Donation Appeal Download Our App
Choose Sutra

ईश्वरप्रणिधानाद्वा॥२३॥

In Hindi:

पदपाठ : ईश्वरप्रणिधानात् वा॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : किमेतस्मादेवासन्नतमः समाधिर्भवति ? अथास्य लाभे भवत्यन्योऽपि कश्चिदुपायो न वेति—

भूमिका हिंदी अर्थ : (किम्) क्या (एतस्मात् एव) इन तीव्रसंवेग आदि से ही (आसन्नतमः) अत्यन्त शीघ्र (समाधिः) असम्प्रज्ञात समाधि (भवति) होती है ? (अथ) अथवा (अस्य लाभे) इस समाधि की सिद्धि में (अन्यः अपि) अन्य भी (कश्चित्) कोई (उपायः) उपाय (भवति) है (न वा इति) या नहीं ? इस विषय में कहते हैं —

हिंदी में अर्थ : (वा) और (ईश्वरप्रणिधानात्) ईश्वर प्रणिधान = ईश्वर की भक्तिविशेष होने से भी समाधि की सिद्धि और समाधिफल की प्राप्ति शीघ्रतम होती है॥

महर्षि दयानन्द व्याख्या : “तथा उस समाधि के योग होने का यह भी साधन है कि (ईश्वरप्र०) ईश्वर में विशेषभक्ति होने से मन का समाधान होके मनुष्य समाधियोग को शीघ्र प्राप्त हो जाता है।” (ऋ० भू॰ उपासनाविषय)

प्राचीन ॠषि भाष्य : प्रणिधानाद्भक्तिविशेषादावर्त्तित ईश्वरस्तमनुगृह्णात्यभिध्यानमात्रेण। तदभिध्यानमात्रादपि योगिन आसन्नतमः समाधिलाभः समाधिफलं च भवतीति॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (प्रणिधानात्) प्रणिधान से अर्थात् (भक्तिविशेषात्) भक्तिविशेष से (आवर्त्तितः) अभिमुख किया हुआ = अङ्गीकार किया हुआ (ईश्वरः) ईश्वर (तम्) उस योगी को (अभिध्यानमात्रेण) सङ्कल्पमात्र से ही (अनुगृह्णाति) अनुग्रहीत करता है।

(तत् अभिध्यानमात्रात्) उस ईश्वर की सङ्कल्प द्वारा अनुग्रह = अनुकम्पा से (अपि) भी (योगिनः) योगियों को (समाधिलाभः) समाधि का लाभ = सिद्धि (च) और (समाधिफलम्) समाधि का फल (आसन्नतमः) अत्यन्त शीघ्र (भवति इति) प्राप्त होता है॥

वैदिक वृत्ति : असम्प्रज्ञात समाधि की सिद्धि और समाधि फल की अत्यन्त शीघ्र प्राप्ति का साधन अधिमात्रतीव्र संवेग = परवैराग्य बताया गया है। क्या मात्र यही एक उपाय है या अन्य कोई उपाय भी इस हेतु है ? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि “और ईश्वरप्रणिधान से भी समाधि-सिद्धि तथा समाधिफल की प्राप्ति अत्यन्त शीघ्र होती है।” अर्थात् अत्यन्त तीव्र परवैराग्य के साथ ईश्वरप्रणिधान का योग असम्प्रज्ञात समाधि की सिद्धि और समाधिफल कैवल्य को अत्यन्त शीघ्र प्राप्त कराता है।

योगसूत्र १.१६ में परवैराग्य को पुरुषदर्शन अभ्यास से गुणों के प्रति तृष्णा रहित स्थिति को कहा है। जीवात्म-साक्षात्कार के पश्चात् परवैराग्य के सम्पादन में उत्कृष्टता तो परमात्म-साक्षात्कार होने पर ही आती है। वैराग्य — ज्ञान की पराकाष्ठा होने से, परमात्मज्ञान के पश्चात् ही तो परवैराग्य में अत्यन्त = अधिकतम तीव्रता सम्भव हो सकती है। क्योंकि परमात्मज्ञान की पश्चात् ही ज्ञान का चरम कौटिक विकास होता है। अतः इस प्रकार से परवैराग्य में निरन्तर उत्कृष्टता बढ़ती जाती है।

इसी प्रकार सूत्र १.१८ की व्याख्या में यह स्पष्ट किया है कि असम्प्रज्ञात समाधि में परमात्मा का आलम्बन रहता है; इस अवस्था में ही जीवात्मा अपने चैतन्य स्वरूप से ज्ञानपूर्वक परमात्मा के स्वरूप में स्थित होता है।

जिस प्रकार ईश्वर के ज्ञान और आश्रय से उपरोक्त कार्य सिद्ध होते हैं, उसी प्रकार ईश्वर-प्रणिधान से ये कार्य, अर्थात् समाधि की सिद्धि और समाधिफल की प्राप्ति, अत्यन्त शीघ्र हो जाते हैं।

ईश्वर-प्रणिधान क्या है ? महर्षि व्यास और भोज ने इसे भक्तिविशेष कहा है। इसे और अधिक स्पष्ट करते हुए महर्षि व्यास ने योगसूत्र २.१ के भाष्य में कहा है “ईश्वरप्रणिधानं सर्वक्रियाणां परमगुरावर्पणं तत्फलसंन्यासो वा” अर्थात् “ईश्वर-प्रणिधान का अर्थ है उस परम गुरु ईश्वर में अपनी सभी क्रियाओं को अर्पित करना तथा उसके लौकिक फलों को न चाहना।” इसी भावना को भोज ने इस प्रकार से कहा है — “सभी क्रियाओं को ईश्वर को समर्पित करना, और विषयों के भोग, सुख आदि फल की इच्छा न करना, ईश्वर-प्रणिधान है।” इस विषय में महर्षि दयानन्द सरस्वती लिखते हैं “सब सामर्थ्य, सब गुण, प्राण, आत्मा और मन के प्रेमभाव से आत्मादि सत्य द्रव्यों का ईश्वर के लिये समर्पण करना।” तथा “ईश्वर में विशेषभक्ति होने से मन का समाधान होके मनुष्य समाधियोग को शीघ्र प्राप्त हो जाता है।” इस प्रकार सभी ने ईश्वर प्रणिधान को ईश्वर की भक्तिविशेष कहा है। और ईश्वर की भक्ति क्या है ? भक्ति का अर्थ करते हुए महर्षि दयानन्द सरस्वती यजु॰ २५.१३ का अर्थ करते हुए कहते हैं “भक्ति अर्थात् उसी की आज्ञा पालन करने में तत्पर रहें।” परमात्मा के प्रति प्रेम की पराकाष्ठा को ही भक्ति कहा जाता है। परन्तु यह भक्ति केवल अपनी इच्छानुकूल ईश्वर का नाम स्मरण मात्र से नहीं होती, बल्कि परमात्मा की आज्ञा पालन से होती है। परमात्मा की आज्ञा उसका ज्ञान वेद और वेद में जीवों के कल्याण हेतु दिए गए उपदेश एवं आदेश हैं।

इसी प्रकार से — प्र प्र वस्त्रिष्टुभमिषम् ..... (साम० ३६०, ऋ० ८.६९.१) में भी उपासक के लिए अह्लादकारी परमात्मा के लिए सुखों को स्थिर करने हेतु प्रीति और श्रद्धा पूर्वक प्रकृष्टरूप से समर्पण करने का उपदेश है। ईश्वर के प्रति सर्वभावेन समर्पण के बिना समाधि की सिद्धि नहीं हो पाती। इसी तथ्य को महर्षि पतञ्जलि ने ईश्वरप्रणिधान के फल के रूप में कहा है — समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् (योग० २.४५) अर्थात् ईश्वरप्रणिधान से समाधि सिद्ध हो जाती है। समाधि सिद्धि का यही एक मात्र सरल उपाय है। यह उपाय सरल होते हुए भी साधक के लिए साध्य है। साधक को, परमात्मा के स्वरूप को यथावत् जानकर, सर्वकाल में उसकी भावना बनाए रखना तथा उसके ज्ञान वेद के अनुसार अपनी सभी क्रियाओं को नियन्त्रित करना अर्थात् उसी की आज्ञा पालन में तत्पर रहना होता है।

अतः इस अवस्था में साधक = योगी चित्त की बाह्य वृत्तियों का निरोध कर, अपनी सभी क्रियाओं को, अपने मन, प्राण और आत्मा को ईश्वर की आज्ञा के अनुकूल करता हुआ, परम गुरु परमात्मा के प्रति समर्पित हो जाता है। वह न केवल अपनी क्रियाओं को ही ईश्वर के प्रति समर्पित करता है, बल्कि उनके लौकिक, पारलौकिक, दिव्य फल आदि की भी चाहना नहीं करता, क्योंकि वह समस्त दुःखों और उन दुःखों के कारण जन्म से ही छूटना चाहता है। वह जानता है कि मैं सर्वदा, सर्वथा ईश्वर के मध्य में रह रहा हूँ, और किसी भी काल में उससे पृथक् नहीं हो सकता; और इसी प्रकार से ईश्वर सर्वकाल में मुझ में व्यापक होता हुआ मेरी सभी क्रियाओं तथा भावनाओं को यथास्वरूप जानता है। ऐसे में वह ईश्वर के प्रति सर्वकाल में सर्वरूपेण समर्पित रहता है।

इस प्रकार से समर्पित साधक = योगी को, ईश्वर सङ्कल्पमात्र से ही अनुग्रहीत करता है। ईश्वर के सङ्कल्प द्वारा अनुग्रहीत योगी को समाधि की सिद्धि तथा समाधि फल कैवल्य की प्राप्ति अत्यन्त शीघ्र होती है। इस प्रकार अधिमात्र तीव्र संवेग = परवैराग्य के साथ ईश्वरप्रणिधान के सम्पादन से साधक = योगी को समाधि की सिद्धि तथा समाधि फल की प्राप्ति अत्यन्त शीघ्र होती है।

ईश्वर-प्रणिधान रूपी यह उपाय उपरोक्त नव प्रकार के योगियों के लिए तो लाभदायक है, परन्तु अन्यों के लिए यह उपाय इस प्रकार से लाभकारी नहीं। यहाँ “वा” विकल्प अर्थ में न होकर समुच्चय अर्थ में है। केवल ईश्वर-प्रणिधान से ही, समाधि के पूर्वोक्त उपायों = अष्टाङ्गयोग का श्रद्धादि पूर्वक और परवैराग्य का सम्पादन न करने वाले जिज्ञासु मनुष्य को, समाधि सिद्धि और समाधिफल कैवल्य की प्राप्ति नहीं हो सकती। समाधिसिद्धि हेतु सम्यक् प्रयत्न किए बिना समाधि की प्राप्ति तो ईश्वर भी नहीं करा सकता। परमात्मा तो सभी जीवों को उनकी योग्यता अनुसार, उनके उचित पुरुषार्थ के पश्चात् ही उचित फल देता है। प्रार्थना, ईश्वर के प्रति समर्पण आदि भी, जीवात्मा द्वारा पूर्ण पुरुषार्थ के पश्चात् ही फलदायी होते हैं, उसके पूर्व नहीं। योगियों को ही ईश्वर प्रणिधान का वाञ्छित लाभ मिलता है, अन्यों को नहीं।

अतः योगियों को समाधि सिद्धि हेतु उपायों और परवैराग्य को अपनाने के साथ ईश्वरप्रणिधान को भी अपनाने से समाधिसिद्धि और समाधिफल प्राप्ति में अत्यन्त शीघ्र सफलता मिलती है।