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दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः॥३१॥

In Hindi:

पदपाठ : दुःख दौर्मनस्य अङ्गमेजयत्व श्वासप्रश्वासाः विक्षेपसहभुवः॥

हिंदी में अर्थ : (दुःख) आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक दुःख, (दौर्मनस्य) इच्छापूर्त्ति न होने पर चित्त में क्षोभ, (अङ्गमेजयत्व) शरीर के अङ्गों का कम्पन, (श्वासप्रश्वासाः) श्वास और प्रश्वास (विक्षेपसहभुवः) विक्षेपों के साथ होने वाले हैं॥

महर्षि दयानन्द व्याख्या : “अब इनके (व्याधि आदि विघ्नों के) फल लिखते हैं (दुःखदौर्म०) अर्थात् दुःख की प्राप्ति, मन का दुष्ट होना, शरीर के अवयवों का कम्पन, श्वास और प्रश्वास के अत्यन्त वेग से चलने में अनेक प्रकार के क्लेशों का होना, जो कि चित्त को विक्षिप्त कर देते हैं, ये सब क्लेश अशान्त चित्त वाले को प्राप्त होते हैं शान्त चित्त वाले को नहीं॥” (ऋ० भू॰ उपासनाविषय)

प्राचीन ॠषि भाष्य : दुःखमाध्यात्मिकमाधिभौतिकमाधिदैविकं च। येनाभिहताः प्राणिनस्तदुपघाताय प्रयतन्ते तद् दुःखम्। दौर्मनस्यमिच्छाविघाताच्चेतसः क्षोभः। यदङ्गान्येजयति कम्पयति तदङ्गमेजयत्वम्। प्राणो यद् बाह्यं वायुमाचामति स श्वासः। यत्कौष्ठ्यं वायुं निःसारयति स प्रश्वासः। एते विक्षेपसहभुवो विक्षिप्तचित्तस्यैते भवन्ति। समाहितचित्तस्यैते न भवन्ति॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (आध्यात्मिकम्) आध्यात्मिक, (आधिभौतिकम्) आधिभौतिक (च) और (आधिदैविकम्) आधिदैविक भेद से (दुःखम्) दुःख तीन प्रकार का है। (येन) जिस से सम्बन्ध होने पर (अभिहताः) पीडि़त हुए (प्राणिनः) प्राणी (तद् उपघाताय) उस के नाश के लिए (प्रयतन्ते) प्रयत्न करते हैं, (तद् दुःखम्) वह दुःख कहलाता है। (इच्छाविघातात्) इच्छा की पूर्त्ति न होने से (चेतसः) जो चित्त में (क्षोभः) क्षोभ = विकलता होना है वह (दौर्मनस्यम्) दौर्मनस्य कहलाता है। (यत्) जो (अङ्गानि) शरीर के अङ्गों का (एजयति कम्पयति) स्थिर न होना अर्थात् कम्पन है (तत्) वह (अङ्गमेजयत्वम्) अङ्गमेजयत्व है। (प्राणः) प्राण (यत्) जो (बाह्यम् वायुम्) बाह्य वायु को (आचामति) पीना है = अन्दर खीचना है (सः) वह (श्वासः) श्वास कहलाता है। (यत्) जो (कौष्ठ्यम् वायुम्) उदर के वायु को (निःसारयति) बाहर निकालना है (सः) वह (प्रश्वासः) प्रश्वास कहलाता है। (एते) ये दुःखादि पाँच (विक्षेपसहभुवः) विक्षेपों के साथ होने वाले हैं; क्योंकि (एते) ये सभी दुःखादि (विक्षिप्तचित्तस्य) विक्षिप्तचित्त वाले पुरुष को ही (भवन्ति) होते हैं। और (समाहितचित्तस्य) समाहित = एकाग्र चित्त वाले योगी को (एते) ये दुःखादि (न भवन्ति) नहीं होते॥

वैदिक वृत्ति : योग के विघ्नों — व्याधि आदि से ग्रस्त साधक = व्यक्ति को उन चित्त गत विक्षेपों के साथ-साथ अन्य प्राप्त होने वाले विक्षेपों के फलरूप — दुःख, दौर्मनस्य, अङ्गमेजयत्व, श्वास, प्रश्वास रूपी विक्षेप सहभुव = उपविघ्नों की भी प्राप्ति होती है। विक्षिप्त चित्त वाले व्यक्ति = साधक को ही इनकी अनुभूति होती है; समाहित = एकाग्र = निरुद्ध चित्त वाले योगी को विक्षेपों के नाश के उपरान्त इनकी अनुभूति नहीं होती। इसी कारण से इन दुःखादि को विक्षेप सहभुव = विघ्नों के साथी कहा गया है। अतः ये दुःखादि विक्षेपों के ही फल हैं।

१. दुःख — उसे कहते हैं जिससे पीडि़त होकर प्राणी उसके नाश का उपाय करते हैं। यह दुःख आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक तीन प्रकार का है। ये त्रिविध दुःख निम्न प्रकार से समझने चाहिए — “एक आध्यात्मिक — आत्मा, शरीर में अविद्या, राग, द्वेष, मूर्खता और ज्वर पीड़ादि होते हैं। दूसरा आधिभौतिक — जो शत्रु, व्याघ्र और सर्पादि से प्राप्त होता है। तीसरा आधिदैविक — अर्थात् जो अतिवृष्टि, अतिशीत, अतिउष्णता, मन और इन्द्रियों की अशान्ति से होता है।” (स० प्र० प्रथम समुल्लास)। ये तीन प्रकार के दुःख चित्त में व्याधि आदि विघ्नों के उपस्थित रहते हुए शरीर और मन में होते हैं।

२. दौर्मनस्य — साधक जब ईश्वर को छोड़कर प्रकृति और उसके विकारों में सुखानुभूति को मानता हुआ उन विषयों = पदार्थों को प्राप्त करने हेतु लालसा, कामना करता है और उस कामना के पूरा न होने पर चित्त में क्षोभ, उद्विग्नता, विषादयुक्तता, दुष्टता आदि उपविघ्न उपस्थित होते हैं; इसे ही दौर्मनस्य रूपी उपविघ्न कहा गया है। दौर्मनस्य से ग्रस्त साधक का चित्त, अपनी इच्छा के विघात के कारण, योगाभ्यास से विमुख हो जाता है। यह उपविघ्न मुख्यतया अविद्या के कारण ही होता है।

३. अङ्गमेजयत्व — शरीर के अङ्गों में कम्पन होना, स्थिरता न होना ही अङ्गमेजयत्व है। इस स्थिति में साधक आसन और मन की स्थिरता को प्राप्त नहीं कर पाता, परिणामस्वरूप योग साधना में सफलता नहीं होती। यह स्थिति भी व्याधिादि विघ्नों के कारण से ही मुख्यता होती है।

४-५. श्वास-प्रश्वास — बाहर से प्राण वायु को भीतर लेना “श्वास” और उदर की वायु को बाहर निकालना “प्रश्वास” कहलाता है। परन्तु व्याधि आदि विघ्नों के कारण यह स्वाभाविक क्रिया भी साधक के नियन्त्रण में नहीं रहती, और श्वास-प्रश्वास भी इन व्याधि आदि विघ्नों के कारण तीव्रता से = वेग से चलने लगते हैं। साधक इनपर नियन्त्रण के अभाव में प्राणायाम नहीं कर पाता। प्राणायाम के अभाव में चित्त की धारणा-ध्यान-समाधि की योग्यता नहीं बन पाती। अतः यह भी योग मार्ग में एक प्रबल विघ्न बन जाता है।

यह दुःखादि विघ्नों के फलरूप में कथन होने से साधक को मुख्यता से विघ्नों के नाश का प्रयत्न करना चाहिए। जब व्याधि आदि विघ्न चित्त को विक्षिप्त नहीं करते तो यह दुःखादि उपविघ्न जो विघ्नों के ही फल हैं ये भी स्वतः समाप्त हो जायेंगे। जैसा कि पूर्व में कहा गया है कि इन सभी विघ्नों और उपविघ्नों को ईश्वर की भावना करते हुए अभ्यास और वैराग्य के द्वारा नाश करना चाहिए। अगले सूत्र का अर्थ करते हुए महर्षि दयानन्द सरस्वती ने स्पष्ट किया है कि एक अद्वितीय ब्रह्म ही इन विघ्नों को दूर करने का वज्ररूपी शस्त्र है, अन्य कोई नहीं। अतः ईश्वर की भावना, ईश्वर के प्रति सर्वभावेन समर्पण करना भी, अभ्यास और वैराग्य के सम्पादन के साथ-साथ परमावश्यक है।