों की चेष्टा, सृष्टि आदि पदार्थों की कथा ऐतिह्य। एक बात सुनकर दूसरी बात को विना सुने-कहे, प्रसङ्ग से जान लेना यह अर्थापत्ति। कारण से कार्य होना आदि को सम्भव। और आठवां अभाव अर्थात् किसी ने किसी से कहा कि जल ले आ। उसने वहाँ जल के अभाव को जानकर तर्क से जाना कि जहाँ जल है वहाँ से ले आके देना चाहिए, यह अभाव प्रमाण कहाता है। इन आठ प्रमाणों से जो-जो विपरीत न हो, वह-वह सत्य और जो-जो उलटा हो वह-वह मिथ्या है।

४ आप्तों के आचार और सिद्धान्त से परीक्षा करना उसको कहते हैं कि जो सत्यवादी, सत्यकारी, सत्यमानी, पक्षपातरहित, सब के हितैषी, विद्वान् सब के सुख के लिए प्रयत्न करें वे धार्मिक लोग आप्त कहाते हैं। जो-जो उनके उपदेश, आचार, ग्रन्थ और सिद्धान्त से युक्त हो वह-वह सत्य और जो-जो विपरीत हो वह-वह असत्य है।

५ आत्मा से परीक्षा उसको कहते हैं कि जो-जो अपना आत्मा अपने लिए चाहे, सो सब के लिए चाहना और जो-जो न चाहे, सो-सो किसी के लिए न चाहना। जैसा आत्मा में वैसा मन में, जैसा मन में वैसा क्रिया में होने को, जानने जनाने की इच्छा, शुद्ध भाव और विद्या के नेत्र से देखके सत्य और असत्य का निश्चय करना चाहिये।

इन पांच प्रकार की परीक्षाओं से पढ़ाने और पढ़नेहारे तथा सब मनुष्य सत्याऽसत्य का निर्णय करके धर्म का ग्रहण और अधर्म का परित्याग करें और करावें॥

प्र्रश्न—धर्म और अधर्म किसको कहते हैं?

उत्तर—जो पक्षपात रहित न्याय, सत्य का ग्रहण, असत्य का परित्याग, पांचों परीक्षाओं के अनुकूल आचरण, ईश्वराज्ञा का पालन, परोपकार करना रूप धर्म, और जो इससे विपरीत वह अधर्म कहाता है। क्योंकि जो सब के अविरुद्ध वह धर्म और जो परस्पर विरुद्धाचरण, सो अधर्म क्योंकर न कहावेगा? देखो! किसी ने किसी से पूछा कि सत्य क्या है? उसने उत्तर दिया जो मैं मानता हूँ। उससे उसने पूछा कि जो वह मानता है वा जो मैं मानता हूँ वह क्या है? उसने कहा कि अधर्म है। यही पक्षपात से मिथ्या और विरुद्धाचार अधर्म का स्वरूप है। और जब तीसरे ने दोनों से पूछा कि सत्य बोलना धर्म अथवा असत्य? तब दोनों ने उत्तर दिया कि सत्य बोलना धर्म और असत्य बोलना अधर्म है, इसी का नाम धर्म जानो। परन्तु यहां पांच परीक्षा की युक्ति से सत्य और असत्य का निश्चय करना योग्य है॥

प्रश्न—जब-जब सभा आदि व्यवहारों में जायं, तब-तब कैसे-कैसे वर्त्तें?

उत्तर—जब सभा में जावे, तब दृढ़ निश्चय कर लेवे कि मैं सत्य को जिता और असत्य को हराऊंगा। अभिमान न करे। अपने को बड़ा न माने। अपनी बात का कोई खण्डन करे, उस पर क्रुद्ध वा अप्रसन्न न हो। जो कोई कहे उसके वचन को ध्यान देकर सुन के जो उसमें कुछ असत्य भान हो तो उस अंश का खण्डन अवश्य करे और जो सत्य हो तो प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करे। बड़ाई-छोटाई न गिने। व्यर्थ बकवाद न करे। कभी मिथ्या का पक्ष न करे और सत्य को कदापि न छोड़े। ऐसी रीति से बैठे वा उठे कि जिससे किसी को बुरा विदित न हो। सर्वहित पर दृष्टि रक्खे। जिससे सत्य की बढ़ती और असत्य का नाश हो, उसको करें। सज्जनों का संग करे और दुष्टों से अलग रहे। जो-जो प्रतिज्ञा करें वह-वह सत्य से विरुद्ध न हो और उसको सर्वदा यथावत् पूरी करें। इत्यादि कर्म सब सभा आदि व्यवहारों में करे।

प्रश्न—जड़बुद्धि और तीव्रबुद्धि किसको कहते हैं?

उत्तर—जो आप तो समझ ही न सके परन्तु दूसरे के समझाने से भी न समझे, वह जड़बुद्धि और जो समझाने से झटपट समझे और थोड़े से समझाने से बहुत समझ जावे, वह तीव्रबुद्धि कहाता है।

यहाँ महाजड़ और विद्वान् का दृष्टान्त सुनो। कहीं एक रामदास वैरागी का चेला गोपालदास पाठ करता-करता कुएँ पर पानी भरने को गया। वहाँ एक पण्डित बैठा था। उसने अशुद्ध पाठ सुनकर कहा कि तू “स्री गनेसाजनम” ऐसा घोखता है सो शुद्ध नहीं है, किन्तु “श्रीगणेशाय नमः” ऐसा शुद्ध पाठ कर। तब वह बोला कि मेरे महन्त जी बड़े पण्डित हैं। उनने जैसा मुझको सुनाया है वैसा ही घोखूंगा। वह पानी भरकर अपने गुरु के पास जाके कहा कि महाराज जी! एक बम्मन् मेरे पाठ को असुद्ध बतलाता है। तब खाखी जी ने चेलों से कहा कि उस बम्मन् को यहां बुला लाओ। वह गुरु की लण्डी मेरे चेले को क्यों बहकाता और सुद्ध का असुद्ध क्यों बतलाता है? चेला गया, पण्डितजी को बुला लाया। पण्डित से महन्त बोले कि इसके कितने प्रकार के पाठ तू जानता है? पण्डित ने कहा कि एक प्रकार का।

महन्त जी ने कहा कि तू कुछ भी नहीं जानता। देख, मैं तीन प्रकार का पाठ जानता हूँ। स्री गनेसाजनम। स्री गनेशापनम। स्री गनेसायनम।

पण्डित—महन्तजी! तुम्हारे पाठ में पांच दोष हैं। प्रथम श का स। ण का न। शा का सा। य का ज-प बोलना; और विसर्जनीय का न बोलना पांच अशुद्ध हैं।

महन्तजी बोले—चल बे, गुरु के बड़े घर में सब सुद्ध है। पण्डित चुपकर चले आये, क्योंकि “सर्वस्यौषधमस्ति शास्त्रकथितं मूर्खस्य नास्त्यौषधम्” सबका औषध शास्त्र में कहा है परन्तु शठ मनुष्यों का ओषध कोई भी नहीं। ऐसे हठी मनुष्यों से अलग रहें; परन्तु जो वे सुधरा चाहें तो विद्वान् उपदेश करके उनको अवश्य सुधारें।

प्रश्न—जो माता, पिता, आचार्य और अतिथि अधर्म करें और कराने का उपदेश करें तो मानना चाहिए वा नहीं?

उत्तर—कदापि नहीं। कुमाता, कुपिता सन्तानों को बुरे उपदेश करते हैं कि बेटा! बिटिया! तेरा विवाह शीघ्र कर देंगे, किसी की चीज पावे, उठा लाना। कोई एक गाली दे तो उसको तू पचास गाली देना। लड़ाई, झगड़ा, खेल, चोरी, जारी, मिथ्याभाषण, भांग, मद्य, गांजा, चरस, अफीम खाना-पीना आदि कर्म्म करने में कुछ भी दोष नहीं, क्योंकि अपनी कुलपरम्परा है। सुनो प्रमाण—“कुलधर्मः सनातनः” जो कुल में धर्म पहिले से चला आता है, उसके करने में कुछ भी दोष नहीं।

सुसन्तान बोले—जो-जो तुमने शीघ्र विवाह करना, किसी की चीज उठा लाना आदि कर्म्म कहे, वे दुष्ट मनुष्यों के काम हैं, श्रेष्ठों के नहीं। किन्तु श्रेष्ठ तो ब्रह्मचर्य से पूर्ण विद्या पढ़कर स्वयंवर अर्थात् पूर्ण युवा अवस्था में दोनों की प्रसन्नतापूर्वक विवाह करना, किसी की करोड़ों की चीज जंगल में भी पड़ी देखकर कभी ग्रहण करने की मन में भी इच्छा न करना, आदि कर्म्म किया करते हैं। जो-जो तुम्हारे उत्तम कर्म्म और उपदेश हैं, उन-उनको तो हम ग्रहण करते हैं अन्य को नहीं। परन्तु तुम कैसे ही हो। हमको तन, मन, धन से तुम्हारी सेवा करना परमधर्म्म है, क्योंकि जैसी तुमने बाल्यावस्था में हमारी सेवा की है वैसी तुम्हारी सेवा हम क्यों न करें?

कुसन्तान आह—श्रेष्ठ माता, पिता, आचार्य, अतिथियों से अभागिये सन्तान कहते हैं कि हमको खूब खिलाओ, पिलाओ, खेलने दो, हमारे लिये कमाया करो, जब तुम मर जाओगे, तब हम ही को सब काम करना पड़ेगा। शीघ्र विवाह कर दो, नहीं तो हम इधर-उधर लीला करें हीगें। बाग में जाके नाच-तमाशे करेंगे वा भाग जायंगे वा वैरागी हो जायंगे। पढ़ने में बड़ा कष्ट होता है, हमको पढ़के क्या करना है। क्योंकि हमारी सेवा करने वाले तुम तो बने ही हो। हमको सैल-सपट्टा, सवारी, शिकारी, नाच, तमाशे, खाने, पीने, ओढ़ने, पहरने के लिये खूब दिया करो, नहीं तो जब हम जवान होंगे तब तुमको समझ लेंगे। “दण्डादण्डि, नखानखि, केशाकेशि, मुष्टामुष्टि, युद्धमेव भविष्यत्यन्यत्किम्”। ऐसे-ऐसे सन्तान दुष्ट कहाते हैं।

उत्तम माता आदि कहते हैं कि सुनो लड़को! अभी तुम्हारी पढ़ने, गुणने, सत्संग करने, अच्छी-अच्छी बात सीखने, वीर्य-निग्रहण करने; आचार्य आदि की सेवा कर विद्वान् होने, शरीर और आत्मा की पूर्ण युवा अवस्था आदि उत्तम कर्म करने की अवस्था है। जो चूकोगे तो फिर पछतावोगे। पुनः ऐसा समय तुमको मिलना अति कठिन है, क्योंकि जब तक हम घर का और तुम्हारे खाने-पीने आदि का प्रबन्ध करने वाले हैं, तब तक तुम सुशिक्षाग्रहणपूर्वक सर्वोत्कृष्ट विद्या रूपी धन को संचित करो। यही अक्षय धन है कि जिसको चोर आदि न ले सकते, न भार होता और जितना दान करो उतना ही अधिक-अधिक बढ़ता जाता है। इससे युक्त होकर जहाँ रहोगे वहाँ सुखी और प्रतिष्ठा पाओगे। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के सम्बन्धी कर्म्मों को जानकर सिद्ध कर सकोगे। हम जब तुमको विद्यारूप श्रेष्ठगुणों से अलंकृत देखेंगे, तभी हमको परम सन्तोष होगा और जो तुम कोई दुष्ट काम करोगे तो हम अपना भी अभाग्य समझ लेंगे। क्योंकि हमारे कौन से पापों के फल से हमको दुष्ट सन्तान मिले। क्या तुम नहीं देखते कि जिन मनुष्यों को राज्य धन प्राप्त भी है परन्तु वे विद्या और उत्तम शिक्षा से विना नष्ट-भ्रष्ट हो जाते और श्रेष्ठ विद्या सुशिक्षा से युक्त दरिद्र भी राज्य और ऐश्वर्य को प्राप्त होते हैं। तुमको चाहिये कि—

यान्यस्माकᳬ सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि नो इतराणि॥ १॥ तैत्तिरीयारण्यके प्रपाठके ७। अनुवाके ११

जो-जो हमारे उत्तम चरित्र हैं सो-सो करो और जो कभी हम भी बुरे काम करें, उनको कभी मत करो। इत्यादि उत्तम उपदेश और कर्म करने और कराने हारे माता, पिता और आचार्य आदि श्रेष्ठ कहाते हैं।

प्रश्न—राजा, प्रजा और इष्ट मित्र आदि के साथ कैसा-कैसा व्यवहार करें?

उत्तर—राजपुरुष प्रजा के लिए सुमाता और सुपिता के समान, और प्रजापुरुष राजसम्बन्ध में सुसन्तान के सदृश वर्त्तकर परस्पर आनन्द बढ़ावें। मित्र, मित्र के साथ सत्य व्यवहारों के लिए आत्मा के समान प्रीति से वर्त्तें, परन्तु अधर्म्म के लिए नहीं। पड़ौसी पड़ौसी के साथ ऐसा वर्त्तमान करें कि जैसा अपने शरीर के लिए करते हैं। वैसे ही मित्रादि के लिए भी कर्म किया करें। स्वामी सेवक के साथ ऐसे वर्त्तें कि जैसा अपने हस्तपादादि अंगों की रक्षा के लिये वर्त्तते हैं। सेवक स्वामियों के लिये ऐसे वर्त्तें कि जैसे अन्न, जल, वस्त्र और घर आदि शरीर की रक्षा के लिए होते हैं।

प्रश्न—ब्रह्मचर्य का क्या-क्या नियम है?

उत्तर—कम से कम पच्चीस २५ वर्ष पर्यन्त पुरुष और सोलह वर्ष पर्यन्त कन्या को ब्रह्मचर्य सेवन अवश्य करना चाहिये और अड़तालीसवें वर्ष से अधिक पुरुष और चौबीस से अधिक कन्या ब्रह्मचर्य का सेवन न करें किन्तु इसके उपरान्त गृहाश्रम का समय है॥

प्रश्न—प्रमादी ब्रूते—पागल मनुष्य कहता है कि सुनो जी! कन्याओं का पढ़ना शास्त्रोक्त नहीं, क्योंकि जब वे पढ़ जावेंगी तो मूर्ख पति का अपमान कर इधर-उधर पत्र भेजकर, अन्य पुरुषों से प्रीति जमा के व्यभिचार किया करेंगी।

उत्तर—सज्जनः समाधत्ते—श्रेष्ठ मनुष्य उसको उत्तर देता है। सुनो जी! तुम्हारे कहने से यह आया कि किसी पुरुष को भी न पढ़ना चाहिये, क्योंकि वह भी पढ़कर मूर्ख स्त्री का अपमान और डाकगाड़ी चलाकर इधर-उधर अन्य स्त्रियों के साथ सैल-सपाटा किया करेगा।

प्रश्न—प्रमादी—हां। पुरुष भी न पढ़ें तो अच्छी बात है, क्योंकि पढ़े भए मनुष्य चतुराई से दूसरों को धोखा देकर, अपमान करके अपना मतलब सिद्ध कर लेते हैं।

उत्तर—सज्जन—सुनो जी! यह विद्या पढ़ने का दोष नहीं, किन्तु आप जैसे मनुष्यों के सङ्ग का दोष है, और जो पढ़ना-पढ़ाना धर्म और ईश्वर की विद्या से रहित है, सो तो प्रायः बुरे काम का कारण देखने में आता और जो पढ़ना-पढ़ाना उक्त विद्या से सहित है, वह तो सबके सुख और उपकार ही के लिये होता है।

प्रश्न—कन्याओं के पढ़ने में वैदिक प्रमाण कहां है?

उत्तर—सुनो प्रमाण—

ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम्॥ — अथर्ववेद कां॰ ११। अ॰३। सू॰ ५। मं १८

अर्थ—जैसे लड़के लोग ब्रह्मचर्य करते हैं, वैसे कन्या लोग ब्रह्मचर्य करके वर्णोच्चारण से लेकर वेदपर्यन्त शास्त्रों को पढ़कर, प्रसन्न करके, स्वेच्छा से पूर्ण युवा अवस्थावाले व

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