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वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम् ॥३३॥

In Hindi:

पदपाठ : वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम्॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : एतेषां यमनियमानाम्—

भूमिका हिंदी अर्थ : (एतेषाम्) इन (यमनियमानाम्) यम नियमों के —

हिंदी में अर्थ : (वितर्कबाधने) अहिंसा आदि यमों के विरोधी = वितर्कों हिंसा आदि से बाधा उपस्थित होने पर (प्रतिपक्षभावनम्) प्रतिपक्ष = वितर्कों की भी विरोधी = विपरीत विचारों की भावना करनी चाहिए॥

प्राचीन ॠषि भाष्य : यदास्य ब्राह्मणस्य हिंसादयो वितर्का जायेरन्हनिष्याम्यहमपकारिणमनृतमपि वक्ष्यामि द्रव्यमप्यस्य स्वीकरिष्यामि दारेषु चास्य व्यवायी भविष्यामि परिग्रहेषु चास्य स्वामी भविष्यामीति। एवमुन्मार्गप्रवणवितर्कज्वरेणातिदीप्तेन बाध्यमानस्तत्प्रतिपक्षान्भावयेत्। घोरेषु संसाराङ्गारेषु पच्यमानेन मया शरणमुपागतः सर्वभूताभयप्रदानेन योगधर्मः। स खल्वहं त्यक्त्वा वितर्कान्पुनस्तानाददानस्तुल्यः श्ववृत्तेनेति भावयेत्। यथा श्वा वान्तावलेही तथा त्यक्तस्य पुनराददान इति। एवमादि सूत्रान्तरेष्वपि योज्यम्॥

प्राचीन ॠषि भाष्य हिन्दी अर्थ : (यदा) जब (अस्य ब्राह्मणस्य) इस ब्राह्मण = ब्रह्मज्ञान की इच्छा वाले योगी के चित्त में (हिंसादयः वितर्काः) हिंसा, असत्य आदि वितर्क रूपी वृत्तियाँ (जायेरन्) उत्पन्न होवें, जैसे कि (अपकारिणम्) अपकारी व्यक्ति को (अहम् हनिष्यामि) मैं मारूँगा; इस अपकारी के प्रति अपकार करने हेतु (अनृतम् अपि) असत्य भी (वक्ष्यामि) बोलूँगा; (अस्य) इसका (द्रव्यम् अपि) द्रव्य = धन आदि को भी (स्वीकरिष्यामि) ले लूँगा; (च) और (अस्य) इसकी (दारेषु) स्त्रियों = पत्नी, भगिनी, पुत्री आदि के साथ (व्यवायी भविष्यामि) अनाचार = दुराचार करने वाला बनूँगा; (च) और (अस्य) इसके (परिग्रहेषु) संचित धनों का (स्वामी भविष्यामि इति) स्वामी भी बनूँगा। (एवम्) इस प्रकार से (अतिदीप्तेन) अति तीव्र = अत्यन्त प्रबल (उन्मार्गप्रवणवितर्कज्वरेण) कुमार्ग की ओर ले जाने वाले हिंसा आदि वृत्तियों के रोग से (बाध्यमानः) बाधित = पीडि़त होने पर (तत्प्रतिपक्षान्) उन हिंसा आदि वितर्कों के विरोधी भावों = विचारों की (भावयेत्) भावना करे। जैसे कि — “(घोरेषु संसाराङ्गारेषु) घोर = भयंकर संसार रूपी अङ्गारों में (पच्यमानेन मया) पकते = झुलसते हुए मैंने (सर्वभूताभयप्रदानेन) सब जीवों को अभयदान देने की भावना से (योगधर्मः) योगधर्म की (शरणम् उपागतः) शरण ली थी। (सः खलु अहम्) वही मैं (तत् त्यक्त्वा) उस योगधर्म = अहिंसादि व्रतों को त्याग कर (पुनः) फिर से (तान् वितर्कान्) उन्हीं हिंसादि वितर्कों को (आददानः) ग्रहण करता हुआ (श्ववृत्तेन तुल्यः) कुत्ते के आचरण के समान व्यवहार करने वाला हो गया हूँ।” (इति भावयेत्) इस प्रकार की भावना करे। (यथा) जिस प्रकार (श्वा) कुत्ता (वान्तावलेही) अपने ही वमन किए हुए पदार्थ को फिर चाट लेता है (तथा) उसी प्रकार (त्यक्तस्य) त्यागे हुए हिंसादि अधर्मों को (पुनः) फिर से (आददानः इति) ग्रहण करने वाला मैं हो गया हूँ। (एवम् आदि) इसी प्रकार (सूत्रान्तरेषु अपि) अन्य सूत्रों = आसन, प्राणायाम आदि सूत्रों में भी वितर्क विरोधी भावनाओं की (योज्यम्) योजना करनी चाहिए॥

वैदिक वृत्ति : साधक जब यम-नियमों का परिपालन करने का व्रत लेकर योगमार्ग पर चलना आरम्भ करता है, ऐसे में कोई भी विपरीत अथवा असामान्य स्थिति उत्पन्न हो जाने पर, उस स्थिति में जन्म-जन्मान्तर से संचित अविद्या, राग-द्वेष के प्रबल संस्कारों के कारण, उसके चित्त में अहिंसा आदि यमों के विरोधी हिंसा आदि की वृत्तियाँ स्वाभाविक रूप से उत्पन्न हो जाती हैं। इस स्थिति को नियन्त्रण करने हेतु महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि हिंसा, असत्य आदि वितर्कों के उत्पन्न होने पर साधक को, उन वितर्कों के भी विरोधी विचारों की भावना करनी चाहिए।

आत्मकल्याण हेतु इस योग मार्ग पर अग्रसर हुए ब्रह्मज्ञान की इच्छा वाले साधक के प्रति जब कोई अपकारी व्यक्ति उसका या उसके किसी सम्बन्धी आदि का अपकार करता अथवा उसे या उस के सम्बन्धियों को शारीरिक क्षति पहुँचाता अथवा वह उसके पास उपलब्ध किसी भी भोगसाधन आदि को हानि पहँुचाता है; तो उस साधक के चित्त में इस प्रकार के वितर्क उठ जाते हैं — मैं भी इस अपकारी व्यक्ति को मारूँगा; इस को हानि पहुँचाने अथवा इसका अपकार करने हेतु मैं असत्य भी बोलूँगा; इसके धन आदि की चोरी भी करूँगा; इसके परिवार की स्त्रियों जैसे कि पत्नी, भगिनी अथवा पुत्री आदि के साथ अनाचार = व्यभिचार करने वाला भी बनूँगा; इसके द्वारा संचित धन आदि को बलात् ग्रहण कर उसपर अधिकार कर लूँगा आदि-आदि।

यहाँ महर्षि व्यास ने साधक के चित्त में उत्पन्न हो सकने वाले पाँचों यमों के वितर्क रूपी प्रबल विचारों को उपर्युक्त प्रकार से कह दिया है। इस प्रकार के अति प्रबल रूप से विरोधी विचार उत्पन्न होने पर, किसी भी व्यक्ति का अधर्म मार्ग पर चलना स्वाभाविक रूप से सम्भव है। लोक में सामान्यतः इन्हीं विचारों से ग्रस्त हुआ व्यक्ति उपर्युक्त प्रकार के कर्मों को करता भी है। परन्तु योगमार्ग पर चलने वाले साधक के लिए महर्षि व्यास कहते हैं कि जब साधक इस प्रकार से हिंसा, असत्य आदि वृत्तियों के ज्वर से पीडि़त हो, तो उसे अपने चित्त में इन हिंसा आदि के विरोधी विचारों का आश्रय लेना चाहिए। अर्थात् इन हिंसादि वितर्कों की प्रतिपक्ष भावना को अपनाना चाहिए। उसे विचार करना चाहिए कि मैं अनादि काल से अविद्यादि क्लेशों से ग्रस्त हुआ विभिन्न योनियों में जाता हुआ, विभिन्न प्रकार के दुःखों को भोगता हुआ, जन्म-मृत्यु रूपी संसारचक्र में दुःखों को ही तो अब तक प्राप्त कर रहा हूँ। इस प्रकार इन परिणाम, ताप, संस्कार दुःखों तथा सत्त्वादि गुणों की वृत्तियों के विरोध के कारण बहुसंख्यक दुःखों से ग्रस्त हुआ, इस जीवन में आत्मकल्याण की भावना से, आत्मा और परमात्मा को जानने एवं साक्षात्कार करने के उद्देश्य से ही, अविद्यादि क्लेशों को नष्ट करने हेतु मैंने, अन्य सभी प्राणियों के प्रति वैरभाव का परित्याग करने हेतु अहिंसा आदि व्रतों को अपना कर योगमार्ग की शरण ली थी। अब इस प्रकार की विपरीत स्थिति उत्पन्न हो जाने पर, फिर अविद्या आदि से ग्रस्त होकर, उस कल्याणकारी योगमार्ग को त्याग कर, फिर से हिंसा आदि से प्रभावित होकर वैसे ही कर्मों को करना चाहता हूँ, जिनके कारण मैं अनन्त काल से जन्म-मरण रूपी संसार-चक्र में घूम रहा हूँ। इस योगमार्ग पर चलते हुए इन हिंसादि वितर्कों के प्रभाव से अशुभ कर्मों को करने पर तो मेरा आचरण कुत्ते के आचरण के समान हो जायेगा — जैसे कुत्ता खाकर वमन करता है और अपने ही वमन किए हुए उस गन्द को फिर से चाट लेता है; वैसे ही मैंने जिन हिंसा आदि वितर्क रूप अधर्मों को त्याग दिया था, उनको फिर ग्रहण करने वाला होने से, मुझ में और उस कुत्ते में कोई अन्तर नहीं होगा। साधक द्वारा एक बार, कुत्ते द्वारा वमन किए गन्द को पुनः चाटते हुए देख लेने से, उसके चित्त में उस दृश्य के कारण उत्पन्न हुए संस्कार ही उसे इस प्रकार के हिंसादि वृत्तियों को अपनाने से रोकने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं।

वस्तुतः व्यक्ति के जन्म-जन्मान्तर के संस्कार इतने प्रबल होते हैं कि थोड़ी सी विपरीत स्थिति आने पर राग-द्वेष से ग्रस्त हुआ, दूसरों के प्रति हिंसा आदि के विचारों को अपने चित्त में स्वाभाविक रूप से उठा लेता है। और यदि ऐसा व्यक्ति इन विचारों का निरन्तर चिन्तन करता रहे और तदनुकूल आचरण भी करता रहे तो हिंसा आदि के ऐसे विचार उसके चित्त में बिना विशेष पुरुषार्थ के स्वतः ही उठ जाते हैं। परन्तु योग मार्ग पर चलने वाले साधक को इनको रोकने हेतु विशेष प्रयत्न करना होता है। उसे यह जानना चाहिए कि इन वितर्कों को उठाने वाला वह स्वयं ही है। मन जड़ है, और स्वतः यह कोई कार्य नहीं कर सकता। आत्मा की इच्छा के बिना, कोई भी विचार मन रूपी साधन में आ ही नहीं सकता। वह जानता है कि मैं जो कोई भी विचार उठाऊँगा, वैसी ही वृत्तियाँ चित्त में बनेंगी। अगर वितर्कों को उठाने का अभ्यास बन गया, तो इनको रोकना कठिन होगा। साधक को यह जानना चाहिए कि इन वितर्कों और तदनुकूल-आचरण से उसकी, किस प्रकार की, कितनी प्रबल हानि हो रही है; उसे जानना चाहिए कि इन वितर्कों तथा तदनुकूल आचरण से ही, उसे दुःख और अज्ञान रूपी अनन्त फलों की प्राप्ति, ईश्वर की व्यवस्था में, अब तक प्राप्त होती रही है, और आगे भी यही स्थिति बनी रहेगी, और इस प्रकार वह दुःखों के अनन्त चक्र से बच नहीं पायेगा। अतः साधक को आरम्भ में ही इन वितर्कों के विरोधी विचारों को पुनः-पुनः उठाकर उन वितर्कों को दबा देना चाहिए। इस प्रकार से निर्बल हुए वितर्कों के संस्कार साधक को योगमार्ग से विचलित नहीं कर पाते।

साधक को यह प्रतिपक्ष भावना केवल हिंसादि वितर्कों के उत्पन्न होने पर ही नहीं उठानी चाहिए, बल्कि उसे योग के अन्य सभी अङ्गों अर्थात् नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की अवस्थाओं में होने वाले वितर्कों को दूर करने हेतु भी, इसी प्रकार से प्रतिपक्ष भावना का आलम्बन करना चाहिए।