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वीतरागविषयं वा चित्तम्॥३७॥

In Hindi:

पदपाठ : वीतरागविषयम् वा चित्तम्॥

हिंदी में अर्थ : (वा) अथवा (वीतरागविषयम्) वीतराग = विषयों से पृथक् हो गया है राग जिसका अथवा जिस चित्त में राग रूपी विषय ही नहीं है ऐसा (चित्तम्) चित्त स्थिरता को प्राप्त होता है॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : वीतरागचित्तालम्बनोपरक्तं वा योगिनश्चित्तं स्थितिपदं लभत इति॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (वा) अथवा (वीतरागचित्तालम्बनोपरक्तम्) राग से रहित चित्त रूपी ध्येयविषय का आलम्बन करने वाले (योगिनः) योगी का (चित्तम्) चित्त (स्थितिपदम्) स्थितिपद = स्थिरता को (लभते इति) प्राप्त करता है॥

वैदिक वृत्ति : चित्त की स्थिरता प्राप्ति का अन्य उपाय रागरहित चित्त का आलम्बन है। अर्थात् जिसका चित्त वीतरागता को प्राप्त हो गया है ऐसे चित्त का आलम्बन करने से योगी का चित्त स्थिरता को प्राप्त कर लेता है। “वीतरागविषयम्” का अर्थ है — वीतः अपगतो रागो यस्मात् स वीतरागः, स वीतरागविषयः = ध्येयविषयो यस्य तत् वीतरागविषयं चित्तम्॥ वीतराग = जिसका राग सर्वथा पृथक् हो गया है; रागहीन चित्त को आलम्बन = ध्येयविषय बनाने वाला चित्त स्थिति = एकाग्रता का प्राप्त करता है। भोज ने वीतराग का अर्थ करते हुए कहा है — वीतरागः परित्यक्तविषयाभिलाषः॥ अर्थात् जिसने विषयों की अभिलाषा = तृष्णा को त्याग दिया है वह वीतराग कहाता है; और ऐसे चित्त में अविद्यादि क्लेशों का निवारण हो जाता है।

योगसूत्र १.११ के भाष्य में महर्षि व्यास ने सभी वृत्तियों को सुख-दुःख-मोह रूप कहा है। सुख के पीछे रहने वाला राग है। दुःख का सम्बन्ध भी राग से है; क्योंकि किन्हीं विषयों = भोगों में राग होने से, उन विषयों = भोगों की अप्राप्ति के कारण होने वाले दुःख में राग ही कारण है। इसी प्रकार मोह का एक कारण राग ही है; यथा सांसारिक पुरुषों, सम्बन्धियों तथा पदार्थों में, राग के कारण ही मोह उत्पन्न होता है। अतः इन सभी सुख, दुःख और मोह रूप वृत्तियों के मूल में राग भी किसी न किसी स्तर पर उपस्थित है। इस राग से रहित स्थिति सम्पादन करने से, चित्त में स्थिरता = एकाग्रता की प्राप्ति सम्भव होती है।

महर्षि मनु ने भी सांसारिक विषयों से विरक्ति हेतु, निम्न प्रकार के चिन्तन का निर्देश मानवमात्र के लिए दिया है —

अवेक्षेत गतीर्नृणां कर्मदोषसमुद्भवाः। निरये चैव पतनं यातनाश्च यमक्षये॥

विप्रयोगं प्रियैश्चैव संयोगं च तथाऽप्रियैः। जरया चाभिभवनं व्याधिभिश्चोपपीडनम्॥

देहादुत्क्रमणं चास्मात्पुनर्गर्भे च सम्भवम्। योनिकोटिसहस्रेषु सृतीश्चास्यन्तरात्मनः॥ मनु॰ ६.६१-६३॥

अर्थात् कर्मों के दोषों से होने वाली मनुष्यों की कष्टयुक्त बुरी गतियों और कष्टों को भोगना तथा प्राणक्षय में मृत्यु के समय होने वाली पीड़ाओं को विचारे और विचारकर मुक्ति के लिए प्रयत्न करे॥ और प्रियजनों से वियोग हो जाना तथा शत्रुओं से सम्पर्क होना और उससे फिर कष्ट प्राप्ति होना और बुढ़ापे से आक्रान्त होना तथा रोगों से पीडि़त होना और फिर इस शरीर से जीव का निकल जाना गर्भ में पुनः जन्म लेना और इस प्रकार इस जीव का सहस्रों प्रकार की अर्थात् अनेकविध योनियों में आवागमन होना — इनको विचारे और इनके कष्टों को देखकर मुक्ति में मन को लगावे।

वस्तुतः कर्मों के मूल में अविद्यादि क्लेशों, मुख्यतया राग-द्वेष, कारण रूप से उपस्थित होने से ही जीवात्मा = पुरुष क्लिष्ट वृत्ति-क्लिष्ट संस्कार-क्लिष्ट वृत्ति चक्र में फंसा हुआ जन्म-मरण रूपी संसार चक्र में लगा रहता है। अतः पूर्वोक्त प्रकार से दोषों = दुःखों को देखता हुआ मनुष्य, वैराग्य को प्राप्त कर, विषयों से विरक्त हो सकता है।

गीता में भी रागरहितता से ही चित्त की प्रसादता = एकाग्रता सम्पादन का वर्णन किया गया है—

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्। आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥ गीता २.६४॥

अर्थात् संयत आत्मा वाला मनुष्य अपने वश में की हुई और राग तथा द्वेष से वियुक्त = रहित, इन्द्रियों के द्वारा विषयों का सेवन करता हुआ प्रसाद = चित्त की प्रसन्नता = निर्मलता = एकाग्रता को प्राप्त करता है।

कुछ भाष्यकारों ने इस सूत्र के भाष्य में सनकादि, कृष्णद्वैपायन = व्यास, दतात्रेय आदि विरक्त = वीतराग ऋषियों = योगियों के चित्त को आलम्बन करने से चित्त की स्थिरता प्राप्ति को कहा है। इस प्रकार के उल्लेख में मूल भावना यह है कि जिस तरह से ये योगी विरक्तता का आलम्बन कर मुक्त हुए, उसी तरह हम भी आचरण करें। वस्तुतः इस प्रकार का कोई उल्लेख व्यासभाष्य और भोजवृत्ति में नहीं है। ऐसा उल्लेख आचार्य वाचस्पति मिश्र ने अपनी टीका तत्त्ववैशारदी में किया है। उसी के आधार पर ही वर्त्तमान काल के पौराणिक भाष्यकारों ने ऐसा व्याख्यान किया है। पूर्वकाल के योगियों के चित्त का आलम्बन तो निम्न कारणों से, सम्भव ही नहीं है —

१. महर्षि पतञ्जलि ने परचित्तज्ञान की विभूति “प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम्” योगसूत्र ३.१९ में कही है। इसके अनुसार योगी को दूसरे व्यक्ति के ज्ञान में संयम करने पर उसके चित्त का ज्ञान हो जाता है। इस सूत्र और इस पर व्यासभाष्य में पूर्वयोगियों के चित्तज्ञान का कोई वर्णन नहीं है। वरन् अगले ही सूत्र में कहा है “न च तत्सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात्” (३.२०) जिसके अर्थ से यह स्पष्ट होता है कि दूसरे के चित्त में संयम करने से परचित्त का ज्ञान आलम्बनसहित नहीं होता, क्योंकि परचित्त का जो आलम्बन है, वह योगी के संयम का विषय नहीं होता। इन सूत्रों से यह स्पष्ट होता है कि वर्त्तमान में उपस्थित अन्य व्यक्तियों के ही ज्ञान में संयम करने से योगी को उनके चित्त का ज्ञान होता है, परन्तु उस दूसरे व्यक्ति के चित्त के आलम्बन का ज्ञान नहीं होता। इन सूत्रों पर विशेष व्याख्यान यथास्थान देखें।

२. पूर्वकाल में हुए योगियों को यदि कैवल्य की प्राप्ति हो चुकी है तो उनका चित्त तो पहले ही प्रकृति में लीन हो चुका होगा। अगर कैवल्य प्राप्त नहीं हुआ तो उन पुरुषों का चित्त तो उनके साथ ही होगा अर्थात् वह पुरुष = आत्मा जहाँ कहीं भी परमात्मा की व्यवस्था में ब्रह्माण्ड में अपने कर्मानुसार होंगी वही उनका चित्त भी उनके साथ ही सूक्ष्मशरीर के अंग के रूप में होगा, जिसकी स्थिति (ब्रह्माण्ड में) का निश्चितरूपेण ज्ञान होना अन्य पुरुषों = आत्माओं के लिए सम्भव ही नहीं है। अतः ऐसी दोनों ही स्थितियों में उन पूर्वकाल में योगियों के चित्त का आलम्बन सम्भव ही नहीं है।

हाँ, यह तो सम्भव है कि पूर्वकाल में हुए विरक्त योगियों के चरित्र का चिन्तन कर, उनके अनुसार अपने चित्त का निर्माण कर = सम्मुन्नत कर चित्त की स्थिरता = एकाग्रता को प्राप्त कर सकते हैं। ऐसा प्रयास अपने काल में उपलब्ध वीतराग, तत्त्ववेता योगियों की सन्निधि में उनके अनुकूल तथा शास्त्रानुकूल आचरण करते हुए, वैराग्य का सम्पादन करते हुए, विषयों में उपरोक्त प्रकार (मनु॰ ६.६१-६३) से दोषों, हानियों, दुःखों को देखते हुए, अपने चित्त को भी सभी प्रकार से, सर्वथा रागरहित बनाते हुए ही चित्त की स्थिरता = एकाग्रता को प्राप्त किया जा सकता है। पुरुष द्वारा अपने जीवन में वीतरागता = विरक्ति को लाए बिना चित्त की स्थिरता = एकाग्रता प्राप्ति सम्भव नहीं हो सकती।