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ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च॥२९॥

In Hindi:

पदपाठ : ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमः अपि अन्तराय अभावः च॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : किं चास्य भवति—

भूमिका हिंदी अर्थ : (च) और (अस्य) इस योगी को (किम्) क्या (भवति) प्राप्त होता है —

हिंदी में अर्थ : (ततः) उस ईश्वर प्रणिधान से (प्रत्यक्चेतनाधिगमः) आत्मा के भी आत्मा अन्तर्यामी चेतन परमात्मा की प्राप्ति (अपि) भी आत्म-साक्षात्कार के साथ हो जाती है; (च) और (अन्तराय-अभावः) योग के विघ्नों = अन्तरायों का अभाव हो जाता है॥

महर्षि दयानन्द व्याख्या : “फिर उससे उपासकों को यह भी फल होता है ........ (ततः प्र०) अर्थात् उस अन्तर्यामी परमात्मा की प्राप्ति और (अन्तराय) उसके अविद्यादि क्लेशों तथा रोग रूप विघ्नों का नाश हो जाता है॥”(ऋ० भू॰ उपासनाविषय)

प्राचीन ॠषि भाष्य : ये तावदन्तराया व्याधिप्रभृतयस्ते तावदीश्वरप्रणिधानान्न भवन्ति। स्वरूपदर्शनमप्यस्य भवति। यथैवेश्वरः पुरुषः शुद्धः प्रसन्नः केवलोऽनुपसर्गस्तथायमपि बुद्धेः प्रतिसंवेदी यः पुरुष इत्येवमधिगच्छति॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (ये तावत्) ये जो (व्याधिप्रभृतयः) व्याधि आदि (अन्तरायाः) योग के विघ्न हैं; (ते तावत्) वे तो (ईश्वरप्रणिधानात्) ईश्वर-प्रणिधान से (न भवन्ति) नहीं होते अर्थात् योग में बाधक नहीं होते। (अस्य) इस ईश्वर-प्रणिधान करने वाले योगी को (स्वरूपदर्शनम्) अपने (=आत्मा के) स्वरूप का साक्षात् (अपि) भी परमात्मा के स्वरूप के साक्षात्कार के साथ (भवति) हो जाता है। (यथैव) जैसे (ईश्वरः पुरुषः) पुरुष विशेष ईश्वर (शुद्धः) शुद्ध, पवित्र, (प्रसन्नः) अविद्यादि क्लेश रहित होने से सर्वथा दुःखरहित, (केवलः) अन्य पदार्थों के मिश्रण से रहित, तथा (अनुपसर्गः) निर्विकार = जाति, आयु और भोग रूपी उपसर्गों से रहित है; (तथा) वैसे ही (यः) जो (बुद्धेः प्रतिसंवेदी) बुद्धि से होने वाले ज्ञान का संवेदन = अनुभव करने वाला (अयम्) यह (जीवात्मा) (अपि) भी (पुरुषः) पुरुष है (इति एवम्) इस प्रकार से (अधिगच्छति) अपने स्वरूप का बोध = साक्षात्कार करता है॥

वैदिक वृत्ति : योगी ईश्वर के वाचक प्रणव = ओ३म् का जप करता हुआ, ईश्वर की भावना करता हुआ तथा ईश्वर के गुणों को अपने जीवन में लाता हुआ, ईश्वर को अपने सम्मुख जानकर अपने सभी कर्मों को करता हुआ, अपने सभी कार्यों को, मन को और आत्मा को ईश्वर के प्रति समर्पित करता हुआ, ईश्वर प्रणिधान का सम्पादन करता हुआ, किस उपलब्धि को प्राप्त होता है ? इस प्रकार ईश्वरप्रणिधान का सम्पादन करता हुआ योगी अपने आत्मा के भी आत्मा अर्थात् अन्तर्यामी परमात्मा का साक्षात्कार भी आत्म-साक्षात्कार के साथ कर लेता है। तथा दूसरी उपलब्धि के रूप में योग के सभी विघ्नों का भी नाश हो जाता है।

इस प्रकार से ईश्वर प्रणिधान करने वाले योगी को स्वरूपसाक्षात्कार भी परमात्म-साक्षात्कार के साथ हो जाता है। पिछले सूत्र में बताया गया है कि साधक = योगी को अपनी सभी क्रियाओं को करते हुए ईश्वर की भावना बनानी चाहिए। ओ३म् के जप के साथ ओ३म् के वाच्य ईश्वर के स्वरूप का चिन्तन करना चाहिए। इस प्रकार से ईश्वर की भावना करने वाले योगी को ईश्वर का साक्षात्कार हो जाता है। यह साक्षात्कार केवल ईश्वर का साक्षात्कार ही नहीं होता वरन् ईश्वर के सानिध्य से योगी को अपने स्वरूप का साक्षात्कार भी हो जाता है।

ईश्वर के स्वरूप के ज्ञान = साक्षात्कार के साथ जीवात्मा को अपने स्वरूप का ज्ञान कैसे हो जाता है ? इस पर महर्षि व्यास कहते हैं — जैसे ब्रह्माण्ड में व्यापक रहने वाला पुरुष विशेष ईश्वर शुद्ध, पवित्र, अविद्यादि क्लेशों से रहित होने से सर्वथा दुःखरहित, केवल = एक, स्वयं में सर्वथा परिपूर्ण, तथा निर्विकार है, वैसे ही बुद्धि के द्वारा ज्ञान प्राप्त करने वाला आत्मा = जीवात्मा पुरुष भी चेतन होने से इसी प्रकार का है; इस प्रकार यह ज्ञान होता है। वस्तुतः आत्मा और परमात्मा दोनों ही चेतन स्वरूप हैं, दोनों ही अ-त्रिगुण = प्रकृति के तीनों गुणों से रहित, अपरिणामी, शुद्ध, निर्विकार, वृद्धि-ह्रास आदि से रहित हैं। परमात्मा तो तीनों कालों में ऐसा ही रहता है। दूसरी ओर जीवात्मा रूपी पुरुष अविद्या के कारण प्रकृति के सम्पर्क से अपने शुद्ध स्वरूप को भूल कर, संसारचक्र को प्राप्त हुआ क्लेश, कर्म, विपाक और आशय से सम्बद्ध हो जाता है, और संसार दशा में वृत्तियों के स्वरूप के समान प्रतीत होता है। यही जीवात्मा जब योग के मार्ग को अपनाता है तो वृत्ति निरोध होने पर अपनी स्वरूपस्थिति को प्राप्त करता है। वह असम्प्रज्ञात समाधि की यही अवस्था है जब जीवात्मा चेतन परमात्मा के आश्रय से अपने शुद्ध स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करता है। यहाँ इस स्वरूप के साक्षात्कार में प्रकृति, एवं उसके विकार चित्त = बुद्धि का भी सहयोग नहीं रहता। जबकि अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि में जीवात्मा अपना बोध चित्त के माध्यम से ही करता है। इसी सम्प्रज्ञात समाधि में हुए बोध के कारण ही जीवात्मा स्वयं को जड़ प्रकृति से सर्वथा भिन्न चेतन जानता हुआ ही आगे परम पुरुष चेतन परमात्मा के साक्षात्कार हेतु प्रयत्न करता हुआ ही इस स्थिति तक पहुँच पाता है। यही इन दोनों अवस्थाओं के स्वरूप-बोध = साक्षात्कार में अन्तर है। सम्प्रज्ञात समाधि में हुए स्वरूप-साक्षात्कार के पश्चात् भी वह जीवनमुक्त नहीं होता; परन्तु इस असम्प्रज्ञात समाधि में परमात्मा के आश्रय हुए स्वरूपदर्शन = साक्षात्कार के बाद वह जीवनमुक्त होता है, और शरीर छोड़ने पर परमात्मा की व्यवस्था में मुक्ति को प्राप्त करता है।

बहुधा भाष्यकारों ने ईश्वर प्रणिधान से आत्म-साक्षात्कार ही माना है। परन्तु यह ध्यान रखना चाहिए कि यदि प्रणिधान ईश्वर के प्रति होगा और भावना भी ईश्वर के स्वरूप की होगी तो साक्षात्कार भी ईश्वर का होना चाहिए। अतः इस अवस्था में ईश्वर साक्षात्कार तो स्वाभाविक है इसलिए महर्षि व्यास ने भाष्य करते हुए “स्वरूपदर्शनमप्यस्य भवति” कहा है, अर्थात् योगी को आत्म-स्वरूप का साक्षात्कार भी हो जाता है। भाष्यकारों का यह भ्रम व्यासभाष्य में “बुद्धेः प्रतिसंवेदी” देखकर हुआ है। क्योकि बुद्धि से संवेदन करने वाला जीवात्मा ही है न कि परमात्मा, अतः उन्होंने केवल आत्म-साक्षात्कार को ही माना है। परन्तु उन्होंने “स्वरूपदर्शनमप्यस्य भवति” में अपि शब्द पर ध्यान नहीं दिया। अतः हमने अर्थ करते हुए लिखा है — (स्वरूपदर्शनम्) अपने आत्मा के स्वरूप का साक्षात् (अपि) भी परमात्मा के स्वरूप के साक्षात्कार के साथ (भवति) हो जाता है। सूत्र में महर्षि पतञ्जलि ने “प्रत्यक्चेतनाधिगमः” कहा है, जिसका अर्थ है — हमारे अन्दर उपस्थित चेतन आत्मा। हम कोई प्रकृति के विकारों के समुदाय से बना शरीर नहीं है जो इस शरीर के अन्दर उपस्थित केवलमात्र चेतन जीवात्मा को ही लक्ष्य माना जाए। वरन् इस शरीर का संचालन करने वाला तथा अधिष्ठाता तो चेतन जीवात्मा है और उसके भीतर है परमात्मा, जो आत्मा से भी परमसूक्ष्म होने से अपनी व्यापकता से वहाँ उपस्थित है। यथा बृहदारण्यक उपनिषद् में कहा है —

यो विज्ञाने तिष्ठन्विज्ञानादन्तरो यं विज्ञानं न वेद यस्य विज्ञानं शरीरं यो विज्ञानमन्तरो यमयत्येष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः॥ बृ॰ ३.७.२२॥

यहाँ विज्ञान शब्द आत्मा के लिए आया है। अर्थात् जो विज्ञान = आत्मा में रहता हुआ भी विज्ञान से अन्तर अर्थात् बाह्य है जिसको विज्ञान नहीं जानता है। जिसका शरीर विज्ञान है। जो अभ्यन्तर और बाहर स्थित हो विज्ञान का शासन करता है। जो आपका आत्मा है। जो अमृत है, यही वह अन्तर्यामी है। अतः परमात्मा आत्मा से सूक्ष्म होता हुआ आत्मा में भी में व्यापक है; आत्मा का आत्मा अन्तर्यामी परमात्मा है। जबकि माध्यंदिन शाखीय शतपथ ब्राह्मण में निम्नलिखित पाठ है —

य आत्मनि तिष्ठन् आत्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्यात्मा शरीरम्। य आत्मानमन्तरो यमयति स त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः॥ शतपथ १४.६.७.३०॥

यहाँ शतपथ ब्राह्मण में विज्ञान के स्थान पर आत्मा का पाठ स्पष्ट है। अतः आत्मा के भी आत्मा अन्तर्यामी परमात्मा का साक्षात्कार भी आत्म-साक्षात्कार के साथ होता है।

इस सूत्र के भाष्य में महर्षि दयानन्द सरस्वती ने भी स्पष्ट रूप से परमात्मा की प्राप्ति ही कही है — “अर्थात् उस अन्तर्यामी परमात्मा की प्राप्ति और उसके अविद्यादि क्लेशों तथा रोग रूप विघ्नों का नाश हो जाता है॥”

ईश्वर-प्रणिधान का दूसरा लाभ यह है कि योग मार्ग के सभी विघ्नों का नाश हो जाता है, अर्थात् यह विघ्न योगी की योगसाधना में बाधक नहीं बनते। यथा ऋग्वेद में भी कहा है —

त्वं हि शश्व॑तीना॒मिन्द्र॑ द॒र्ता पु॒रामसि॑। ह॒न्ता दस्यो॒र्मनो॑र्वृ॒धः पति॑र्दि॒वः॥ (ऋ० ८.९८.६)

अर्थात् परमात्मा ही मानव के मन में उत्पन्न होकर उत्पीड़न करने वाली प्रवाह से अनादि एवं अनन्त वृत्तियों = दुःखों = दुरितों = दुर्भावनाओं = विक्षेपों को नाश करने वाला है। वे अन्तराय = विघ्न कौन से हैं, यह अगले सूत्र में बताया है।