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तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा॥२१॥

In Hindi:

पदपाठ : तद् अर्थ एव दृश्यस्य आत्मा॥

हिंदी में अर्थ : (तद् अर्थ) उस पुरुष = जीवात्मा के भोग और अपवर्ग रूपी अर्थ = प्रयोजन के लिए (एव) ही (दृश्यस्य) दृश्य = प्रकृति का (आत्मा) स्वरूप है॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : दृशिरूपस्य पुरुषस्य कर्मरूपतामापन्नं दृश्यमिति तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा भवति॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (दृशिरूपस्य पुरुषस्य) द्रष्टा रूप चेतन पुरुष की (कर्मरूपताम्) कर्मरूपता को (आपन्नम्) प्राप्त होने वाले (दृश्यम् इति) प्रकृति और उसके विकार हैं; अतः (तद् अर्थ) उस पुरुष के प्रयोजन के लिए (एव) ही (दृश्यस्य) दृश्य का (आत्मा) स्वरूप (भवति) प्रकट होता है॥

वैदिक वृत्ति : द्रष्टा = पुरुष के भोग और अपवर्ग हेतु ही प्रकृति कारण से कार्य रूप में, ईश्वर द्वारा लाई जाती है। प्रकृति के स्वरूप का प्रकट होना परार्थ है। सम्पूर्ण जगत् के सभी कार्य पदार्थ, सत्त्वादि गुणों के विभिन्न प्रकार के संघात है; और मिल कर बना हुआ = संहत् हुआ पदार्थ परार्थ कहा जाता है। वह संहत् पदार्थ, अचेतन होने से, स्वयं ही कारण से कार्य रूप में परिणित होने में असमर्थ होता है। कारण पदार्थ को विभिन्न प्रकार से संहत् कर विभिन्न परिणामों में परिणित करने वाला कोई स्वतन्त्र चेतन पदार्थ ही हो सकता है। अतः प्रकृति के सभी विकार, ईश्वर रूपी निमित्त कारण से ही विभिन्न रूपों से सत्ता में आते हैं।

ईश्वर पूर्णकाम होने से उसमें किसी प्रकार से भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजन का योग सिद्ध नहीं हो सकता। अतः दूसरे चेतन जीवात्मा रूपी पुरुष ही “पर” हैं, जिनके भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजनों को सिद्ध करना होता है। इस कारण महर्षि पतञ्जलि ये स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि प्रकृति स्वयं की भोक्ता नहीं परन्तु इसका भोक्ता द्रष्टा रूपी पुरुष है। जो सुख-दुःख को बुद्धि में मानते और पुरुष को शुद्ध, असङ्ग, निर्लेप मानते हुए उन सुख-दुःख आदि भोगों का साक्षी मात्र कह कर, उसको सुख-दुःख का भोक्ता नहीं मानते, वे भ्रम में हैं। वस्तुतः बुद्धि जड़ एवं प्रकृति का विकार होने से यह पुरुष के भोग और अपवर्ग को ही साधती है; न तो इसका स्वयं का कोई भोग और न इसका कोई अपवर्ग। ये दोनों तो पुरुष रूपी चेतन द्रष्टा में ही घटते हैं।