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क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनता समापत्तिः॥ ४१॥

In Hindi:

पदपाठ : क्षीणवृत्तेः अभिजातस्य एव मणेः ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत् स्थ तद् अञ्जनता समापत्तिः॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : अथ लब्धस्थितिकस्य चेतसः किंस्वरूपा किंविषया वा समापत्तिरिति, तदुच्यते—

भूमिका हिंदी अर्थ : (अथ) अब (लब्धस्थितिकस्य) परिकर्मों से स्थिति = स्थिरता को प्राप्त हुए (चेतसः) चित्त की (समापत्तिः) समापत्ति = ध्येयविषय में तदाकार प्रतीति = सम्प्रज्ञात समाधि (किम् स्वरूपा) किस स्वरूप वाली (वा) और (किम् विषया इति) किस विषय वाली होती है ? (तद् उच्यते) वह बताया जाता है —

हिंदी में अर्थ : (अभिजातस्य मणेः) शुद्ध निर्मल स्फटिक मणि के (एव) समान (क्षीणवृत्तेः) राजस और तामस वृत्ति रहित चित्त की (ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु) ग्रहीता = पुरुष = जीवात्मा में, ग्रहण = इन्दियों में और ग्राह्य = स्थूल व सूक्ष्म ध्येय पदार्थों में, अर्थात् (तत् स्थ) उन उन आलम्बनों में स्थित होकर (तद् अञ्जनता) उन के रूप जैसा = तद्रूपता = तदाकार प्रतीति होना ही (समापत्तिः) समापत्ति = सम्प्रज्ञात समाधि कहलाती है॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : क्षीणवृत्तेरिति प्रत्यस्तमितप्रत्ययस्येत्यर्थः। अभिजातस्येव मणेरिति दृष्टान्तोपादानम्। यथा स्फटिक उपाश्रयभेदात्तत्तद्रूपोपरक्त उपाश्रयरूपाकारेण निर्भासते। तथा ग्राह्यालम्बनोपरक्तं चित्तं ग्राह्यसमापन्नं ग्राह्यस्वरूपाकारेण निर्भासते। तथा भूतसूक्ष्मोपरक्तं भूतसूक्ष्मसमापन्नं भूतसूक्ष्मस्वरूपा-भासं भवति। तथा स्थूलालम्बनोपरक्तं स्थूलरूपसमापन्नं स्थूलरूपाभासं भवति। तथा विश्वभेदोपरक्तं विश्वभेदसमापन्नं विश्वरूपाभासं भवति। तथा ग्रहणेष्वपीन्द्रियेषु दृष्टव्यम्। ग्रहणालम्बनोपरक्तं ग्रहणसमापन्नं ग्रहणस्वरूपाकारेण निर्भासते। तथा ग्रहीतृपुरुषालम्बनोपरक्तं ग्रहीतृपुरुषसमापन्नं ग्रहीतृपुरुषस्वरूपाकारेण निर्भासते। तथा मुक्तपुरुषालम्बनोपरक्तं मुक्तपुरुषसमापन्नं मुक्तपुरुषस्वरूपाकारेण निर्भासते इति।

तदेवमभिजातमणिकल्पस्य चेतसो ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु पुरुषेन्द्रियभूतेषु या तत्स्थतदञ्जनता तेषु स्थितस्य तदाकारापत्तिः सा समापत्तिरित्युच्यते॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (क्षीणवृत्तेः इति) सूत्र में “क्षीणवृत्तेः” शब्द से (प्रत्यस्तमित) अस्त = शान्त हो गई हैं (प्रत्ययस्य) राजस और तामस वृत्तियाँ जिस चित्त की (इति अर्थः) यह अर्थ है। उस चित्त के लिए (अभिजातस्य मणेः) शुद्ध = निर्मल स्फटिक मणि (एव इति) के समान (दृष्टान्तोपादानम्) दृष्टान्त का ग्रहण किया गया है। (यथा) जैसे (स्फटिक) स्वच्छ स्फटिक मणि (उपाश्रयभेदात्) समीपस्थ भिन्न-भिन्न पदार्थों के आश्रय से (तत्तद्रूपोपरक्तः) उन-उन पदार्थों के रूप से उपरक्त = प्रतिबिम्बित = उपरञ्जित होकर (उपाश्रयरूपाकारेण) उस समीपस्थ पदार्थ के रूपाकार = रूपवाला (निर्भासते) भासित = प्रतीत होता है; (तथा) वैसे ही (चित्तम्) उपर्युक्त प्रकार का = राजस और तामस वृत्तियों से रहित निर्मलता और एकाग्रता को प्राप्त चित्त (ग्राह्यालम्बनोपरक्तम्) ग्राह्यविषय = स्थूल और सूक्ष्म ध्येय पदार्थों के आलम्बन से उपरक्त होता हुआ (ग्राह्यसमापन्नम्) ग्राह्य पदार्थों के साथ तदाकारता को प्राप्त होकर (ग्राह्यस्वरूपाकारेण) ग्राह्य पदार्थों के स्वरूप के समान = के आकार का (निर्भासते) भासता है = प्रतीत होता है। (तथा) वैसे ही (भूतसूक्ष्मोपरक्तम्) भूतसूक्ष्म = सूक्ष्मभूतों = पञ्च तन्मात्राओं से उपरक्त चित्त (भूतसूक्ष्मसमापन्नम्) सूक्ष्मभूतों के आकार वाला होकर (भूतसूक्ष्मस्वरूपाभासम्) सूक्ष्मभूतों = तन्मात्राओं के आकार जैसा भासित (भवति) होता है। (तथा) वैसे ही (स्थूलालम्बनोपरक्तम्) स्थूल भूतों = पञ्च महाभूतों के आलम्बन से उपरक्त चित्त (स्थूलरूपसमापन्नम्) स्थूल भूतों के आकार वाला होकर (स्थूलरूपाभासम्) स्थूलभूतों के आकार जैसा भासित (भवति) होता है। (तथा) वैसे ही (विश्वभेदोपरक्तम्) विश्वभेद = समस्त चेतन प्राणियों तथा जड़ घटादि पदार्थों के आलम्बन से उपरक्त चित्त (विश्वभेदसमापन्नम्) विश्वभेद = विविध = तत्-तत् आकारों को प्राप्त हुआ (विश्वरूपाभासम्) उन-उन प्राणियों और पदार्थों के स्वरूप जैसा भासित (भवति) होता है।

(तथा) इसी प्रकार (ग्रहणेषु) ग्रहण = विषयों के ग्रहण करने के साधन (इन्द्रियेषु) इन्द्रियों में (अपि) भी (दृष्टव्यम्) जानना चाहिए। (ग्रहणालम्बनोपरक्तम्) ग्रहण = ज्ञानेन्द्रियों के आलम्बन से उपरक्त = उपरञ्जित चित्त (ग्रहणसमापन्नम्) ग्रहण = इन्द्रियों के आकार वाला होकर (ग्रहणस्वरूपाकारेण) ग्रहण = इन्द्रियों के स्वरूप के आकार का (निर्भासते) भासित होता है।

(तथा) उसी प्रकार (ग्रहीतृपुरुषालम्बनोपरक्तम्) ग्रहीता = पुरुष = आत्मा के आलम्बन से उपरक्त चित्त (ग्रहीतृपुरुषसमापन्नम्) ग्रहीता = आत्मा के आकार वाला होकर (ग्रहीतृपुरुषस्वरूपाकारेण) ग्रहीता = आत्मा के स्वरूप के आकार का (निर्भासते) भासित होता है। (तथा) वैसे ही (मुक्तपुरुषालम्बनोपरक्तम्) मुक्तपुरुष के आलम्बन से उपरक्त चित्त (मुक्तपुरुषसमापन्नम्) मुक्तपुरुष के आकार वाला होकर (मुक्तपुरुषस्वरूपाकारेण) मुक्तपुरुष के स्वरूप के आकार का (निर्भासते इति) भासित होता है।

(तत्) वह (एवम्) इस प्रकार (अभिजातमणिकल्पस्य) शुद्ध = निर्मल स्फटिक मणि के समान (चेतसः) चित्त की (ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु) ग्रहीता, ग्रहण और ग्राह्य अर्थात् (पुरुषेन्द्रियभूतेषु) पुरुष = आत्मा, इन्द्रिय = ज्ञानेन्द्रियाँ और स्थूल तथा सूक्ष्म भूतों आदि आलम्बनों में (या) जो (तत्स्थतदञ्जनता) तत्स्थतदञ्जनता अर्थात् (तेषु) उन-उन पदार्थों में (स्थितस्य) स्थित हुए चित्त की (तदाकारापत्तिः) तदाकार अनुभूति = उनके आकार जैसा प्रतीति होना है (सा) वह (समापत्तिः) समापत्ति = सम्प्रज्ञात समाधि (इति उच्यते) कहलाती है॥

वैदिक वृत्ति : महर्षि पतञ्जलि ने योगसूत्र १.१७ में सम्प्रज्ञात समाधि के चार भेदों का निरुपण वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता रूपी आलम्बनों = ध्येय विषयों के आधार पर किया है। चित्त की सम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में स्थिति क्या होती है ? अथवा सात्त्विक परिणाम को प्राप्त हुए चित्त की किस अवस्था को सम्प्रज्ञात समाधि कहा जाए? इस विषय को महर्षि पतञ्जलि इस सूत्र में स्पष्ट कर रहे हैं।

योगमार्ग का पथिक अभ्यास और अपरवैराग्य के सम्पादन द्वारा जब चित्त की राजस और तामस वृत्तियों को क्षीण = नष्ट कर देता है, तो उस समय चित्त की वृत्तियाँ सत्त्वगुण प्रधान होती हैं। इस प्रकार सत्त्वगुण प्रधान अवस्था को प्राप्त चित्त, पूर्वकथित विभिन्न प्रकार के परिकर्मों के सम्पादन से, स्थिरता = एकाग्रता को प्राप्त कर लेता है। ऐसे स्थिर और एकाग्र चित्त में सम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति होती है। उस सम्प्रज्ञात समाधि का स्वरूप क्या होता है ? उस अवस्था में चित्त की स्थिति कैसी होती है ? इस स्थिति को समझाने हेतु उदाहरण दिया है — शुद्ध = निर्मल स्फटिक मणि के समान।

जिस प्रकार शुद्ध = स्वच्छ स्फटिक मणि अपने समीप प्राप्त हुए लाल, पीले, नीले आदि रंगों वाली वस्तुओं के कारण से उन रंगों से प्रतिबिम्बित हुआ, उन लाल, पीले, नीले आदि रंग वाला भासता है = प्रतीत होता है; उसी प्रकार से शुद्ध सत्त्वगुण वाला चित्त भी विभिन्न प्रकार के विषयों के आलम्बन से रंगा हुआ = उपरक्त होकर = उन-उन विषयों में स्थित होकर, उन-उन विषयों के साथ तदाकार हुआ = तदाकारिता को प्राप्त होकर, उन-उन पदार्थों के स्वरूप के समान = उनके आकार वाला होकर भासता है। चित्त की इसी स्थिति को समापत्ति के नाम से कहा गया है। अतः स्थिरता को प्राप्त हुए चित्त में हुई समाधि को समापत्ति कहा गया है, और यही समापत्ति ही सम्प्रज्ञात समाधि कहलाती है।

आलम्बन हेतु इन विषयों को तीन भागों में विभक्त किया गया है, जिनको ग्राह्य, ग्रहण और ग्रहीता के नाम से कहा गया है। ग्राह्य से स्थूल और सूक्ष्म विषयों = भूतों का; ग्रहण से इन्द्रियों का; और ग्रहीता से आत्मा = पुरुष का आलम्बन माना गया है। यहाँ सूक्ष्म विषयों से स्थूल भूतों के उपादान सूक्ष्म परमाणुओं को लिया गया है; और ग्रहण से इन्द्रियों के रूप में बाह्य इन्द्रियों में ज्ञानेन्द्रियाँ तथा कर्मेन्द्रियाँ को तथा आन्तरिन्द्रिय में मन = चित्त, अंहकार तथा बुद्धि (अन्तःकरण) का समावेश जानना चाहिए; क्योंकि इन्हीं के माध्यम से ही पुरुष ज्ञान को प्राप्त करता है। इसी प्रकार ज्ञानेन्द्रियों से भी अतीन्द्रिय शक्तियों से तात्पर्य है, न कि नेत्रादि गोलकों का आलम्बन है। नेत्रादि बाह्य गोलक तो स्थूल और सूक्ष्म विषयों में ग्रहीत हो जाते हैं। अतः ब्रह्माण्ड में उपलब्ध सभी विषय, स्थूल भूतों से लेकर सूक्ष्म प्रकृति पर्यन्त, तथा जीवात्मा = पुरुष सभी इन्हीं तीनों में संगृहीत हो जाते हैं।

सूत्र में ग्रहीता, ग्रहण और ग्राह्य के क्रम विषयों का आलम्बन कहा गया है। सूत्र में उपरोक्त क्रम के निर्देश होने पर भी, योगाभ्यासी को आलम्बन के लिए स्थूल विषयों से आरम्भ करके, इन्द्रियों, सूक्ष्म विषयों को क्रमशः तथा अन्त में जीवात्मा को ध्येय विषय बनाना होता है। इसी हेतु महर्षि व्यास ने सूत्र की व्याख्या में इसी क्रम को रखा है। उन्होंने सर्वप्रथम ग्राह्य से स्थूल और सूक्ष्म विषयों के आलम्बन को कहा है; तत्पश्चात् विश्व में उपलब्ध अन्य प्राणियों और पदार्थों के आलम्बनों के आश्रय से चित्त की तदाकारिता का वर्णन किया है। इन्हीं ग्राह्य पदार्थों के आलम्बन के साथ, जिनसे इन ग्राह्य विषयों को ग्रहण किया जाता है अर्थात् ग्रहण = इन्द्रियों का आलम्बन; और इन बाह्य पदार्थों के आलम्बन के पश्चात् ग्रहीता से पुरुष = आत्मा के आलम्बन को कहा है। व्यासभाष्य में मुक्तपुरुष के आलम्बन से मोक्ष के अधिकारी जीवनमुक्त देहधारी पुरुषों का आलम्बन ही लेना चाहिए, न कि मुक्ति को प्राप्त हुई आत्माओं का आलम्बन।

इस प्रकार के आलम्बनों से सम्प्रज्ञात समाधि को प्राप्त योगी इन आलम्बित पदार्थों के यथार्थ ज्ञान को प्राप्त करता है। वस्तुतः इसी सम्प्रज्ञात समाधि में ही विभिन्न पदार्थों के माध्यम से, चित्त उन-उन पदार्थों के साथ तदाकार होकर, उन पदार्थों का यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर लेता है। अर्थात् स्थूल और सूक्ष्म विषयों = पदार्थों के आलम्बन से उन स्थूल और सूक्ष्म पदार्थों का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करता है; इन्द्रियों के आलम्बन से इन्द्रियों के विषय में यथार्थ ज्ञान को प्राप्त करता है; और अन्त में आत्मा के आलम्बन आत्मस्वरूप का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करता है। परन्तु साधक को इस अवस्था से पूर्व वेदादि सत्यशास्त्रों में इन-इन विषयों पर उपलब्ध शाब्दिक ज्ञान को प्राप्त कर लेना चाहिए, तभी सम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में उन विषयों का साक्षात्कार होकर उनका सम्यग्ज्ञान = सम्प्रज्ञान हो पायेगा। क्योंकि मनन, निदिध्यासन और साक्षात्कार से पूर्व श्रवण और पठन के द्वारा विभिन्न आलम्बनों के विषय में शाब्दिक ज्ञान का होना परम आवश्यक है। अतः निदिध्यासन = समाधि की अवस्था से पूर्व विभिन्न विषयों में आगम = शब्दज्ञान से रहित योगाभ्यासी को सम्प्रज्ञात समाधि का कोई लाभ नहीं हो सकता।

कई भाष्यकारों ने इस सूत्र की व्याख्या में ग्राह्य विषय से वितर्कानुगत और विचारानुगत सम्प्रज्ञात समाधि्ायों; ग्रहण से आनन्दानुगत सम्प्रज्ञात समाधि; तथा ग्रहीता से अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि को कहा है। यह भेद महर्षि व्यास और पतञ्जलि की भावना के अनुरूप नहीं है। व्यासभाष्य में इस प्रकार का कोई संकेत नहीं है। इन वितर्क आदि भेदों के सम्यक् ज्ञान हेतु योगसूत्र १.१७ पर, इस ग्रन्थ में, व्याख्या देखें।

हिंदी में टिप्पणी : श्रवणचतुष्ठय की व्याख्या करते हुए महर्षि दयानन्द लिखते हैं —

एक श्रवण - जब कोई विद्वान् उपदेश करे, तब शान्त ध्यान देकर सुनना। विशेष ब्रह्मविद्या के सुनने में अत्यन्त ध्यान देना चाहिये कि यह सब विद्याओं में सूक्ष्म विद्या है। सुनकर दूसरा मनन - एकान्त देश में बैठके सुने हुए का विचार करना। जिस बात में शंका हो पुनः पूछना। और सुनते समय बक्ता और श्रोता उचित समझें तो पूछना और समाधान करना। तीसरा निदिध्यसान - जब सुनने और मनन करने से निःसन्देह हो जाये तब समाधिस्थ होकर उस बात को देखना समझना कि वह जैसा सुना था विचारा था, वैसा ही है वा नहीं, ध्यान योग से देखना। चौथा साक्षात्कार अर्थात् जैसा पदार्थ का स्वरूप गुण और स्वभाव हो, वैसा यथातथ्य जान लेना, श्रवण चतुष्ठय कहाता है।

(सत्यार्थप्रकाश नवम् समुल्लास)

यहाँ श्रवण के साथ वेदादि सत्यशास्त्रों के पठन को भी सम्मिलित कर लेना चाहिए, शेष तीनों मनन, निदिध्यासन और साक्षात्कार की प्रक्रियाएँ वैसी ही हैं।