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अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा॥१०॥

In Hindi:

पदपाठ : अभाव प्रत्यय आलम्बना वृत्तिः निद्रा॥

हिंदी में अर्थ : (अभाव) अभाव = शून्यता = जाग्रत और स्वप्न अवस्था विषयक वृत्तियों के ज्ञान के अभाव रूप (प्रत्यय) अज्ञान रूप प्रतीति का ही (आलम्बना) आलम्बन = आश्रय बनाने वाली (वृत्तिः) तमोगुण प्रधान वृत्ति (निद्रा) निद्रा है।

महर्षि दयानन्द व्याख्या : “चौथी (निद्रा) अर्थात् जो वृत्ति अज्ञान और अविद्या के अन्धकार में हो, उस वृत्ति का नाम निद्रा है।” (ऋ० भू॰ उपासनाविषय)

प्राचीन ॠषि भाष्य : सा च सम्प्रबोधे प्रत्यवमर्शात् प्रत्ययविशेषः। कथम्? सुखमहमस्वाप्सम्। प्रसन्नं मे मनः प्रज्ञां मे विशारदीकरोति। दुःखमहमस्वाप्सं स्त्यानं मे मनो भ्रमत्यनवस्थितम्। गाढं मूढोऽहमस्वाप्सम्। गुरूणि मे गात्राणि। क्लान्तं मे चित्तम्। अलसं मुषितमिव तिष्ठतीति। स खल्वयं प्रबुद्धस्य प्रत्यवमर्शो न स्यादसति प्रत्ययानुभवे। तदाश्रिताः स्मृतयश्च तद्विषया न स्युः। तस्मात् प्रत्ययविशेषो निद्रा। सा च समाधावितरप्रत्ययवन्निरोद्धव्येति॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (सा च) और वह निद्रा (सम्प्रबोधे) से जागने पर (प्रत्यवमर्शात्) स्मरण होने के कारण (प्रत्ययविशेषः) एक प्रकार का ज्ञान = अनुभव अथवा प्रतीतिविशेष है। (कथम्) यह ज्ञान किस प्रकार का होता है ? जागने पर (अहम्) मैं (सुखम्) सुखपूर्वक (अस्वाप्सम्) सोया, क्योंकि (मे मनः) मेरा मन (प्रसन्नम्) प्रसन्न है, और (प्रज्ञाम् मे) मेरी बुद्धि को (विशारदीकरोति) निर्मल = विकसित कर रहा है। (यह सात्त्विक निद्रा हुई); अथवा (अहम्) मैं (दुःखम्) दुःखपूर्वक (अस्वाप्सम्) सोया, क्योंकि (मे मनः) मेरा मन (स्त्यानम्) अकर्मण्य = अलसाया हुआ है और (भ्रमत्यनवस्थितम्) चञ्चल अथवा विकल होकर भ्रमित् हो रहा है। (यह राजसिक निद्रा हुई); अथवा (गाढम्) गाढ निद्रा में (अहम्) मैं (मूढः) मूढ होकर (अस्वाप्सम्) सोया, क्योंकि (मे गात्राणि) मेरे अंग (गुरूणि) भारी हो रहे हैं, और (मे चित्तम्) मेरा चित्त = मन (क्लान्तम्) थका हुआ है और (अलसम्) अलसाया एवम् (मुषितम् इव तिष्ठति) खोया - खोया सा है (यह तामसिक निद्रा हुई); (इति) इस प्रकार की स्मृतियाँ हैं। (असति प्रत्ययानुभवे) यदि निद्रावस्था = सुषुप्ति अवस्था में उपरोक्त प्रकार की प्रतीति = अनुभव = ज्ञान को वृत्ति न माना जाये तो (स खलु अयम् प्रबुद्धस्य) उस जागे हुए मनुष्य को (प्रत्यवमर्शो) इस प्रकार का स्मरण (न स्यात्) नहीं होना चाहिए (च) और (तदाश्रिताः) निद्रा = सुषुप्ति के अनुभव जन्य ज्ञान के आश्रित रहने वाली (स्मृतयः) स्मृतियाँ भी (तद्विषया) अनुभवात्मक ज्ञान के विषय में (न स्युः) नहीं होनी चाहिए। (तस्मात्) इस कारण (निद्रा) निद्रा वृत्ति (प्रत्ययविशेषो) एक विशेष प्रकार का ज्ञान = वृत्ति है। (सा च) और वह निद्रा वृत्ति भी (समाधौ) समाधि में (इतर प्रत्ययवत्) अन्य प्रमाण आदि वृत्तियों के समान (निरोद्धव्या इति) निरोध करने योग्य है।

वैदिक वृत्ति : प्रमाण वृत्ति में वस्तुओं की यथार्थता (सद् रूप), विपर्यय वृत्ति में वस्तुओं की अयथार्थता (असद् रूप), विकल्प वृत्ति में सद्-असद् वस्तु रूप से रहित कल्पित मात्र व्यवहार होता है। किन्तु निद्रा में इनसे विलक्षण अभाव मात्र प्रतीति का आश्रय होने से यह उनसे भिन्न वृत्ति है। निद्रा तमोगुण प्रधान वृत्ति है जिसे सुषुप्ति कहा जाता है। जाग्रत काल में ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ तथा अन्तःकरण चेतनभाव से चेष्ठा करते हैं। स्वप्नकाल में ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ निश्चेष्ठ रहती हैं, और केवल अन्तःकरण (चेतनाधिष्ठान) सक्रिय रहता है। सुषुप्ति में समस्त इन्द्रियाँ तथा चेतनाधिष्ठान सर्वथा निश्चेष्ठ रहते हैं। अतः इन्द्रियों और मन से होने वाले अनुभवों का उस अवस्था में सर्वथा अभाव रहता है। इस प्रकार ज्ञान के अभाव की प्रतीति भी एक प्रकार का ज्ञान है जो सुषुप्ति अवस्था में होता है।

आगे की व्याख्या समझने से पूर्व सुषुप्ति के वास्तविक स्वरूप को समझना होगा। माण्डूक्योपनिषद् में ऋषि कहता है — “यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत्सुषुप्तम्।” (माण्डूक्य० ५) अर्थात् — (यत्र) जिस अवस्था में (सुप्तः) सोया हुआ (न कञ्चन कामं कामयते) किसी भी विषय को नहीं चाहता (न कञ्चन स्वप्नं पश्यति) न किसी स्वप्न को देखता = विचार को अनुभव करता (तत्सुषुप्तम्) वह सुषुप्ति अवस्था कहलाती है। अर्थात् सांसारिक विषयों से असम्बद्ध हुई, स्वप्नरहित निद्रा की अवस्था सुषुप्ति कहलाती है।

महर्षि कपिल ने सांख्यदर्शन में समाधिसुषुप्तिमोक्षेषु ब्रह्मरूपता॥ ५.११६॥ कहकर समाधि, सुषुप्ति और मोक्ष की अवस्था में समानता दिखाई है। यहाँ शंका होती है कि निद्रा = सुषुप्ति की अवस्था में सांसारिक सुख-दुःख का अभाव होने से इसे वृत्तिरूप में मानना उचित नहीं है? इस का निराकरण करने हेतु महर्षि पतञ्जलि ने इसे विशेष रूप से “वृत्ति” सूत्र में कहा है; और महर्षि व्यास ने इसका भी अन्य वृत्तियों के समान निरोध करने को कहा है। इसका मुख्य कारण यह है कि यह अवस्था, सत्त्वगुण और रजोगुण के अभिभूत रहने के कारण, तमोरूपा = तमःप्रधान होती है।

जिस प्रकार सम्प्रज्ञात समाधि में राजसिक और तामसिक वृत्तियों का तथा असम्प्रज्ञात समाधि में सर्ववृत्ति निरोध होता है और मोक्ष की अवस्था में वृत्तियों का प्रश्न ही नहीं होता; उस प्रकार से निद्रा में नहीं होता, क्योंकि निद्रा से जागने पर स्मरण होने के कारण एक प्रकार का अनुभव अथवा ज्ञान विशेष होता है। उस निद्रा की अवस्था में निम्न प्रकार के अनुभव होते हैं —

१. जब निद्रा में रजोगुण के दबने के साथ सत्त्वगुण का कुछ उभार होता है तब जागने पर व्यक्ति कहता है “मैं सुखपूर्वक सोया क्योंकि मेरा मन प्रसन्न है और मेरी बुद्धि को विकसित कर रहा है।”; (यह सत्त्वगुण प्रधान निद्रा कहलाती है।) और

२. जब निद्रा में सत्त्वगुण के दबने के साथ रजोगुण का कुछ उभार होता है तब जागने पर व्यक्ति कहता है “मैं दुःखपूर्वक सोया क्योंकि मेरा मन भ्रमित् है, चञ्चल है, अलसाया हुआ है।” (यह रजोगुण प्रधान निद्रा कहलाती है।) और

३. जब निद्रा में सत्त्वगुण और रजोगुण दोनों ही दबे रहते और तमोगुण का ही उभार रहता है तब जागने पर व्यक्ति कहता है “मैं मूढ होकर सोया क्योंकि मेरे शरीर के अंग भारी, मन थका हुआ और खोया-खोया सा है।” (यह तमोगुण प्रधान निद्रा कहलाती है।)

अगर निद्रावस्था = सुषुप्ति अवस्था को पृथक् से वृत्ति न माना जाये, तो व्यक्ति को जागने पर उपरोक्त प्रकार की स्मृतियाँ होनी ही नहीं चाहिए। क्योंकि किसी प्रकार का अनुभव हुए बिना उस प्रकार की स्मृति हो ही नहीं सकती। यदि सुषुप्ति अवस्था में स्वस्वरूप तथा अज्ञान का अनुभव वृत्तिरूप में स्वीकार न किया जाए तो जाग्रत अवस्था में ऐसी सारी स्मृतियाँ नहीं मानी जा सकती। अतः यह स्मृति, अनुभव के बिना सम्भव न होने से, सुषुप्ति अवस्था को वृत्ति रूप में सिद्ध करती है।

निद्रा वृत्ति रूप में सिद्ध होने से ही समाधि काल में इसके निरोध का विशेष विधान किया गया है, क्योंकि यह वृत्ति भी समाधि की विरोधी है। इसका निरोध भी अन्य वृत्तियों के समान यत्नपूर्वक करना चाहिए। निद्रा वृत्ति में एक प्रकार की एकाग्रता होने पर भी तमोगुण प्रधान अवस्था (मूढ अवस्था) होने से यह सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात, दोनों समाधियों की विरोधी होने के कारण इसका निरोध अत्यावश्यक कहा गया है। परन्तु व्यवहार काल में, निद्रा व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिए परमावश्यक होने के कारण, इसका सर्वथा निरोध सम्भव नहीं है।

सुषुप्ति की तुलना समाधि से की जाती है। सुषुप्ति अवस्था में इन्द्रियों तथा चेतनाधिष्ठान के निष्क्रिय होने के कारण क्रियाशीलता अवरुद्ध हो जाती है, और इस अवस्था में एक प्रकार की स्थिरता आ जाती है। परन्तु यह स्थिरता तमोगुण प्रधान होने के कारण समाधि काल की स्थिरता से सर्वथा भिन्न है। निद्रा को ज्ञान रहित, अस्वच्छ स्थिरता कहा है; परन्तु दूसरी ओर समाधि ज्ञान सहित, स्वच्छ स्थिरता होती है।