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यमनियमाऽऽसनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि॥२९॥

In Hindi:

पदपाठ : यमनियमाऽऽसनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयः अष्टौ अङ्गानि॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : तत्र योगाङ्गान्यवधार्यन्ते —

भूमिका हिंदी अर्थ : (तत्र) उस योगाङ्गानुष्ठान में (योगाङ्गानि) योग के अङ्गों का (अवधार्यन्ते) अवधारण = संख्या और स्वरूप से निश्चय किया जाता है —

हिंदी में अर्थ : (यमनियमाऽऽसनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयः) यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि (अष्टौ) ये आठ (अङ्गानि) योग के अङ्ग हैं॥

महर्षि दयानन्द व्याख्या : (यमनियमा॰) अर्थात् एक यम, दूसरा नियम, तीसरा आसन, चौथा प्राणायाम, पांचवाँ प्रत्याहार, छठी धारणा, सातवाँ ध्यान और आठवीं समाधि ये सब उपासना योग के अंग कहाते हैं। और आठ अंगों का सिद्धान्तरूप फल संयम है॥ (ऋ० भू॰ उपासना॰)

प्राचीन ॠषि भाष्य : यथाक्रममेषामनुष्ठानं स्वरूपं च वक्ष्यामः॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (यथाक्रमम्) क्रम के अनुसार (एषाम्) इन यमनियमादि योग के अङ्गों का (अनुष्ठानम्) अनुष्ठान (च) और (स्वरूपम्) स्वरूप को (वक्ष्यामः) कहेंगे॥

वैदिक वृत्ति : पुरुष के परमलक्ष्य = मोक्ष का उपाय विवेकख्याति, और विवेकख्याति की प्राप्ति का उपाय योग के अङ्गों का अनुष्ठान है। योग के वे अङ्ग यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि हैं। इनमें से प्रथम पाँच अङ्ग यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार सम्प्रज्ञात समाधि की सिद्धि में बहिरङ्ग साधन हैं और धारणा, ध्यान और समाधि सम्प्रज्ञात समाधि की सिद्धि में अन्तरङ्ग साधन हैं। परन्तु सम्प्रज्ञात समाधि के तीनों अन्तरङ्ग साधन भी निर्बीज समाधि = असम्प्रज्ञात समाधि के लिए भी बहिरङ्ग साधन हैं , क्योंकि असम्प्रज्ञात समाधि की सिद्धि का साक्षात् = प्रत्यक्ष उपाय परवैराग्य = पुरुषख्याति से हुई सत्त्वादि गुणों के प्रति भी तृष्णारहित स्थिति है।

योग के इन अङ्गों का अनुष्ठान = अभ्यास किस प्रकार से करना चाहिए ? इसका उत्तर है कि योग के अङ्गों का अनुष्ठान दीर्घकाल पर्यन्त = आजीवन, निरन्तर = लगातार और सत्कारपूर्वक = विद्या और श्रद्धापर्वूक करना चाहिए।

महर्षि दयानन्द कहते हैं कि इन आठ अङ्गों का सिद्धान्तरूप फल संयम है। अर्थात् इन आठ अङ्गों के अनुष्ठान का फल (१) संयम अर्थात् योगज विभूतियों की प्राप्ति हेतु योग्यता प्राप्त होना; तथा (२) योग के उद्देश्य चित्तवृत्तियों का निरोध (= संयम) होना है। किसी एक अङ्ग के अनुष्ठान मात्र से उपर्युक्त संयम की प्राप्ति होना सम्भव नहीं है; वरन् इन सभी का समग्र अनुष्ठान ही लक्षित है। अर्थात् उत्तर-उत्तर के अङ्ग के अनुष्ठान में पूर्व के अनुष्ठित अङ्गों का परित्याग अथवा निषेध न होकर, उन सबका भी अनुष्ठान उस काल में भी आवश्यक है। अर्थात् आसन के अनुष्ठान काल में यम नियमों का परित्याग न होकर उनका अनुष्ठान भी आवश्यक है; इसी प्रकार प्राणायाम के अनुष्ठान काल में यम, नियम और आसन का अनुष्ठान आवश्यक है; और इसी प्रकार क्रमशः समाधि के अनुष्ठान काल में पूर्व के सातों अङ्गों का अनुष्ठान भी आवश्यक है, उस अवस्था में भी, पूर्व के किसी भी अङ्ग का परित्याग अपेक्षित नहीं है; अन्यथा समाधि का सम्यक् अनुष्ठान ही सम्भव नहीं हो सकता। अतः किसी भी अङ्ग के साथ उसके पूर्व के अङ्गों के समग्र अनुष्ठान के बिना उस अङ्ग का अनुष्ठान नहीं हो सकेगा। क्योंकि पूर्व के अङ्गों का परित्याग करने से साधक की योगमार्ग में प्रगति हो ही नहीं सकती। जैसे कि — क्या आसन की सिद्धि काल में यमनियमों का परित्याग करना अपेक्षित है ? क्या प्रत्याहर की सिद्धि के काल में यम, नियम, आसन आदि का परित्याग करना चाहिए? और क्या समाधि की सिद्धि काल में यम, नियम से ध्यान तक के अङ्गों का परित्याग अपेक्षित है? अर्थात् किसी भी काल में किसी भी पूर्व के अङ्ग के अनुष्ठान का परित्याग नहीं हो सकता।

किसी भी साधक को सर्वप्रथम यम-नियमों का पालन मन, वाणी और शरीर से करना होता है। यम-नियमों के पालन से अविद्यादि क्लेशों के कारण, शरीर और चित्त में होने वाले बहुत से दोषों का नाश हो जाता है। इस प्रकार यम-नियमों के साथ-साथ आगे-आगे के अङ्गों का अनुष्ठान = अभ्यास करते हुए साधक समाधि तक पहुँचता है। और इसप्रकार अन्त में परवैराग्य के अभ्यास और सर्ववृत्ति निरोध की अवस्था का सम्पादन करता हुआ असम्प्रज्ञात समाधि को भी प्राप्त कर लेता है।

महर्षि पतञ्जलि द्वारा कथित आठों अङ्गों के समग्र अनुष्ठान को निम्न प्रकार से जानना चाहिए —अभ्यास करते समय में—

१. अहिंसा, सत्य आदि का पालन, और हिंसा, असत्य आदि का परित्याग करने से आन्तरिक शुद्धि का सम्पादन करना, यमों का पालन है।

२. शौच, तप आदि से बाह्य और आभ्यान्तर शुद्धि, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान का निरन्तर सेवन करना, नियमों का पालन है।

३. दीर्घकाल तक निश्चल होकर एक आसन पर बैठने का अभ्यास करना, आसन की सिद्धि है।

४. प्राण, अपान द्वारा मन को रोकने का अभ्यास करना, प्राणायाम का अनुष्ठान है।

५. मन को वश में करने हेतु इन्द्रियों को बाह्यविषयों से रोकने का अभ्यास, प्रत्याहार का अनुष्ठान है।

६. नासिकाग्र आदि देशों में वृत्तिमात्र से मन की स्थिति का सम्पादन करना, धारणा का अनुष्ठान है।

७. धारणा में अवलम्बित हुए विषय की एकरूपता का सम्पादन करना, ध्यान का अनुष्ठान है।

८. उस अवलम्बित विषय में चित्त का समाहित होकर, अर्थमात्र का ज्ञान होना, समाधि का अनुष्ठान है।

इस प्रकार उत्तर-उत्तर के अनुष्ठान के साथ, सभी पूर्व अङ्गों का अनुष्ठान करते हुए साधक अपेक्षित फल को प्राप्त करता है।