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मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम्॥३३॥

In Hindi:

पदपाठ : मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणाम् सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणाम् भावनातः चित्तप्रसादनम्॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : यस्य चित्तस्यावस्थितस्येदं शास्त्रेण परिकर्म निर्दिश्यते तत्कथम् —

भूमिका हिंदी अर्थ : (यस्य) जिस (अवस्थितस्य) अवस्थित = स्थिर = अक्षणिक (चित्तस्य) चित्त का (इदम्) इस (शास्त्रेण) योगशास्त्र के द्वारा (परिकर्म) परिकर्म = समाधि प्राप्ति हेतु चित्त को स्थिर और उसे परिशोधन के उपायों का (निर्दिश्यते) निर्देश किया जाता है; (तत्) वह परिकर्म (कथम्) किस प्रकार का होता है —

हिंदी में अर्थ : (सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणाम्) सुख, दुःख, पुण्य, पाप सम्बन्ध वाले अर्थात् सुखी, दुःखी, पुण्यात्मा और अपुण्यात्माओं के प्रति (मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणाम्) मैत्री, करुणा = दया, मुदिता = प्रसन्नता, उपेक्षा = उदासीनता की क्रमशः (भावनातः) भावना करने से (चित्तप्रसादनम्) चित्त की प्रसन्नता, निर्मलता, स्थिरता होती है॥

महर्षि दयानन्द व्याख्या : (मैत्री) अर्थात् इस संसार में जितने मनुष्य आदि प्राणी सुखी हैं, उन सब के साथ मित्रता करना। दुःखियों पर कृपादृष्टि रखनी। पुण्यात्माओं के साथ प्रसन्नता। पापियों के साथ उपेक्षा अर्थात् न उनके साथ प्रीति रखना और न वैर ही करना। इस प्रकार के वर्त्तमान से उपासक के आत्मा में सत्यधर्म का प्रकाश और उसका मन स्थिरता को प्राप्त होता है॥ (ऋ० भू॰ उपासनाविषय)

प्राचीन ॠषि भाष्य : तत्र सर्वप्राणिषु सुखसम्भोगापन्नेषु मैत्रीं भावयेत्। दुःखितेषु करुणाम्। पुण्यात्मकेषु मुदिताम्। अपुण्यशीलेषूपेक्षाम्। एवमस्य भावयतः शुक्लो धर्म उपजायते। ततश्च चित्तं प्रसीदति प्रसन्नमेकाग्रं स्थितिपदं लभते॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : उपासक = साधक = योग मार्ग का पथिक (तत्र) उन भावनाओं में से (सुखसम्भोगापन्नेषु) सुख भोग से परिपूर्ण = सुखी रहने वाले (सर्वप्राणिषु) सभी प्राणियों में (मैत्रीम्) मित्रता की (भावयेत्) भावना करे। (दुःखितेषु) दुःखी प्राणियों में (करुणाम्) करुणा = दया की भावना करे। (पुण्यात्मकेषु) पुण्यात्माओं में = पुण्य करने वाले सभी प्राणियों में (मुदिताम्) मुदिता = प्रसन्नता की भावना करे। (अपुण्यशीलेषु) अपुण्य कर्मों को करने वालों में (उपेक्षाम्) उपेक्षा = उदासीनता की भावना करे। (एवम्) इस प्रकार (अस्य भावयतः) ऐसी भावना करने वाले साधक = योगी में (शुक्लो धर्मः) शुद्ध धर्म = सत्य धर्म का प्रकाश (उपजायते) उत्पन्न होता है। (च) और (ततः) इस सत्यधर्म की उत्पत्ति से (चित्तम्) चित्त (प्रसीदति) प्रसन्न होता है, निर्मलता को प्राप्त करता है; (प्रसन्नम्) प्रसन्न हुआ चित्त (एकाग्रम्) एकाग्र होकर (स्थितिपदम्) स्थितिपद को (लभते) प्राप्त होता है॥

वैदिक वृत्ति : चित्त के विक्षेपों को निवारण करने का उपाय बताने के उपरान्त, महर्षि पतञ्जलि चित्त को स्थिर तथा उसे परिशोधित करने हेतु कुछ उपायों का निर्देश इन सूत्रों के द्वारा कर रहे हैं। जब तक चित्त में स्थिरता तथा चित्त के मलों के नाश के साथ-साथ चित्त में निर्मलता नहीं आती, तब तक साधक के लिए समाधि की प्राप्ति कर पाना सम्भव नहीं होता। राग, द्वेष, ईर्ष्या आदि के कारण से चित्त में छः प्रकार के कालुष्य = मल उत्पन्न होते हैं, जो कि राजस और तामस वृत्तियों के कारण से उत्पन्न होते हैं और चित्त को विक्षिप्त तथा मलिन बना कर साधक को योगमार्ग से दूर करते हैं। ये निम्न प्रकार से जाने जाते हैं —

१. राग-कालुष्य :— अनुभव किये गए सुख के पश्चात, उस प्रकार के सुख की प्राप्ति की इच्छा का उत्पन्न होना, रागकालुष्य कहलाता है। विषयों के प्रति यह राग, सुख-साधनों की पुनः प्राप्ति न होने पर, चित्त को विक्षिप्त करता है।

२. ईर्ष्या-कालुष्य :— अन्य मनुष्यों के गुणों, सम्पत्ति आदि की अधिकता को देखकर चित्त में जो क्षोभ उत्पन्न होता है, वह ईर्ष्या-कालुष्य कहलाता है।

३. परापकार-चिकीर्षा-कालुष्य :— अन्य प्राणियों का अपकार करने, उन्हें दुःख पहुँचाने की इच्छा से, चित्त विह्वलता को प्राप्त होकर कलुषित होता है।

४. असूया-कालुष्य :— अन्य श्रेष्ठ मनुष्यों के गुणों में दोषों को ढूढना तथा दोषारोपण करना, असूया- कालुष्य कहलाता है। जैसे किसी यम-नियम व्रतधारी, सदाचारी को दम्भी कहना, आचारवान् को पाखण्डी कहना और मानना, असूया है।

५. द्वेष-कालुष्य :— दूसरे प्राणियों के प्रति, प्रेमभाव का विरोधी अकारण क्रोध का होना और परिणामस्वरूप चित्त में द्वेष का उत्पन्न होना, द्वेषकालुष्य कहलाता है। यह चित्त को विक्षिप्त तथा मलिन करने का प्रबल कारण है।

६. अमर्ष-कालुष्य :— दूसरों द्वारा स्वयं का अपमान होने अथवा उनसे दुःख प्राप्त होने पर, उसको सहन न करके, उनसे प्रतिकार लेने के लिए प्रयत्न करना, अमर्ष कालुष्य कहलाता है।

उपर्युक्त मलों से व्युत्थान दशा को प्राप्त हुआ चित्त एकाग्र नहीं हो सकता। अतः चित्त में निर्मलता एवं प्रसन्नता के सम्पादन हेतु महर्षि पतञ्जलि ने कुछ उपायों को योगमार्ग के पथिकों के लिए सुझाया है। प्रथम उपाय के रूप में साधक के लिए निर्देश दिया है कि वह संसार में विभिन्न प्रकार के सुखी, दुःखी, पुण्यात्मा और अपुण्यात्मा मनुष्यों के साथ किस प्रकार का व्यवहार करे।

साधक को चाहिए कि सुखी और सुख-भोग साधन सम्पन्न अथवा इन साधनों से परिपूर्ण मनुष्यों के प्रति मित्रता का भाव रखे। प्रथम, मित्रता में व्यक्ति को दूसरे से प्रत्युपकार की कामना नहीं होती; और दूसरे, यह भावना इसलिए भी आवश्यक है कि साधक के चित्त में ईर्ष्या की भावना उत्पन्न न हो। साधक यह विचार न करे कि ये सुखी मनुष्य तो कैसे-कैसे भोग-साधनों को प्राप्त कर रहे हैं, और मैं कष्टमय जीवन व्यतीत कर रहा हूँ अथवा ये सभी साधन मेरे पास नहीं है। ऐसी भावना करने से साधक के चित्त में ईर्ष्या के साथ-साथ द्वेष की भावना भी बलवती होकर, उसके पतन का कारण बन जाती है। चित्त के ईर्ष्या-द्वेष से युक्त होने पर योगमार्ग में गति नहीं हो सकती।

दुःखी प्राणियों के प्रति साधक को करुणा की भावना रखनी चाहिए, उनसे घृणा कदापि नहीं करनी चाहिए। साधक को दूसरों के दुःख को देख कर, तटस्थ न रहना चाहिए, बल्कि यथासम्भव उनके दुःख निवारण हेतु प्रयास करना चाहिए। इन दुःखी प्राणियों के प्रति यथासम्भव उपलब्ध साधनों के माध्यम से दया = कृपा की भावना रखने से, उसके चित्त में घृणा के स्थान पर प्रसन्नता उत्पन्न होगी जोकि चित्त की निर्मलता में सहायक होगी।

साधक को संसार में पुण्यात्माओं को देख कर प्रसन्नता = मुदिता की भावना रखनी चाहिए। उनके पुण्य कार्यों के प्रति अनुमोदन करते हुए प्रसन्नता की भावना रखनी चाहिए, उनसे द्वेष कदापि नहीं करना चाहिए। दूसरे प्राणियों के पुण्य कार्यों से उनका सम्मान होने पर, व्यक्ति में उसके प्रति द्वेष की भावना भी उत्पन्न हो जाती है; वह यह सोचता है कि देखो! कैसा पुण्यात्मा बन रहा है!!! क्या पुण्य किया है ? मात्र दिखावा ही करता है, आदि-आदि। अतः इस प्रकार के किसी भी द्वेष की भावना से दूर रहते हुए उनके पुण्य कार्यों का मन, वाणी और शरीर से अनुमोदन करना तथा उनके प्रति चित्त में प्रसन्नता की भावना रखनी चाहिए।

साधक को संसार में अपुण्यात्माओं के प्रति उपेक्षा = उदासीनता की भावना रखनी चाहिए। न तो उनके कर्मों का मन, वाणी और शरीर से समर्थन और न ही उनसे द्वेष की भावना रखनी चाहिए। न तो उनके प्रति राग और न ही द्वेष करना चाहिए। अधार्मिक प्राणियों के प्रति राग और द्वेष से रहित उदासीन स्थिति को बनाये रखना चाहिए। उनके प्रति राग रखने से, उनका किसी भी प्रकार से, मन, वाणी और शरीर से समर्थन करने से, साधक के चित्त में वैसे ही अधर्म के संस्कार बनकर उसके पतन का कारण बनेंगे; और उनके प्रति द्वेष रखने से, भी साधक दोष ग्रस्त होकर योगमार्ग से दूर हो जायेगा। इस विषय में यह सम्भव है कि वह यथासम्भव, उन मनुष्यों को अधार्मिक कार्यों को छोड़कर धर्ममार्ग पर चलने का उपदेश करता रहे, ताकि वे भी अपने दुःखों को दूर कर भविष्य में सुखी हो सकें; परन्तु इस प्रकार के उपदेश की असफलता होने पर भी चित्त में किसी प्रकार की खिन्नता नहीं लानी चाहिए।

यहाँ यह समझना चाहिए कि पुण्यात्माओं के प्रति मुदिता और अपुण्यात्माओं के प्रति उपेक्षा की भावना प्रधान है, तथा मैत्री और करुणा रूपी अन्य दोनों भावनायें मनुष्यों की पुण्य-अपुण्य वृत्तियों के अनुसार ही प्रभावित होती है। उदाहरण के लिए कोई अपुण्य = अधर्म मार्ग पर चलने वाला मनुष्य, लोक में, अधर्म से धन- सम्पत्ति को एकत्र करता हुआ लौकिक सुख-साधनों से सम्पन्न होकर लौकिक रूप से सुखी होता है, तो भी उसके प्रति, अपुण्यात्मा होने के कारण, उपेक्षा का भाव ही चित्त में रखना चाहिए; अगर हम उसके सुख-साधनों को देखकर मैत्री का भाव रखेंगे तो उस अधार्मिक व्यक्ति के संग से, उसके दोषों से प्रभावित होकर हम अपना व्यवहार भी दूषित कर लेंगे।

इस प्रकार इन चार प्रकार के मनुष्यों के प्रति उपर्युक्त प्रकार से व्यवहार करने से साधक के चित्त में ईर्ष्या, घृणा, तथा राग-द्वेष की भावना न बनने से, उसका चित्त प्रसन्नता और निर्मलता को प्राप्त करता है। क्योंकि राग और द्वेष दोनों ही मुख्यरूप से चित्त में विक्षिप्तता को उत्पन्न करने वाले होते हैं। राग-द्वेष से युक्त चित्त में ही ईर्ष्या, घृणा, काम, क्रोध आदि अन्य आसुरी भाव उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार से विक्षिप्त चित्त होने पर योग मार्ग पर चलना सम्भव नहीं होता तथा साधक उपलब्ध समाधि की स्थिति से दूर होता जाता है। राग-द्वेष के समूल नाश होने पर ही साधक का चित्त एकाग्र हो पाता है। अतः इनके समूल नाश हेतु ही इन मैत्री आदि परिकर्मों का प्रथम उपदेश किया गया है। इस प्रकार की स्थिति सम्पादन से साधक के चित्त में सत्यधर्म का प्रकाश उत्पन्न होता है, जिससे साधक का चित्त स्थिर होकर शान्त तथा निर्मल हो जाता है। ये सभी उपर्युक्त साधन समाधि प्राप्ति के लिए बाह्य साधन ही हैं। इन मैत्री आदि साधनों के सम्पादन से चित्त निर्मल होकर सम्प्रज्ञात समाधि को प्राप्त करने के योग्य हो जाता है।