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स्वरसवाही विदुषोऽपि तथा रूढोऽभिनिवेशः॥९॥

In Hindi:

पदपाठ : स्वरसवाही विदुषः अपि तथा रूढः अभिनिवेशः॥

हिंदी में अर्थ : (स्वरसवाही) पूर्वजन्म में अनुभूत मृत्युदुःख, संस्कार रूप से वर्त्तमान रहने वाला जो (विदुषः) विद्वानों में (अपि) भी अन्य प्राणियों के समान उनके चित्त में (तथारूढः) समान रूप से विद्यमान रहने वाला मृत्यु का भय (अभिनिवेशः) अभिनिवेश क्लेश है॥

महर्षि दयानन्द व्याख्या : (स्वरसवा॰) पांचवॉं ‘अभिनिवेश’ क्लेश है, जो प्राणियों को नित्य आशा होती है कि हम सदैव शरीर के साथ बने रहें अर्थात् कभी मरें नहीं सो पूर्व जन्म के अनुभव से होती है और इसे पूर्वजन्म भी सिद्ध होता है। क्योंकि छोटे-छोटे कृमि चींटी आदि को भी मरण का भय बराबर बना रहता है, इसीसे इस क्लेश को ‘अभिनिवेश’ कहते हैं जो कि विद्वान् मूर्ख तथा क्षुद्रजन्तुओं में भी बराबर दीख पड़ता है। इस क्लेश की निवृत्ति उस समय होगी कि जब जीव परमेश्वर और प्रकृति अर्थात् जगत् के कारण को नित्य और कार्य द्रव्य के संयोग वियोग को अन्तिम जान लेगा। इन क्लेशों की शान्ति से जीव को मोक्ष सुख की प्राप्ति होती है॥ (ऋ० भू॰ मुक्तिविषय)

तथा योगशास्त्र में भी पुर्नजन्म का विधान किया है (स्वरस०) (सर्वस्य प्राणिन) इस एक प्राणियों की यह इच्छा नित्य देखने में आती है कि (भूयासमिति) अर्थात् मैं सदैव सुखी बना रहूँ, मरूँ नहीं। यह इच्छा कोई भी नहीं करता कि (मा न भूवं) अर्थात् मैं न होऊँ, ऐसी इच्छा पूर्वजन्म के अभाव में कभी नहीं हो सकती, यह अभिनिवेश क्लेश कहलाता है, जो कि कृमि पर्यन्त को भी मरण का भय बराबर होता है, यह व्यवहार पूर्वजन्म की सिद्धि को जनाता है॥ (ऋ० भू॰ पुनर्जन्मविषयः)

प्राचीन ॠषि भाष्य : सर्वस्य प्राणिन इयमात्माशीर्नित्या भवति मा न भूवं भूयासमिति। न चाननुभूतमरणधर्मकस्यैषा भवत्यात्माशीः। एतया च पूर्वजन्मानुभवः प्रतीयते। स चायमभिनिवेशः क्लेशः स्वरसवाही कृमेरपि जातमात्रस्य प्रत्यक्षानुमानागमैरसम्भावितो मरणत्रास उच्छेददृष्ट्यात्मकः पूर्वजन्मानुभूतं मरणदुःखमनुमापयति। यथा चायमत्यन्तमूढेषु दृश्यते क्लेशस्तथा विदुषोऽपि विज्ञातपूर्वापरान्तस्य रूढः। कस्मात् ? समाना हि तयोः कुशलाकुशलयोर्मरणदुःखानुभवादियं वासनेति॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (सर्वस्य प्राणिनः) सभी प्राणियों की (इयम्) यह (आत्माशीः) आत्मविषयक इच्छा (नित्या) सदा (भवति) होती है कि (मा न भूवम्) “मैं न होऊँ” ऐसा न हो बल्कि (भूयासम् इति) “सदा बना रहूँ” इस प्रकार की कामना होती है। (अननुभूतमरणधर्मकस्य) जिस प्राणी ने पूर्वजन्म में मरणक्रिया को अनुभव न किया हो उसको (एषा) यह (आत्माशीः) आत्मविषयक कामना = इच्छा (न च भवति) नहीं हो सकती। (एतया च) और इस कामना = इच्छा से (पूर्वजन्मानुभवः) पूर्वजन्म में मरणदुःख का अनुभव ही (प्रतीयते) प्रतीत होता है। (स च अयम्) और वही यह (स्वरसवाही) अपने संस्कार रूप से विद्यमान हुआ (अभिनिवेशः क्लेशः) मृत्युभय रूपी अभिनिवेश क्लेश, (जातमात्रस्य) सद्य उत्पन्न हुए (कृमेः अपि) कृमि, कीट आदि को भी, जिसको (प्रत्यक्षानुमानागमैः) प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम = शब्द प्रमाणों द्वारा वर्तमान जन्म में (असम्भावितः) असम्भावित = अनुभव न किया, ऐसा (उच्छेददृष्ट्यात्मकः) उच्छेद = विनाश रूपी (मरणत्रासः) मरण भय (पूर्वजन्मानुभूतम्) पूर्वजन्मों में अनुभव किए गए (मरणदुःखम्) मृत्यु के दुःख का (अनुमापयति) अनुमान कराता है। (यथा च) और जैसे (अयम् क्लेशः) यह अभिनिवेश क्लेश (अत्यन्तमूढेषु) अत्यन्त मूढ, बालक, बुद्धि रहित मानवेतर प्राणियों में (दृश्यते) देखा जाता है (तथा) वैसे ही (विदुषः अपि) विद्वान् को भी, (विज्ञातपूर्वापरान्तस्य) जिसने पुरुष की पूर्ववर्ती सांसारिक दशा तथा अपरान्त = मोक्ष दशा को जान लिया है, उसके चित्त में भी (रूढः) रूढ = उपस्थित रहता है। (कस्मात् ?) कैसे विद्वान् में भी यह क्लेश उपस्थित रहता है ? (हि) क्योंकि (तयोः) उन दोनों (कुशलाकुशलयोः) कुशल = विद्वान् और अकुशल = अविद्वान् = मूढ = मन्दमति, दोनों में (मरणदुःखानुभवाद्) मरण-दुःख के समान अनुभव के कारण (इयम् वासना) यह वासना (समाना इति) समान रूप से उपस्थित होती है॥

वैदिक वृत्ति : जीवमात्र, जो कि जन्म-मृत्यु रूपी संसारचक्र में अनन्त काल से अविद्या के कारण विभिन्न योनियों में जाता रहा है, को हर योनि में जन्म = शरीर प्राप्ति के पश्चात् मृत्यु = शरीर वियोग रूपी दुःख भी प्राप्त होता है। अर्थात् उसे हर जन्म में शरीर वियोग रूपी मृत्यु-दुःख की प्राप्ति अनन्त काल से होती रही है। इस मृत्युदुःख के संस्कार भी जीव के चित्त में स्थायी रूप से उपलब्ध हैं। इन्हीं संस्कारों के कारण ही वह वर्त्तमान जन्म में शरीरवियोग रूपी दुःख को प्राप्त करना नहीं चाहता। वह यह कामना करता है कि “मैं सदा इस शरीर के साथ बना रहूँ”, कभी भी “मैं न होऊँ” ऐसी स्थिति न आने पाये। वस्तुतः प्राणीमात्र की यह भावना मानवेतर योनियों में तो संस्कारों के कारण और मानव योनि में संस्कारों के साथ-साथ अविद्या के कारण होती है। यही अभिनिवेश क्लेश है। उसकी अविद्या यह है कि वह अपने को = स्वयं को = आत्मा को शरीर से भिन्न नहीं समझता; शरीर की उन्नति को अपनी उन्नति मानता है, और शरीर क्षय को अपना क्षय = नाश मानता है। इसी प्रकार धन, सम्पत्ति, परिवार आदि की समृद्धि एवं उन्नति को अपनी समृद्धि एवं उन्नति तथा उनके क्षय एवं नाश को अपना क्षय एवं नाश मानता है। वरन् जन्म-जन्मान्तर के संचित मृत्यु-दुःख के संस्कार तो आत्मा की नित्यता और शरीर की अनित्यता को ही दर्शाते हैं।

अपने पूर्वजन्म में अनुभूत मृत्यु-दुःख के संस्कारों के प्रभाव के कारण ही प्राणी मात्र में कृमि-कीट से लेकर, मनुष्यों में भी मूर्ख से विद्वान् तक को यह मृत्यु-दुःख का भय, मरणत्रास सन्तप्त करता है; और ऐसी कोई भी स्थिति आने पर उससे बचने का यथासम्भव प्रयत्न करता है। वर्तमान जन्म में न तो किसी प्राणी ने मृत्यु-दुःख का प्रत्यक्ष अनुभव किया और न ही अनुमान से जाना और बहुधा प्राणियों ने तो शब्द = आगम प्रमाण से भी इस मरणत्रास को नहीं जाना, परन्तु फिर भी ऐसी स्थिति में उस होने वाले मरण से बचने का प्रयत्न = चेष्टा, उसके चित्त में पूर्वजन्मानुभूत मृत्यु-दुःख के संस्कारों की स्थिति को ही सिद्ध करती है। महर्षि व्यास ने इस अभिनिवेश क्लेश को प्राणीमात्र में समान रूप से उपस्थित माना है, क्योंकि सभी जीवों ने पूर्व जन्मों में इस मृत्यु-दुःख को समान रूप से ही प्राप्त किया होता है और इसके संस्कार भी समान रूप से सभी जीवों के चित्त में उपस्थित होते हैं।

महर्षि व्यास कहते है कि कृमि को भी मरणभय होता है। इसका उदाहरण समुद्रतट पर उत्पन्न होने वाले कछुए के बालकों में देखा जा सकता है, जो अण्डों से निकलते ही, वहाँ पर उपस्थित परजीवियों से अपने प्राणों की रक्षा हेतु, समुद्र की ओर भागते हैं। उन तत्काल उत्पन्न हुए कछुए के बच्चों ने मृत्यु दुःख देखा ही नहीं, परन्तु परजीवी प्राणियों की उपस्थिति से उनके चित्त में मृत्यु का भय उत्पन्न होना, अभिनिवेश क्लेश को तथा पूर्व जन्मों में अनुभूत मृत्यु-दुःख को प्रमाणित करता है।

इस अभिनिवेश क्लेश की निवृत्ति का उपाय बताते हुए महर्षि दयानन्द लिखते हैं “जब जीव परमेश्वर और प्रकृति अर्थात् जगत् के कारण को नित्य और कार्य द्रव्य के संयोग वियोग को अन्तिम जान लेगा। इन क्लेशों की शान्ति से जीव को मोक्ष सुख की प्राप्ति होती है।” वस्तुतः अविद्या को अग्रिम चार क्लेशों की जननी, उत्पत्ति स्थल = क्षेत्र कहा है। अतः जीव जब तक अविद्या का नाश यथार्थ ज्ञान से = श्रवण, मनन, निदिध्यासन और साक्षात्कार रूपी श्रवण चतुष्ठय की प्रक्रिया से नहीं करेगा, तब तक अनित्य शरीर आदि को नित्य मानता हुआ, अपने आप को शरीर अथवा शरीर का भाग मानता हुआ, इस शरीर के नाश के साथ अपना नाश, इस शरीर से वियोग को अपनी मृत्यु जानकर मरणत्रास से त्रस्त रहेगा। यहाँ यह ध्यान रखना होगा कि जिस प्रकार मात्र शाब्दिक ज्ञान से, श्रवण मात्र से अविद्या दूर नहीं होती, उसी प्रकार अविद्या के कारण से होने वाले अन्य क्लेश = अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश भी दूर नहीं हो सकते। अविद्या के नाश के साथ ही इनका नाश अौर अविद्या की परिपक्वता, वृद्धि के साथ मनुष्य मात्र में अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश रूपी क्लेश भी परिपक्व होते, वृद्धि को प्राप्त होते हैं।

अतः विद्या = विवेकख्याति को प्राप्त हुए योगी को अन्य क्लेशों के समान यह अभिनिवेश क्लेश भी सन्तप्त नहीं करता। यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए जब तक राग आदि के मूल मेंं अविद्या है तभी तक ये हेय कोटि में आते हैं, परन्तु जब इनका कारण विद्या होती है तो ये क्लेश न रह कर उपादेय की श्रेणी में आ जाते हैं। यथा विद्या ग्रहण, वेदादि शास्त्रों के पठन-पाठन, धर्मयुक्त आप्त लोगों के मार्ग में चलने आदि से प्राप्त होने वाले यथार्थ सुख की कामना से इनमें राग का होना; वेद-विरुद्ध कार्यों को करने, काम-क्रोध-लोभ-मोह से प्रभावित होकर कार्य करने, तथा क्लिष्ट वृत्तियों को अपनाने आदि से प्राप्त होने वाले फलस्वरूप दुःखों के कारण से इनकी हेयता को जानते हुए, इनसे दूर रहते हुए अनागत दुःखों का प्रतिकार करना; तथा जन्म-जन्मान्तर के मृत्यु-दुःख के संस्कारों को जानकर, आगे से न मरने की कामना (अभिनिवेश) से, इस जीवन में मुक्ति का उपाय करने से; ये सभी क्लेश न रह कर मनुष्य के लिए अक्लिष्ट वृत्ति-संस्कार-वृत्ति चक्र को ही चालू कर के उसे संसारचक्र से दूर करने में समर्थ करते हैं। इस प्रकार से ये विद्याजनित होने पर मनुष्य के लिए उपादेय की श्रेणी में आ जाते हैं।